10 November 2013

ग़ज़ल की प्रचलित 32 बहरें

प्रणाम 

आदरणीय आर. पी. शर्मा महर्षि जी की विभिन्न पुस्तकों से अर्जित जानकारी के आधार पर तथा उस्ताज़ आदरणीय तुफ़ैल साहब की निगरानी में काम करते हुये आज ग़ज़ल की प्रचलित 32 बहरों पर काम पूरा हुआ। बहरें तो और भी कई हैं, परन्तु मैंने मुख्यत: व्यावहारिक तथा महर्षि जी द्वारा निर्देशित बहरों को ही केंद्र में रखा है। समस्त 32 बहरों को उन के नाम, अरकान, वर्णिक संकेत तथा उदाहरण सहित तालिका स्वरूप में पेश कर रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कि यह प्रयास इच्छुक व्यक्तियों के लिये उपयोगी सिद्ध होगा। यदि इस उपक्रम में मेरे कम-इल्मी या असावधानीवश कहीं कोई भूल रह गई हो तो मैं उस के लिये क्षमा प्रार्थी हूँ तथा आप सभी से विनम्र निवेदन करता हूँ कि उक्त ग़लती को संज्ञान में लाते हुये सुधरवाने की कृपा करें। यदि आप को लगे कि यह प्रयास आप के काम का है तो जीवन में कम से कम एक व्यक्ति तक इस जानकारी को पहुँचा कर मुझे अनुग्रहीत करें। 


क्र.
बह्र का नाम
बह्र के अरकान , वर्णिक संकेत 
[1= लघु अक्षर, 2 = गुरु अक्षर]
शेर बतौरेनज़ीर
1
बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
ये चमन ही अपना वुजूद है
इसे छोड़ने की भी सोच मत
नहीं तो बताएँगे कल को क्या
यहाँ गुल न थे कि महक न थी 
2
बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22
प्या को प्या करना था केवल
एक अक्षर बदल न पाये हम
3
बहरे मज़ारिअ मुसम्मन मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़
मुख़न्नक मक़्सूर
मफ़ऊलु फ़ाइलातुन मफ़ऊलु फ़ाइलातुन
221 2122 221 2122
जब जामवन्त गरजा, हनुमत में जोश जागा
हमको जगाने वाला, लोरी सुना रहा है
4
बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22  
भुला दिया है जो तूने तो कुछ मलाल नहीं
कई दिनों से मुझे भी तेरा ख़याल नहीं
5
बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब
मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
 221 2121 1221 212
क़िस्मत को ये मिला तो मशक़्क़त को वो मिला
इस को मिला ख़ज़ाना उसे चाभियाँ मिलीं 
6
बहरे मुतकारिब मुसद्दस सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122
कहानी बड़ी मुख़्तसर है
कोई सीप कोई गुहर है 
7
बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन   
122 122 122 122
वो जिन की नज़र में है ख़्वाबेतरक़्क़ी
अभी से ही बच्चों को पी. सी. दिला दें
8
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़उल
122 122 122 12
इबादत की किश्तें चुकाते रहो
किराये पे है रूह की रौशनी
9
बहरे मुतदारिक मुसद्दस सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212
सीढ़ियों पर बिछी है हयात
ऐ   ख़ुशी! हौले-हौले उतर
10
बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आख़िर
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ा
212 212 212 2
अब उभर आयेगी उस की सूरत
बेकली रंग भरने लगी है
11
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212
जब छिड़ी तज़रूबे और डिग्री में जंग
कामयाबी बगल झाँकती रह गयी
12
बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू मुख़ल्ला
मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन
1212 212 122 1212 212 22
बड़ी सयानी है यार क़िस्मत,
सभी की बज़्में सजा रही है
किसी को जलवे दिखा रही है
कहीं जुनूँ आजमा रही है
13
बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212
ये नस्लेनौ है साहिबो
अम्बर से लायेगी नदी
14
बहरे रजज़ मुसद्दस मख़बून
मुस्तफ़इलुन मुफ़ाइलुन
2212 1212
क्या आप भी ज़हीन थे?
आ जाइये – क़तार में
15
बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212
मैं वो नदी हूँ थम गया जिस का बहाव
अब क्या करूँ क़िस्मत में कंकर भी नहीं
16
बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212 2212
उस पीर को परबत हुये काफ़ी ज़माना हो गया
उस पीर को फिर से नयी इक तरजुमानी चाहिये
17
बहरे रमल मुरब्बा सालिम
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122
मौत से मिल लो, नहीं तो
उम्र भर पीछा करेगी
18
बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
सनसनीखेज़ हुआ चाहती है
तिश्नगी तेज़ हुआ चाहती है
19
बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलुन ,
2122 2122 212
अजनबी हरगिज़ न थे हम शह्र में
आप ने कुछ देर से जाना हमें
20
बहरे रमल मुसद्दस सालिम
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122 2122
ये अँधेरे ढूँढ ही लेते हैं मुझ को
इन की आँखों में ग़ज़ब की रौशनी है
21
बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212
वह्म चुक जाते हैं तब जा कर उभरते हैं यक़ीन
इब्तिदाएँ चाहिये तो इन्तिहाएँ ढूँढना
22
बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
2122 1122 1122 22
गोया चूमा हो तसल्ली ने हरिक चहरे को
उस के दरबार में साकार मुहब्बत देखी
23
बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]
फ़इलातु फ़ाइलातुन फ़इलातु फ़ाइलातुन
1121 2122 1121 2122  
वो जो शब जवाँ थी हमसे उसे माँग ला दुबारा
उसी रात की क़सम है वही गीत गा दुबारा
24
बहरे रमल मुसम्मन सालिम
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122 2122 2122
कल अचानक नींद जो टूटी तो मैं क्या देखता हूँ
चाँद की शह पर कई तारे शरारत कर रहे हैं
25
बहरे हज़ज  मुसद्दस महजूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन ,
1222 1222 122 
हवा के साथ उड़ कर भी मिला क्या
किसी तिनके से आलम सर हुआ क्या
26
बहरे हज़ज  मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222
हरिक तकलीफ़ को आँसू नहीं मिलते
ग़मों का भी मुक़द्दर होता है साहब
27
बहरे हजज़ मुसमन अख़रब
मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ महज़ूफ़
मफ़ऊलु मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन
221 1221 1221 122
आवारा कहा जायेगा दुनिया में हरिक सम्त
सँभला जो सफ़ीना किसी लंगर से नहीं था
28
बहरे हज़ज मुसम्मन अख़रब
मक़्फूफ़ मक़्फूफ़ मुख़न्नक सालिम
मफ़ऊलु मुफ़ाईलुन मफ़ऊलु मुफ़ाईलुन
221 1222  221 1222 
हम दोनों मुसाफ़िर हैं इस रेत के दरिया के
उनवाने-ख़ुदा दे कर तनहा न करो मुझ को
29
बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर
मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम 
फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन
212 1222  212 1222 
ख़ूब थी वो मक़्क़ारी ख़ूब ये छलावा है
वो भी क्या तमाशा था ये भी क्या तमाशा है
30
बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर
मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़
फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
212 1212 1212 1212
लुट गये ख़ज़ाने और गुन्हगार कोइ नईं
दोष किस को दीजिये जवाबदार कोई नईं
31
बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
1212 1212 1212 1212
गिरफ़्त ही सियाहियों को बोलना सिखाती है
वगरना छूट मिलते ही क़लम बहकने लगते हैं
32
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222
मुझे पहले यूँ लगता था करिश्मा चाहिये मुझको
मगर अब जा के समझा हूँ क़रीना चाहिये मुझको





