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उम्र गुज़रेगी इम्तहान में क्या - जॉन एलिया


जॉन एलिया

उम्र गुज़रेगी इम्तहान में क्या?
दाग ही देंगे मुझको दान में क्या?

मेरी हर बात बेअसर ही रही 
नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या?

बोलते क्यो नहीं मेरे अपने 
आबले पड़ गये ज़बान में क्या?

मुझको तो कोई टोकता भी नहीं 
यही होता है खानदान मे क्या?

अपनी महरूमिया छुपाते है 
हम गरीबो की आन-बान में क्या?

वो मिले तो ये पूछना है मुझे 
अब भी हूँ मै तेरी अमान में क्या?

यूँ जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या?

है नसीम-ए-बहार गर्दालूद 
खाक उड़ती है उस मकान में क्या

ये मुझे चैन क्यो नहीं पड़ता 
एक ही शख्स था जहान में क्या?

जॉन एलिया

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
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2122 1212 22



बाद मुद्दत के वो मिला है मुझे - नीरज गोस्वामी

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नीरज गोस्वामी


बाद मुद्दत के वो मिला है मुझे
डर जुदाई का फिर लगा है मुझे

आ गया हूँ मैं दस्तरस में तेरी
अपने अंजाम का पता है मुझे
दस्तरस = हाथों की पहुँच में

क्या करूँ ये कभी नहीं कहता
जो करूँ उसपे टोकता है मुझे

तुझसे मिलके मैं जब से आया हूँ
हर कोई मुड़ के देखता है मुझे

अब तलक कुछ वरक़ ही पलटे हैं
तुझको जी भर के बांचना हैं मुझे

ठोकरें जब कभी मैं खाता हूँ
कौन है वो जो थामता है मुझे

सोचता हूँ ये सोच कर मैं उसे
वो भी ऐसे ही सोचता है मुझे

मैं तुझे किस तरह बयान करूँ
ये करिश्मा तो सीखना है मुझे

नींद में चल रहा था मैं ‘नीरज’
तूने आकर जगा दिया है मुझे


नीरज गोस्वामी

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देख उट्ठे हैं सब .......हिक़ारत से - हादी जावेद

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हादी जावेद


देख उट्ठे हैं सब .......हिक़ारत से
बाज़ आ जाओ अब हिमाक़त से
ताज छीने गये हैं ताक़त से
तख़्त पलटे गये बग़ावत से
हम भी बेमौत मारे जायेंगे
एक दिन आपकी शरारत से
अस्ल पाकीज़गी तो रूह की है
बिलयकीं जिस्म की तहारत से
नेकियों का सिला न मिल पाया
हो गये सब अमल अकारत से
तुम ही तन्हा वतन परस्त नहीं
है मुहब्बत हमें भी भारत से
मुझको अल्लाह ने नवाज़ा है
शेर कहता हूँ मैं निफ़ासत से
क्या तवक़्कौ पनाह की "हादी"
एक टूटी हुई .........इमारत से

........ हादी जावेद.............
8273911939

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लुत्फ़ आता है ख़ूब उल्फत में - सुनील कुमार जश्न

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सुनील कुमार जश्न 


लुत्फ़ आता है ख़ूब उल्फत में
बात ये झूठ है हकीक़त में ।।।
मौत आती है जिंदा लोगों को
कैसे मरता तुम्हारी फ़ुर्क़त में
खुबसूरत से इक गुनाह के बाद 
दिल लगा ही नहीं इबादत में
सबको संजीदा कर दिया मैंने
हाय क्या हो गया शरारत में
खून थूका न ही ज़बां लटकी 
और इज़ाफा करो इनायत में
डर जुदाई का इस क़दर था "जश्न"
हम मिले ही नहीं मुहब्बत में

सुनील कुमार जश्न
084269 07793

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रोज़ रह-रह के सोचता है मुझे - नवीन

रोज़ रह-रह के सोचता है मुझे।
यानि अब तक भुला रहा है मुझे॥
वो भी तो वक़्त का सताया है।
फिर भला क्यों सता रहा है मुझे॥
अब रिहाई बहुत ज़ुरूरी है।
कोई आवाज़ दे रहा है मुझे॥
ये तरावट ये लम्स1 अदभुत है।
कौन साहिल प लिख रहा है मुझे॥
दिन-ब-दिन दर्द में इज़ाफ़ा है।
चैन मिलता ही जा रहा है मुझे॥
कारोबारे-चमन उरूज प है।
ग़म गटकता ही जा रहा है मुझे॥
इश्क़ जैसा चतुर नहीं कोई।
मुफ़्त-रुज़गार दे गया है मुझे॥
दिन ख़सारों के लद चुके साहब।
अब तो हर नुक़्स में नफ़ा है मुझे॥
मेरे नक़्क़ाद2 ऐ मेरे भगवान।
जो मिला आप से मिला है मुझे॥
रात बरसाये धूप को शायद।
दिन तो तारे दिखा चुका है मुझे॥
उस की महफ़िल मकानो-घर के सिवा।
उस का बाज़ार भी पता है मुझे॥
यों ही खारा नहीं बना हूँ मैं।
तज़्रिबों ने बहुत चखा है मुझे॥
सब के अन्दर ख़ुदा का मन्दर है।
उफ़ ये कैसा मुग़ालता3 है मुझे॥
कोई अम्बर भले रहे मग़रूर।
कोई ज़र्रा तो पा चुका है मुझे॥
इक ‘नवीन’ आसमान और भी है।
इक सुराग़ और मिल गया है मुझे॥
1 स्पर्श 2 आलोचक / टीकाकार 3 ग़लत-फ़ह्मी
नवीन सी॰ चतुर्वेदी
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टूट कें काँच की रकाबी से - नवीन

