30 नवंबर 2014

साहित्यम् - वर्ष 1 - अङ्क 7 - सितम्बर, अक्तूबर, नवम्बर' 2014

सम्पादकीय

आप ही की तरह मैं ने भी सुन रखा था कि “साहित्य समाज का दर्पण है”। बहुत बार लगा कि क्या बकवास है – साहित्य कहीं समाज का दर्पण हो सकता है? अगर ऐसा होता तो साहित्य की यूँ दुर्दशा न होती। लेकिन नहीं साहब, अग्रजों ने एक दम दुरुस्त फ़रमाया है कि “साहित्य समाज का दर्पण है”। अभी भी यक़ीन नहीं होता तो देखिये आप को कुछ उदाहरण देता हूँ।

सामाजिक मूल्यों का ह्रास हो चुका है – साहित्यिक मूल्यों का असेस्मेण्ट ख़ुद ही कर के देख लीजिये।

समाज आज उस जगह पहुँच चुका है कि वह जो चाहे पैसे से ख़रीद सकता है – औसत से भी कम स्तर के रचनाधर्मियों को ये दे और वो दे टाइप परोसे जा रहे पुरस्कारों की व्यथा इस बात को सौ फ़ी-सदी सही साबित करती है।

समाज भाषा-संस्कारों को भुला चुका है – वर्तमान साहित्य में परिवर्तन के नाम पर जिस भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है वह प्रवृत्ति भी इस बात को सही ठहराती है।

समाज ऑल्मोस्ट भौंड़ा हो चुका है – बहुत सारे तथाकथित साहित्यकार उन के अपने साहित्य को भौंड़ेपन की दौड़ में सब से आगे ले जाने के लिये रात-दिन भरसक प्रयास करते स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहे हैं।

आज आदमी के अन्दर से सम्वेदना और सरोकार लुप्त हो चुके हैं – कुछ को छोड़ दें तो बहुत सारे तथाकथित  साहित्यकार भी सम्वेदना-शून्य रचनाओं की गठरी उठाये सरोकार विहीन दिशा की तरफ़ बढ़ते हुये स्पष्ट रूप से दिख रहे हैं।

ऐसे अनेक विषय हैं जो “साहित्य समाज का दर्पण है” वाले सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं।

मगर, जहाँ एक तरफ़ यह दुरावस्था है वहीं दूसरी तरफ़ इस पीड़ा को महसूस करने वाले तमाम साहित्यानुरागी बरसों से कमर कस कर मैदान में डटे हुये भी हैं ताकि नुकसान को कम से कम घटाया तो जा सके। अनेक मोर्चों पर साहित्यानुरागियों ने अपने-अपने स्तर पर ऐसे-ऐसे कामों बल्कि यूँ कहिये कि प्रकल्पों को सम्हाला हुआ है कि परिचय होते ही उक्त व्यक्तित्वों की शान में सर ख़ुद-ब-ख़ुद झुक जाता है।

प्रश्न उपस्थित होता है कि दर्पण को साफ़ किया जाये या कि ऑब्जेक्ट को? बच्चा भी उत्तर दे सकता है कि दर्पण झूठ नहीं बोल सकता। लिहाज़ा हमें अपने चेहरों को ही साफ़ करना चाहिये। हमें समाज को ही उचित अवस्था में लाने के लिये निरन्तर प्रयास-रत रहना चाहिये। बेशक़ आज के दौर में हम अठारहवीं या फिर पहली-दूसरी सदी में तो नहीं जा सकते; मगर नोस्टाल्जिया को गरियाये बग़ैर पुरातन की अच्छी बातों को अधुनातन रूप में पुनर्स्थापित करने की दिशा में प्रयास तो कर ही सकते हैं।

छन्द इस दिशा में पहला प्रयास हो सकता है। छन्द का मतलब सिर्फ़ सवैया या घनाक्षरी या दोहा आदि आदि ही नहीं होता। बल्कि छन्द की परिभाषा में  ग़ज़ल, सोनेट, हाइकु के साथ-साथ वह सारी रचनाएँ भी आती हैं जो एक नियत विधान का अनुपालन करते हुये मानव-मस्तिष्क से सफल-सम्यक-सार्थक सम्वाद स्थापित करते हुये उस की सम्वेद्नात्मक संचेतना तक पहुँचने में सक्षम हों।

