30 November 2014

विशेष - कब परिपक्व होगी भोजपुरी ग़ज़ल - इरशाद खान सिकन्दर

कब परिपक्व होगी भोजपुरी ग़ज़ल
- इरशाद खान सिकन्दर
                                      
ग़ज़ल और उसका व्याकरण नामक पुस्तक के पहले ही अध्याय में लिखित पंक्तियों पर ज़रा ग़ौर कीजिये ‘’यदि कोई व्यक्ति यह प्रश्न करता है कि ग़ज़ल क्या है तो, मेरे  विचार में, इस विषय की प्रारंभिक चर्चा के समय उसे यह उत्तर दिया जाना चाहिए कि ग़ज़ल जो कुछ भी हो लेकिन वह गीत कदापि नहीं है ! इस बात का उल्लेख इसलिए आवश्यक है क्योंकि भोजपुरी में आज भी ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो विरह गीत को ही ग़ज़ल समझते हैं! ग़ज़ल का शाब्दिक अर्थ ‘प्रेमालाप’ या महबूब से बातें करना अवश्य है किन्तु प्रेमालाप या महबूब से की गयी सभी  बातें ग़ज़ल नहीं होतीं! यहाँ ये भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि अब ग़ज़ल अपने शाब्दिक अर्थ के दायरे से बाहर निकलकर समूचे ब्रम्हांड और ब्रम्हांड के सब विषयों पर गंभीर विमर्श कर रही है! ग़ज़ल होने के लिए ग़ज़ल के मूल सिद्धांत एवं व्याकरण का पालन अति आवश्यक है! ग़ज़ल अपने हुस्न में तनिक भी कमी बर्दाश्त नहीं कर सकती; और अगर किसी ने जबरन इससे कोई छेड़छाड़ की तो स्वयं ये उसे अपने प्रांगण से बाहर धकेल देती है! आज के समय में जहाँ काव्य की दूसरी विधाएं दम तोड़ रही हैं वहीँ ग़ज़ल प्रतिदिन अपने दीवानों की तादाद बढ़ा रही है!

कहा जाता है कि इस्लाम पूर्व अरब में ग़ज़ल का जन्म हुआ! ग़ज़ल से पहले अरब प्रांत में क़सीदे (लम्बी कविता, प्रशंसागान) का चलन था! एक लेख में प्रख्यात कथाकार प्रोफ़ेसर अब्दुल बिस्मिल्लाह साहब फ़रमाते हैं-‘क़सीदे में जब प्रेम का प्रवेश हुआ तो ग़ज़ल का जन्म हुआ और इसका श्रेय जाता है इमरउल क़ैस (539ई.)को! अरबी साहित्य के विशेषज्ञों का मानना है कि इमरउल क़ैस ज़माना-ए-जाहिलिया (अंधकार युग) का पहला शायर है जिसने ग़ज़ल कही! उसी ने सर्वप्रथम प्रेमिका के उजड़े दयार पर रूककर उसकी याद में अपने दोस्तो के साथ मिलकर रोने की काव्यात्मक परम्परा की नींव डाली’’

इमरउल क़ैस से शुरू हुई ग़ज़ल, पीढ़ी दर पीढ़ी अपना सफ़र तय करती हुई पहले ईरान फिर हिन्दुस्तान पहुंची! तब हिन्दुस्तान में उर्दू का जन्म नहीं हुआ था! हिंदी या हिन्दवी में जो सबसे पहली ग़ज़ल कही गयी वो संभवतः अमीर ख़ुसरो साहब ने कही जिसका मतला यूँ है-

जब यार देखा नैन भर दिल की गयी चिंता उतर
ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझायकर

मुग़लों के शासन काल में बादशाह के लोगों और मक़ामी लोगों की बात चीत से जो  तीसरी भाषा जन्मी उसे रेख़्ता का नाम दिया गया ! रेख़्ता यानी मिलीजुली भाषा रेख़्ता यानी उर्दू का पुराना नाम! रेख़्ता यानी ग़ज़ल की नयी भाषा! ग़ज़ल अरबी, फ़ारसी, हिन्दवी से होती हुई अब रेख़्ता में प्रवेश कर चुकी थी! और ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि ग़ज़ल पूरी तरह जवान रेख़्ता यानी उर्दू में ही हुई और जवानी भी ऐसी कि जो ढलने का नाम ही नहीं लेती मशहूर शायर मुनव्वर राना साहब फ़रमाते हैं-