टूट कें काँच की रकाबी से
हम बिखर ही गए सराबी से
नेह के बिन सनेह की बतियाँ
ये दरस तौ हैं बस नवाबी से
हक्क तजबे कों नेंकु राजी नाँय
गम के तेवर हैं इनकिलाबी से
बैद, कोऊ तौ औसधी बतलाउ
घाव, गहराए हैं खराबी से
राख हियरे में खाक अँखियन में
अब कपोल’उ कहाँ गुलाबी से
प्रश्न बन कें उभर न पाये हम
बस्स, बन-बन, बने – जवाबी से
हमरे अँचरा में आए हैं इलजाम
बिन परिश्रम की कामयाबी से
ब्रज-गजल के प्रयास अपने लिएँ
सच कहें तौ हैं पेचताबी से
बस्स बदनौ* है, कच्छ करनों नाँय
हौ ‘नवीन’ आप हू किताबी से

नवीन सी चतुर्वेदी

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ब्रज-गजल 





बेकराँ बेकराँ से उठता है - नवीन

बेकराँ बेकराँ से उठता है
आदमी आसमाँ से उठता है
ना-तवाँ, नीम-जाँ से उठता है
बारे-ग़म बेज़ुबाँ से उठता है॥
तन पै आहो-फ़ुगाँ मला कीजे
इश्क़ आहो-फ़ुगाँ से उठता है
क़ामयाबों से कब उठा है इश्क़।
ये तो नाकामराँ से उठता है
देख अब जा रहा हूँ तुझ से दूर
आशियाँ आसताँ से उठता है
दिल धधकता है वस्ल की लौ में
और धुआँ जिस्मो-जाँ से उठता है
बेदमे-ग़म में अब कहाँ वो दम
शोर ही कारवाँ से उठता है
अपने घर में ही रहता है इनसान
पर पराये मकाँ से उठता है
काश हम उस बटन पे आ पाएँ
गीत का सुर जहाँ से उठता है
सच को सच मानते नहीं हम-लोग
कब यक़ीं जिस्मो-जाँ से उठता है
जिसने आलम को कर दिया अन्धा
वो धुआँ ख़ुद जहाँ से उठता है
कोई बतलाए इन हवाओं को
हर बगूला कहाँ से उठता है
जिस को दुनिया समझती है तूफ़ाँ
वो किसी बादबाँ से उठता है
ख़ुश्बुओं को बिखेरने का ख़र्च
तो, किसी बागवाँ से उठता है
कैसे उठते हैं जानता है वह
वाँ फिसल कर वहाँ से उठता है
जो कि पसरी है हर्फ़-हर्फ़ ‘नवीन’
इश्क़ उस दासताँ से उठता है”
क़त्अ:-
हो मुहब्बत का कोई भी परबत
बेबस और बेज़ुबाँ से उठता है
ज़ुल्म, ज़ुल्मत, ज़ियादती का बोझ
हाँ! हमीं नातवाँ से उठता है

नवीन सी चतुर्वेदी

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ख़ुद को बेहतर बना रहा हूँ मैं - नवीन

ख़ुद को बेहतर बना रहा हूँ मैं ॥
जगमगाहट का सिलसिला हूँ मैं ॥
भाप की शक्ल आब से उठ कर।
रक़्स करता हुआ ख़ला हूँ मैं॥
मेरी गिरहें जिरह की हैं मुहताज।
जल्दबाज़ी का फ़ैसला हूँ मैं॥
वक़्त क़ाबू में रख हवाओं को।
तेरी दहलीज़ का दिया हूँ मैं॥
ख़ाब हो या सुकून के दुश्मन।
तुम से अब तंग आ गया हूँ मैं॥
बन के परबत मुझी पे बैठोगी।
राईयो तुम को जानता हूँ मैं॥
आसमानों में ढूँढ मत मुझ को।
आसमानों से गिर चुका हूँ मैं॥
मैं हूँ रघुपति सहाय का वारिस।
अपना अंज़ाम जनता हूँ मैं॥
नवीन सी चतुर्वेदी
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ज़िन्दगी है निखार लमहों का - नवीन