किसी को लग सकता है कि छन्द के रास्ते पर चल कर यह बदलाव कैसे सम्भव है। छन्द लिखने-पढ़ने-परखने वाले इस बात की पुष्टि करेंगे कि छन्द यानि एक भरपूर अनुशासनात्मक प्रणाली। ज़रा भी कम या ज़ियादा हुआ कि सौन्दर्य-बोध ख़त्म। सौन्दर्य-बोध ख़त्म होते ही लालित्य ख़त्म। रसात्मकता का लोप।

छन्द-संरचना हमें एक सुनियोजित मार्ग पर सुव्यवस्थित पद्धति से अग्रसर होने के लिये प्रेरित करती है। इस मन्तव्य को व्यावहारिक रूप से अनुभव कर के भी समझा जा सकता है।

आसाराम बापू के बाद रामपाल प्रकरण के भी गवाह बन चुके हैं हम लोग। कोई भी चैतन्य-मना व्यक्ति किसी भी सूरत में इन प्रकरणों से सरोकार नहीं रख सकता। इन प्रकरणों ने हमारी आस्थाओं के साथ हो रहे खिलवाड़ों की कलई खोल के रख दी है। उमीद करते हैं कि तमाम अन्य धर्मों / पंथों के लोग भी इन प्रकरणों से सबक लेंगे। दरअसल धर्म हमारे लिये एक ऐसा उपकरण होना चाहिये जिस की सहायता से हम अपने आप को सुनियंत्रित पद्धति को अपनाते हुये, भटकने से बचते हुये परमार्थ के विज्ञान को समझने का यत्न कर सकें। धर्म का मतलब हम सभी विचारधाराओं वाले लोगों के यहाँ यम-नियम-संयम न हो कर आडम्बर अधिक होता जा रहा है। इस दिशा में यदि हम गम्भीरता पूर्वक विचार न कर सके तो हमारी नई पीढ़ी के और अधिक नास्तिक आय मीन निराशावादी होने के अवसर बढ़ जायेंगे।

मोदी सरकार बनने के बाद से एक अलग ही तरह का उन्माद ओपनली दिखाई पड़ने लगा है। हर तरफ़ से। कोई चाहे तो जिरह यूँ भी कर सकता है कि पहले मुर्गी हुई या पहले अण्डा? मगर हर स्थिति में उन्माद हमारे बच्चों से तरक़्क़ी के मौक़े ही छीनेगा। व्हाट्सअप ने आजकल ख़ासी धूम मचाई हुई है। अपने मित्रों में सभी विचारधाराओं के व्यक्ति शामिल हैं। सभी मित्र अपने-अपने ज्ञान को हमारे साथ बाँटते रहते हैं। इस ज्ञान-वाटप में एक ऐसा मेसेज वायरल हुआ जिस ने इन पंक्तियों के लेखक को वाक़ई व्यथित किया। विषय अजमेर वाले चिश्ती साहब के द्वारा लाखों हिंदुओं को मुसलमान बनाये जाने पर उन्हें उक्त दर्ज़ा मिलने के बाबत था। उसी मेसेज में पृथ्वीराज चौहान की पत्नी के बारे में भी कुछ अत्यन्त दुखद लिखा हुआ था। एक औसत व्यक्ति के नाते मेरा निवेदन यही है कि ऐसे किसी भी संदेश को वायरल करने से पहले अच्छी तरह चेक भी कर लेना चाहिये, चूँकि हमारे पूर्वजों के साथ ज़ोर-जबर्दस्ती करने वालों के लिये हमारे मन में अच्छी भावनाएँ नहीं हो सकतीं। हिंदुस्तान मज़हब को ले कर कई बार बड़े-बड़े नुकसान झेल चुका है। एक और नुकसान????????

एक बड़ा ही मज़ेदार वाक़या है कि जैसे ही आप कोई शेर सुनाएँ और अगर उस शेर पर किसी पूर्ववर्ती शायर के ख़याल की छाया हुई [जो कि अक्सर होती भी है] तो फ़ौरन से पेश्तर लोग उस शायर का हवाला देने लगते हैं। मगर बाद के पन्थ के लोगों से अगर हम कहें कि यह बात वेदों में भी लिखी है तो पता नहीं क्यों वे लोग अचानक ही असहज हो जाते हैं? भाई आप को वेद की ऋचा को उद्धृत नहीं करना, आप की मर्ज़ी। आप उपकार  को मेहरबानी या obligation या कुछ और कहना चाहते हैं – आप की मर्ज़ी। मगर हमें तो अपनी आस्थाओं से जुड़ा रहने दीजिये। हम सभी को एक दूसरे पर अपने विचार थोपने की बजाय, अपने-अपने बच्चों तक अपने पूर्वजों के विचार पहुँचाने पर अधिक ध्यान देना चाहिये। इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि यदि कोई व्यक्ति कहे कि वही सर्व-श्रेष्ठ है तो इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि वह नेष्ट है इसलिये ख़ुद को सर्व-श्रेष्ठ साबित करने के लिये एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाये जा रहा है।

