30 November 2014

व्यक्तित्व - फलक पर नूर का शजरा –"तुफैल चतुर्वेदी"

फलक पर नूर का शजरा –"तुफैल चतुर्वेदी" 
एक स्केच : मयङ्क अवस्थी

देवनागरी लिपि मे ग़ज़ल की लोकप्रियता चार नामो की कृतज्ञ है –पंडित अयोध्या प्रसाद गोयलीय –सरदार बलवंत सिंह यानी प्रकाश पण्डित –नरेन्द्र नाथ और जिनके बारे मे हम आगे बात कर्ंगे –यानी जनाब मुहत्तरम तुफैल चतुर्वेदी जिनका पूरा नाम विनय कृष्ण  चतुर्वेदी तख़्ल्लुस "तुफैल" है और यह नाम आज गज़ल के दयार मे प्रेम, प्रशंसा, ,भय ,आतंक और अन्य मानस के संचारी भावों के साथ लिया जाता है जिसमे सबसे ऊपर का भाव आदर का भाव है – एक ऐसा व्यक्ति जिसकी ग़ज़ल कहने और समझने की प्रतिभा निर्विवाद श्रेष्ठतम की श्रेणी मे आती है –जो देवनागरी की सबसे दमदार और सबसे प्रशंसित ग़ज़ल पत्रिका लफ़्ज़ के सर्वेसर्वा हैं और जिनकी आवाज़ अदब के बेशुमार शोर गुल मे भी चुप रह कर सुनी जाती है।

पहले नैनीताल और अब ऊधमसिंह नगर की काशीपुर स्टेट के कुलदीपक "तुफैल साहब"चाँदी का चम्मच मुँह मे ले कर पैदा हुये और महज 18 बरस की उम्र मे फकीरी ले कर आध्यात्मिक यात्रा पर  निकल गये –लेकिन ग़ज़ल विधा को अपना सबसे बडा पैरोकार और नुमाइन्दा मिलना था इसलिये मरहूम कृष्ण बिहारी नूर के शाइरी के घराने मे अदब के इस  चश्मो चराग़ की तर्बीयत और परवरिश हुई और बाद मे यही नाम हजारो गज़ल पसन्द  करने वालो और सीखने वालो के लिये परस्तिश और प्रशंसा का सबब बन गया।

अमरीका हो या पाकिस्तान , तुफैल साहब जहाँ भी गये हैं वहाँ के अदबी हल्कों और समाचार पत्रों ने उन्हें हाथों हाथ लिया है।तुफैल फूलों का गुलदस्ता है -हमारे अहद की सबसे खुश्बूदार आवाज़ के मालिक जैसा कि उनको फोन पर सुन कर आपको महसूस होगा। ये बहत्तर निश्तरों वाले तनक़ीदकार भी हैं जैसा कि अपनी गज़ल उनको सुना कर आपको महसूस होगा। ये पत्थर की निगहबानी मे शीशे की हिफाज़त के पैरोकार हैं। चाहे कराची हो या न्यूयार्क हर जगह उन्होने अपनी अप्रतिम और विलक्षण प्रतिभा का लोहा मनवाया है। कुल मिला कर जैसे आध्यात्म मे ओशो रजनीश पर प्रतिक्रिया देना इस दौर के हर तालिबे इल्म की मजबूरी है वैसे ही ग़ज़ल के शहर मे तुफैल के परचम को सलाम करना अदीबों की ज़रूरत ही नही मजबूरी भी है। इनके यहाँ अच्छी ग़ज़ल को वृहत्तर क्षितिज दिये जाते हैं –नामचीन होना कोई पाबन्दी नही है लफ़्ज़ मे छपने के लिये सिर्फ ग़ज़ल पाएदार और ऊंचे मेयार की होनी चाहिये । वो सच कहते हैं सिर्फ सच कहते हैं और सच के सिवा और कुछ नही कहते जिसकी तस्दीक़ उनकी ग़ज़ले और उनके सोशल इश्यूज पर दिये गये तमाम बयानात करते हैं।

विभाजन के बाद भारत की भाषा हिन्दी उर्दू के संक्रमण काल से भी गुज़री और आज  हिन्दुस्तान मे जिस भाषा मे संवाद किया जाता है उसमे हिन्दी , उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्द बेहद सहज रूप मे शुमार हैं। अब सवाल यह है कि "भाषा बहता नीर" के इस दैनन्दिन परिवर्ती स्वरूप मे साहित्य और समाज के लिये स्वीकार्य अंश की निशानदेही और पैरवी कौन करेगा ?!! तो हिन्दुस्तान के लिये और ग़ज़ल फार्मेट के लिये कौन सी भाषा सटीक और उपयुक्त हो सकती है इसकी मुहर आज तुफैल चतुर्वेदी के पास है। जब भारत पाकिस्तान ग़ज़ल मंच के एक मोतबर शाइर ने मंच पर ये शेर सुनाया –

घरों की तर्बियत क्या आ गई टी वी के हाथों मे
कोई बेटा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता

तो “बेटा बाप के ऊपर नही जाता”  –के भाषा –दोष पर फौरन आपति करने वाले तुफैल ही थे –भले ही इस पर प्रकरण मे कितना ही  विवाद क्यों न किया गया हो लेकिन इस संवाद मे जीत तुफैल साहब की ही हुई।

इसी प्रकार जब बशीर बद्र जैसे वरिष्ठ शाइर ने शेर कहा --

गुसलखाना की चिलमन मे पडे किमख़्वाब के पर्दे
नये नोटो की खरखर है पुरानी रेज़गारी मे

