30 November 2014

ग़ज़ल - ‘शेफ़ा’ कजगाँवी

बन गया तिश्नालबी की जो निशानी एक दिन
ज़ुल्म की आँखों में भी लाया वो पानी एक दिन

ख़ुश्क लहजा तल्ख़ जुमले और बलन्दी का नशा
पस्तियाँ दिखला न दे ये लन्तरानी एक दिन

जैसे मिट्टी के खिलौने अब नहीं मिलते कहीं
ख़त्म हो जाएँगी लोरी और कहानी एक दिन

ऐसे जज़्बे जो पस-ए-मिजगाँ मचलते रह गये
आँसुओं ने कर दी उन की तर्जुमानी एक दिन

अपनी हर ख़्वाहिश को तुम पामाल कर के चुप रहे
बन न जाये रोग ऐसी बेज़ुबानी एक दिन

ख़त्म कर के हर निशानी ये तहय्या कर लिया
हम भुला देंगे सभी यादें पुरानी एक दिन

बा-रहा अञ्जाम से यूँ बा-ख़बर उस ने किया
दार पर चढ़वा न दे ये हक़-बयानी एक दिन

सोचते हैं तेरे अपने बस तेरे हक़ में ‘शेफ़ा’
दूर कर ले अपनी सारी बदगुमानी एक दिन

शेफ़ा’ कजगाँवी

3 comments:

  1. बहुत बहुत शुक्रिया नवीन जी

    ReplyDelete
  2. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  3. यह गज़ल मै कम से कम १० बार पढ़ चूका हूँ , बहुत उम्दा ग़ज़ल है शेफ़ा जी .......

    ReplyDelete

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।

My Bread and Butter