44 comments:

  1. आ.नवीन भाईसाहब
    बहुत उपयोगी जानकारी है |आपका प्रयास वन्दनीय है |
    सादर

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  2. अति उपयोगी जानकारी. बहुत आभार आपका.

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  3. कई मायनों में एक उपयोगी पोस्ट के लिए धन्यवाद, नवीनभाईजी.

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  4. प्रथम दृष्ट्या क्रम सं. 9 और क्रम सं. 11 में नाम सही रूप से अलग होने के बावज़ूद मिसरों के वज़्न का उदाहरण एक ही हो गया है. क्रम सं 11 में मिसरे के वज़्न में आखिरी रुक्न को बढ़ा कर दुरुस्त कर लिया जाय.
    सादर

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    1. आभार आदरणीय, मैं अभी इसभूल को दुरुस्त करता हूँ। आप और भी चेक कीजिएगा। पुन: आभार।

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  5. नवीन जी, बहुत ही उपयोगी जानकारी साझा करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

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  6. अति उपयुक्त संग्रहणीय जानकारी उपलब्ध कराने हेतु सादर आभार आदरणीय

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  7. आदरणीय नवीज जी, इस उपयोगी जानकारी के लिए हार्दिक धन्यवाद स्वीकार कीजिये !

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  8. बेहतरीन जानकारी संजोये हुये एक उत्‍कृष्‍ट पोस्‍ट ....
    आभार

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  9. अच्छा प्रयास है...बधाई!

