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फिर विचारों पर सियासी रंग गहराने लगे, - अशोक रावत

फिर विचारों पर सियासी रंग गहराने लगे,
फिर छतों पर लाल-पीले ध्व ज नज़र आने लगे.

रंग पिछले इश्तलहारों के अभी उतरे नहीं,
फिर फ़सीलों पर नये नारे लिखे जाने लगे.

अंत में ख़ामोश होकर रह गए अख़बार भी,
साजि़शों में रहबरों के नाम जब आने लगे.

आज अपनी ही गली में से गुज़रते डर लगा,
आज अपने ही शहर के लोग अनजाने लगे.

जान पाए तब ही कोई पास में मारा गया,
जब पुलिसवाले उठाकर लाश ले जाने लगे.

हो गईं वीरान सड़कें और कर्फ़्यू लग गया,
फिर शहर के आसमॉं पर गिद्ध मॅंडराने लगे.

अशोक रावत

सारी नदियाँ, सारी बारिश, उनके हिस्से में - अशोक रावत

सारी नदियाँ, सारी बारिश, उनके हिस्से में,
सिर्फ़ रेत के टीले आये मेरे हिस्से में.

मेरे हिस्से में फूलों का रंग रूप केवल,
फूलों की ख़ुशबू है जाने किसके हिस्से में.

कैसे हैं ये नियम कि सारा अंधकार मेरा,
सूरज की हर एक किरन है उनके हिस्से में.

चौड़ी सड़कें, तेज़ रोशनी, और ये फ़व्वारे,
सब कुछ उनका ही है, क्या है मेरे हिस्से में.

दीवारें हिलती हें जिसकी छत गिरने को है,
मैं रहता हूँ अब तक घर के ऐसे हिस्से में.

बस्ती के आधे हिस्से में अफ़वाहों का ज़ोर,
कर्फ़्यू जारी है बस्ती के आधे हिस्से में

:- अशोक रावत