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दो ग़ज़लें - वीनस केसरी

उलझनों में गुम हुआ फिरता है दर-दर आइना ।
झूठ को लेकिन लगे है अब भी ख़ंजर आइना ।।

शाम तक खुद को सलामत पा के अब हैरान है।
पत्थरों के शह्र में घूमा था दिन भर आइना ।।

ग़मज़दा हैं, ख़ौफ़ में हैं, हुस्न की सब देवियाँ।