कोई त्यौहार आया कि सारा मीडिया देशी मिठाइयों के पोस्ट-मार्टम में लग जाता है। नो प्रॉबलम। मगर भाइयो आप ने कभी कृत्रिम सब्जियों, मिलावटी मसालों, केडबरी-पेप्सी के आकाओं द्वारा नकारी गईं दवाओं, मशीनों वग़ैरह के बारे में सोचना नहीं होता है क्या? कमी को दूर करना हमारा लक्ष्य अवश्य ही होना चाहिये, मगर हिन्दुस्तान की रीढ़ यानि कुटीर उद्योग यानि छोटे-छोटे कारोबारियों को अनिश्चित भविष्य की निधि टाइप नौकरियों की भट्टियों में धकेलने की क़ीमत पर नहीं। इशारा पर्याप्त है।

हिन्दुस्तानी साहित्य सेवार्थ शुरू किया गया यह शैशव प्रयास अपने सातवें चरण में है। हम हर बार ग़लतियों से सीखने का प्रयास करते हैं। अपने पाठकों की ख़िदमत करने की भरसक कोशिश करते हैं। फिर भी चूँकि हम मनुष्य हैं सो हम से भूल होना स्वाभाविक है। आप सभी से साग्रह निवेदन है कि हमें हमारी ग़लतियों से अवगत कराने की कृपा करें। आप के सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी। आभार। नमस्कार।

सादर
नवीन सी. चतुर्वेदी

रचनाएँ देवनागरी में मङ्गल फोण्ट में टाइप कर के [सम्भवत:  ड़,, ञ के अलावा चन्द्र-बिन्दु तथा अनुस्वार का भी उपयोग करते हुये]  navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें। अगला अङ्क फरवरी में आयेगा / अद्यतन होगा।


साहित्यम्  अन्तरजालीय पत्रिका / सङ्कलक

सितम्बर, अक्तूबर, नवम्बर 2014      
वर्ष – 1 अङ्क  7

विवेचना                       मयङ्क अवस्थी
                                    07897716173

छन्द विभाग                 संजीव वर्मा सलिल
                                    9425183144

व्यंग्य विभाग               कमलेश पाण्डेय
                                    9868380502

कहानी विभाग             सोनी किशोर सिंह
                                    8108110152

राजस्थानी विभाग        राजेन्द्र स्वर्णकार
                                    9314682626

अवधी विभाग               धर्मेन्द्र कुमार सज्जन
                                    9418004272

भोजपुरी विभाग            इरशाद खान सिकन्दर
                                    9818354784

विविध सहायता           मोहनान्शु रचित
                                   9457520433  
                                   ऋता शेखर मधु

सम्पादन                      नवीन सी. चतुर्वेदी
                                    9967024593

अनुक्रमाणिका
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कहानी

·        कहानी फ़ोटो जर्नलिस्ट – डॉ. वरुण सूथरा

 

व्यंग्य

·        व्यंग्य दऊआ पहलवान गली - आलोक पुराणिक

·        व्यंग्य द ग्रेट इण्डियन वैडिंग तमाशा - नीरज बधवार

·        व्यंग्य वो एक पार्टी - कमलेश पाण्डेय



कविता / नज़्म 

·        फ़ेसबुक पर चालीस साला औरतें – अञ्जू शर्मा

·        वे कम्बल – कामिनी अग्रवाल

·        एक कविता - उर्मिला माधव

·        एक कविता – मोनी गोपाल ‘तपिश’

·        कवितायें - पूजा भाटिया

·        हिन्दू जीवन, हिन्दू तन-मन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय – तुफ़ैल चतुर्वेदी


हाइकु

गीत-नवगीत

छन्द 

ग़ज़लें

आञ्चलिक गजलें







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