तो "गुसलखाना" नही सही लफ़्ज़ "गुस्लखाना" है ये कहने वाले पहले पहले शख़्स तुफैल ही थे। भले ही इस आपत्ति पर उनके बरसों के मरासिम शल हो गये –लेकिन भाषा और उसकी पवित्रता पर उन्होने राई रत्ती आँच नही आने दी। साहित्य और ग़ज़ल विधा अंतस की गहराइयों से इस व्यक्ति की कृतज्ञ है।

तुफैल चतुर्वेदी छह फुट के 52 बरस के नौजवान हैं, इनके कुर्ते मे सोने के बटन लगते हैं और इनका बयान सोलह सोने का होता है –शकर नहीं खाते लेकिन इसके मआनी ये नही कि उनके लहजे मे शकर नही है – वो बेहद आत्मीयता से किसी के साथ भी संवाद करते हैं –लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि इस व्यक्ति का लहजा करख़्त है और चाल ख़ुस्रवाना है। इसका कारण पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि ग़ज़ल फार्मेट और भाषा के विकास के शिखर पर रह कर वे इसकी नुमाइन्दगी करते हैं।

अपने उस्ताद मरहूम जनाब कृष्ण बिहारी "नूर" के घराने को उन्होने आबाद कर रखा है और इस घराने की चौथी –पांचवी पीढी के शाइर भी आज गज़ल के मंच पर अपना जल्वा बिखेर रहे हैं।

जहाँ तक साहित्य सेवा का प्रश्न है उन्होने पाकिस्तान के श्रीलाल शुक्ल जनाब मुश्ताक अहमद यूसुफी साहब के कार्यों का अनुवाद –"खोया पानी" –"मेरे मुँह मे ख़ाक" और "धनयात्रा" बेहद कम समय मे किया और ऐसे समय मे किया जब वो अनेक पारिवारिक उलझनो मे घिरे थे।

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर तुफैल चतुर्वेदी अपने इस्लामिक कट्टरपंथ के विरोध के कारण एण्टी –हीरो की छवि रखते हैं। "जिहाद" शब्द और कुरआन पाक की आयतों की मनमानी व्याख्या करने वाले इस नाम से खासे आतंकित रहते हैं और उनके बयान को अपने धर्म मे हस्तक्षेप की श्रेणी मे रखते हैं –लेकिन सच यह है कि उनकी निर्विवाद मेधा अकाट्य तर्क शक्ति के सामने सभी बौने साबित होते हैं।

शाइर तुफैल के इब्तिदाई दौर से बाबस्ता होने के लिये आपको उनका आज से 22 बरस पुराना संकलन" सारे वरक तुम्हारे" हासिल करना होगा जो किसी भी अच्छे बुक स्टाल पर आज भी आपको आसानी से मिल जायेगा। तब के नौजवान और युवा शाइर की भाषा इतनी सर्वग्राही और साफ सुथरी थी कि तम्हीद लिखते समय विख्यात तनकीदकार गोपीचन्द नारंग भावुक हो गये और उनकी तम्हीद का मर्कज़ इनकी भाषा ही रही। आप भी इन साफ सुथरे , चमकदार और दिल को छू लेने वाले नर्म नाज़ुक अशआर का ज़ायका लीजिये --

मेरे पैरों  मे चुभ जायेंगे लेकिन
इस रस्ते के काँटे कम हो जायेंगे

जिगर के टुकडे मेरे आँसुओं मे आने लगे
बहाव तेज़ था पुश्ता नदी ने काट दिया


हम तो समझे थे कि अब अश्कों की किस्तें चुक गयीं
रात इक तस्वीर ने फिर से तकाज़ा कर दिया

ज़रूरत पेश आती दुश्मनी की
तआल्लुक इस कदर गहरा नही था

अपना विरसा है ये किरदार, संभाले हुए हैं
इस हवा में हमीं दस्तार संभाले हुए हैं

कोई वीराना बसाना तो बहुत आसां था
हम तिरे शहर में घर-बार संभाले हुए हैं

तमाम शहर को फूलों से ढँक दिया मैंने
मगर बहार को उसने बहार माना क्या

छोड़ देता है दिन किसी सूरत
शाम सीने पे बैठ जाती है

दिन नहीं आता मेरी दुनिया में
रात जाती है रात आती है

दुनिया तिरे अहसास में नर्मी भी चुभन भी
रस्ते में मिले फूल भी घमसान का रन भी

अच्छा है कि कुछ देर मिरी नींद न टूटे
है ख़ाब के आग़ोश में बिस्तर भी बदन भी

अदब मे तुफैल साहब की जो हैसियत है उसको एक वाक्य मे यूँ कहा जा सकता है कि  –इस शख़्सीयत को अदब के बेशतर दायरों मे सराहा गया है जो दायरे इनसे तटस्थ हैं वहाँ इनको महसूस किया गया है और जो दायरे हमलावर हैं वहाँ इन्हे बर्दाशत किया गया है।यानी कि अदीबों के प्रतिक्रिया उनकी निजी भावना के अनुसार है लेकिन ऐसा कभी नही हुआ कि कोई इस व्यक्ति के स्पर्श के बाद खुद को प्रतिक्रियाविहीन रख पाया हो। कुल मिला कर तुफैल "जाकी रही भावना जैसी ....." के मानदण्ड पर खरे उतरते हैं।


तुफैल साहब मे अना अधिक है या पिन्दार इस पर बहस दीगर है क्योंकि हमारे लिये वो सबसे आदरणीय नामो मे से एक है –लेकिन यह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उनमे धैर्य स्नेह क्षमता और समर्पण जैसे कमयाब मानवीय गुण औरो से बहुत अधिक हैं और यही कारण है कि अपने विरोधियों की तमाम साजिशों के बावज़ूद ये नाम आज साहित्य के सबसे सशक्त नामो मे से एक है।

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