ये सच है उम्र सभी औरतें छुपाती हैं
मगर शबाबे-ग़ज़ल वाक़ई सलामत है

ग़ज़ल ने उर्दू फ़ारसी में इतनी ख़्याति अर्जित कर ली कि हिन्दुस्तान की दूसरी ज़बानें भी इस विधा की तरफ़ खिंचती चली आईं! हिंदी में भारतेंदु हरिश्चंद्र समेत समय समय पर तमाम रचनाकारों ने इस विधा में कोशिशें कीं! जो कि आज भी जारी है, किन्तु केवल दुष्यंत कुमार को छोड़ कोई स्थापित न हो सका!

पंजाबी ज़बान में भी तमाम शायरों ने ग़ज़लें कहीं जिनमें  शिव कुमार बटालवी साहब का नाम उल्लेखनीय है! आज गुजराती, मराठी, सिन्धी, ब्रज, मैथिली, भोजपुरी, अवधी समेत भारत की तमाम ज़बानों में ग़ज़लें कही जा रही हैं.किन्तु उर्दू वाला मज़ा किसी दूसरी ज़बान की ग़ज़ल में मौजूद नहीं हैं बल्कि अधिकतर तो ऐसी हैं जिन्हें ग़ज़ल कहना ग़ज़ल की तौहीन होगी! इसका सबसे बड़ा कारण दूसरी ज़बान के शायरों का ग़ज़ल के मौलिक स्वरुप से अनभिज्ञ होना है! हम ऊपर चर्चा कर चुके हैं कि ग़ज़ल अरबी फ़ारसी से होती हुई उर्दू ज़बान तक पहुंची लेकिन इस यात्रा में एक जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात शामिल है वो यह है कि ग़ज़ल के मौलिक स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था अर्थात ग़ज़ल के छंद वही थे और इस विधा को अपनाने वाले रचनाकार इससे भली भांति परिचित थे! हाँ आगे चलकर इसमें ज़बान की तराश-ख़राश एवं इसे और बेहतर बनाने के लिए विशेषज्ञों ने ख़ूब काम किया! जो कि इसके हुस्न और कशिश को आज भी बरक़रार रखे हुए है!


मैंने इस लेख के शीर्षक में कहा कि ‘कब परिपक्व होगी भोजपुरी ग़ज़ल’ इसका मुख्य कारण ये है कि दूसरी ज़बानों की ग़ज़लें धीरे धीरे ग़ज़ल के मौलिक स्वरुप तक पहुँच रही हैं, और दूसरी ज़बानों के रचनाकार इस दिशा में गंभीरता से कार्य कर रहे हैं किन्तु बड़े दुःख के साथ इस कटु सत्य को स्वीकार करना होगा कि इस दिशा में भोजपुरी की हालत दयनीय है! हालांकि साहित्य की सभी विधाओं में भोजपुरी की हालत दयनीय है किन्तु बात ग़ज़ल पर हो रही है इसलिए ग़ज़ल विधा का ही मैंने उल्लेख किया, मेरे इस कथन का यह अर्थ कदापि नहीं है कि भोजपुरी में ग़ज़लों पर काम नहीं हो रहा, काम तो खूब हो रहा है यहाँ तक कि ग़ज़ल के संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं, किन्तु अधिकतर लोग ग़ज़ल के नाम पर कूड़ा-कचरा परोस रहे हैं, और जो रचनाकार ग़ज़ल कहने में सक्षम हैं वो कोई लाभ न मिलता देख अपने आप को इससे अलग किये हुए हैं! इन बिन्दुओं पर भोजपुरी के रचनाकारों को गंभीरता से विचार करना होगा! और नए रचनाकारों को ग़ज़ल की बारीकियाँ सीखकर ही इस विधा में प्रयास करना होगा तभी वो खुद को और भोजपुरी ग़ज़ल को सम्मान दिला पायेंगे!

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