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  10. आदरणीय आर.पी.शर्मा जी महर्षि ने हिन्‍दी भाषियों के मध्‍य ग़ज़ल विधा को जिस तरह सहज बनाया है उसके लिये हिन्‍दी में ग़ज़ल कहने वालों के मध्‍य वे सदैव सम्‍मान के पात्र रहे हैं और रहेंगे।

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  11. बहुत सुन्दर जानकारी के लिए आभार !
    नई पोस्ट काम अधुरा है

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  12. bahut sundar jaankaari aur aapka sarahneey prayaas

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  13. निश्चय ही मैं अन्य सभी की भाँति एक ही प्रकार की हाँ जी..हांजी वाली टिप्पणी नहीं करूंगा .....
    ----- जानकारी अपने स्थान पर उपयोगी है ही ..अच्छी कसरत भी है....परन्तु व्यवहारिक रूप में ग़ज़ल लिखने कहने हेतु ये कितनी आवश्यक एवं उपयोगी हैं, क्या गज़लकार कहने व लिखते समय इन बहरों को याद रखता है वह तो स्वयं ही बनती जाती है ...जैसे गीत लिखते गाते समय छंद , गण अपने आप बनता जाता है |. ग़ज़ल व गीत तो मन की भाव-तरंग है जो लिख/कह जाती है ....बाद में लोग उसे बहर, छंद अदि कह देते हैं| अतः यह सब अनावश्यक है --- इन सब से कविता की भाव-तरंग बाधित होती है.....

    तू गाता चल ऐ यार कोइ कायदा न देख ,
    कुछ अपना ही अंदाज़ हो खुद्दारी ग़ज़ल होती है |

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    1. आप के विचारों का स्वागत है। मगर आप कमर के नीचे पतलून पहनते हैं या कमीज़? या फिर.........

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    2. ये बात ठीक है कि जब भाव उठते हैं तो लय तलाश लेते हैं और हर शायर की कुछ प्रिय बह्र होती हैं; लेकिन ज़रूरी नहीं कि बह्र समझे बिना जो कहा जाये वह ग़ज़ल कहलाये। हर विधा के कुछ नियम होते हैं और ग़ज़ल में रदीफ़ काफिया की बात तो बहुत लोग करते हैं लेकिन बह्र, रुक्‍न और रुक्‍नॉंश की बात पहले हिन्‍दीभाषियों को सहज उपलब्‍ध नहीं थी। इस दिशा में महर्षि जी के प्रयास नकारे नहीं जा सकते हैं
      यह सही है कि बह्र से कविता की भाव-तरंग बाधित होती है लेकिन यही तो एक अच्‍छे ग़ज़ल कहने वाले की खूबी होती है कि वह इन बाधाओं को पार करता है।
      हाल ही में उत्‍तरॉंचल में अतिवर्षा के परिणामस्‍वरूप जो हुआ उसे सूर्यभानु गुप्‍त जी ने एक लंबी ग़ज़ल के माध्‍यम कहकर सिद्ध किया है कि ग़ज़ल विधा के नियमों का पालन करते हुए भी कहन पर पूरी पकड़ कायम रखी जा सकती है।

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    3. ग़ज़ल की विशेषता रदीफ़ व काफिया ही है ....बहर आदि लय गति यति हैं जो काव्य की विशेषता है न कि विशेषकर ग़ज़ल की...ठीक उसी प्रकार जैसे छंदों की तुक, मात्रा व गण आदि उनकी अलग अलग कलात्मक विशेषताएं हैं एवं लय गति यति सभी की मूल काव्य-विशेषताएं हैं ....अतः इन सबको घसीटने की कोइ आवश्यकता नहीं है..... -------कहन पर पूरी पकड़ काव्यात्मक विशेषता से आती है अतः सूर्यभान गुप्ता जी की ग़ज़ल में वे सब सौन्दर्य अवश्य होंगे ....

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    4. नवीन जी.....क्या आपके अनुसार ग़ज़ल में लय गति यति के अनुसार ग़ज़ल कहना ...कमीज़ को पेंट के स्थान पर पहनना कहलाता है ........और पेंट को कमर के नीचे पहनने हेतु उसे सिरकी तरफ से पहले पहना जाना चाहिए तब नीचे लाना चाहिए.....