ज़िन्दगी है निखार लमहों का।
कीजिये ऐतबार लमहों का॥
आज परियाँ उतरने वाली हैं।
झट से आँगन बुहार लमहों का॥
हम-शुआएँ तेरी तलब में हैं।
वक़्त दामन पसार लमहों का॥
उस ने सदियाँ निसार दीं हम पर।
हम ने माँगा था प्यार लमहों का॥
जिसने पाया वही समझ पाया।
एक बोसा हज़ार लमहों का॥
हम तो उस एक पल में ही गुम हैं।
कैसे करते शुमार लमहों का॥
ऐ ‘नवीन’ अब तो होश में आ जा।
सर से नश्शा उतार लमहों का॥

नवीन सी चतुर्वेदी
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ज़हनियत की जरीब हैं हम लोग - नवीन

ज़हनियत1 की जरीब2 हैं हम लोग
वाक़ई ख़ुश-नसीब हैं हम लोग
नर्म-नाज़ुक मिज़ाज है अपना
आदतन अन्दलीब3 हैं हम लोग
शेर पढ़ते हैं तिस4 बुझाते हैं
तिश्नगी4 के तबीब5 हैं हम लोग
आज तक जो हमें मिले ही नहीं
उन ख़तों के मुजीब6 हैं हम लोग
जो नराधम7 को भी क्षमा कर दे
उस धरम के ख़तीब8 हैं हम लोग
बादशाहों से कैसे मिलवाएँ
नायबों के नक़ीब9 हैं हम लोग
जो समझता है दिल की बात ‘नवीन’
उस अदब10 के अदीब11 हैं हम लोग
1 ज़हनियत – बुद्धि सम्बन्धित अवस्था 2 जरीब – मापने की एक विशेष पट्टी / फ़ीता 3 अन्दलीब – बुलबुल 4 तिस / तिश्नगी – प्यास 5 तबीब – चिकित्सक 6 मुजीब – उत्तरदाता 7 नराधम – अधम / नीच मनुष्य, अमानव, अमानुष 8 ख़तीब – धर्मगुरू, वक्ता 9 नक़ीब – चोबदार 10 अदब – साहित्य 11 अदीब – साहित्यकार
नवीन सी चतुर्वेदी
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दिल का दामन ख़ुशी से भर डाला - नवीन

दिल का दामन ख़ुशी से भर डाला
हाय! फिर से क़ुसूर कर डाला
जो इसे करना ही न था आबाद
तो मुहब्बत में क्यों असर डाला
तब ख़ला से निकल सका अमरित
जब इस अन्धे कुएँ में घर डाला
पूजने होंगे उस के पाँव हमें
जिस ने भी इश्क़ में हुनर डाला
रब को मालूम था ये नादाँ है
इसलिये ही तो दिल में डर डाला
उड़ पड़ा शेर हम ने जैसे ही
उस में एक लफ़्ज़ चश्मेतर डाला
अक्सर ऐसा भी लगता है रब ने
वाँ जो ख़ारिज़ हुआ, इधर डाला
कुल जिरह इस पे है कि पहलेपहल
पाँव किस ने ज़मीन पर डाला
कैसे-कैसे हसीन गुंचे थे
एक हवस ने सभी को चर डाला
हमने सोचा कि ये तो चुहिया है
ज़िन्दगी ने हमें कुतर डाला
ख़ुद से मिल कर ‘नवीन’ लगता है
हम ने क्यों ओखली में सर डाला
नवीन सी चतुर्वेदी
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हाय वो रुत भी क्या सुहानी थी - नवीन

हाय वो रुत भी क्या सुहानी थी
मैं भी सुनता था तू भी सुनती थी
तू मेरे सड़्ग-सड़्ग बरसों-बरस
जंगलों-जंगलों भटकती थी
क्यों न सुन्दर हों मेरी तसवीरें
रंग तू ही तो इन में भरती थी
कुछ सबक तूने भी सिखाये हैं
तू भी लड़ती थी तू भी जिद्दी थी
कैसे कह दूँ कि तब ज़हीन था मैं
जब तू मेरी कनीज़ होती थी
मैं जो सहरा था बन गया दरिया
तू फ़ना हो गयी जो नद्दी थी
मैं तो हमले में मारा जाता था
जीते जी तू चिता पे सोती थी
खेत-खलिहान जानते थे उसे
जिस के दम से रसोई चलती थी
भूल जाती थी तू तेरे अरमान
जब तबीयत मेरी मचलती थी
अपने अब्बा की लाज रखने को
उन की हर बात मान लेती थी
अपने भाई की फीस की ख़ातिर
अपना पढना ही छोड़ देती थी
माँ की आँखें न भीग जाएँ कहीं
इस लिये हर सितम को सहती थी
मेरे जैसों से डर के तू अक्सर
घर से बाहर नहीं निकलती थी
वो तो मैं ने ही तुझ को रोक लिया
वरना तू ने उड़ान भरनी थी
चल क़लम हाथ में उठा ले अब
वो क़लम जिस को तू बनाती थी
मत ज़माने से पूछ कोई सवाल
ये रियाया तो कल भी गूँगी थी
टोकने वालों को बता देना
उन की अम्मा भी एक लड़की थी
बोलना दौर अब नहीं है वो
जब कि तू घर में क़ैद रहती थी
काश मर्दों को यह समझ आये
उन की अम्मा भी एक लड़की थी

नवीन सी चतुर्वेदी
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