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    5. shyam ji mujhe bade hi bhari man se aap ko suchit karna paD raha hai ki is blog ke tamam saathee aap ke kaaran dukhi hain aur anek baar aap ko block karne tak ke liye kahte rahe hain. main aap se savinay nivednan karta hun ki main is tarah ke kaam karne kaa pakshdhar nahin hun is liye mujhe shanti se apni saadhanaa karne dijiye aap ki vidwattaa ke liye aur bahut saare akhaaDe pahle se maujood hain, aap vahaaN apne mugdar ghumaaiyega...........

      main aap ke sadgyaan kaa sadaiv samman karta hun, karta rahunga, aap zarur padhaariyega magar bina sir-pair kee baatein karne ke liye nahin. is Vishay par aage koi vaartaapaal n karien please............. is ke baad yadi koi tippaNee aayee to use delete karnaa paDegaa.

      saadar naman

      Delete
    6. Shyam Gupta Ji:

      Aap ki tahreer is baat ka pata deti hai ke aap seriously is issue ke baare main apni aik munfarid raaye rakhte hain.....aur masha allah ye buhat khoobsurat aur qaabil e tareef baat hai
      Lekan is mozu ke baare main gahan research karne ki zarorat hai aap ko......aap ki pasand na-pasand se faislay naheen ho sakte.....asaatiza ne prose aur poetry ki bharpoor pehchaan ke liyay hi ye qaaeday tay kiyay hain,is main koei hidden agenda naheen hai siwaaye is ke ke adab main aik tanzeem aur tahzeeb bani rahe........aap itne hatti na banen, aap is subject par focus keejay.........aap ko buhat achcha lage ga............aap ke comments is janib ishaara hain ke aap ye sab baatain sincerely kar rahe hain...aap ki niyyat pe bhi koei shak naheen hai mujhy (aur phir aaj ke dor main aese adab-mizaaj milte bhi kahaan hain) lekan naveen ji ne jo mehnat alag se ki hai....uss ka ahtaraam kiya hi jana chahiyay................

      aakhri baat:
      ke jahaan tak aap ne comments kiyay hain main ne badi dilchaspi se padhe, lekan jyon hi aap ne ye aik share bhi sath main quote kiya:
      तू गाता चल ऐ यार कोइ कायदा न देख ,
      कुछ अपना ही अंदाज़ हो खुद्दारी ग़ज़ल होती है |

      to kafi hadd tak meri rai aap ke baare main kharaab ho gayi....
      aap bila-shak bahr o wazan ke in nazuk o nafees maamlaat se BHARPOOR NA_WAQIF hain.......buhat afsoos huwa....
      Lagta hai ke aap lay-kaari ke hawale se itne un-tune ho chuke hain ke ab bazaabta wazan aap ko sikha paana na-mumkin hai
      Jaise wazan bahr ke qaiday sikhaane mushkil hain, wese hi kisi be-wazan ko uss ko be-wazni ke azaab se bahar le aana mushkil hota hai....allah hi koei karishma kare to kare, aap ka rythem main laotna(sorry,tak pohanchna) na-mumkin hai....
      apna thode buhat tajrubay se mujhy yahi lagta hai...

      Meri tippani ko zaati tor pe na leejay ga....ye bas baat sahi direction main aagay badhane ka aik saleeqa-bhar hai...
      Khush rahyay...

      Delete
    7. Behad umda jankari saral tareeke se di gai bahut bahut sukariya

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  14. आप समझाए शुक़्रिया आपका
    मैं न समझा यह मेरी बदकिस्मती

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  15. काश ये अनमोल लेख मुझे आज से 45 बरस पहले मिला होता तो आज मुझे कितनी जानकारी हो चुकी होती। मैं आप का ह्रदय से आभारी हूँ कि आप ने यह पोस्ट भेजी है। हम जैसे हिंदी के क़लम से उर्दू को पूजने वालों की और से अभिनन्दन।
    "कुछ और ही सिंगार है हम जैसो के दम से / हम पूजते हैं उर्दू को हिंदी के क़लम से "

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    Replies
    1. क्यों आप पूजेंगे उर्दू को हिन्दी की कलम से......क्या हिन्दी को पूजना अभीष्ट नहीं है ....

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  16. khubsurat jaankariyaaN di haiN aapne Navin bhai maiN ummeed karta huN ki hum jaise tifle maqtab yahaaN se faiz uthayeNge buhat shukria

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  17. एक ही स्थान पर समस्त उपयोगी बहरों की जानकारी देकर हम ग़ज़ल के विद्यार्थियों पर कृपा की है श्री नवीन जी आपने आभारी हूँ ...मैं अरसे से ऐसी पोस्ट ढूंढ रहा था ...लाख टेक की सीख है ..टांक लेता हूँ ...बहुत आभार ...ऊपर की कई टिप्पणियाँ पढीं बेसिक ये कि अगर हम ग़ज़ल कहें तो उसे ग़ज़ल - व्याकरण की कसौटी पर खरा होना चाहिए ...जानबूझकर गलतियां की जाएँ या दोहराई जाएँ और तर्क वितर्क किये जाएँ यह उचित नहीं फिर कुछ लिखे को कविता ही कहें ग़ज़ल कहना ज़रूरी नहीं . आपका ऋणी हूँ और चार अच्छी बाबहर ग़ज़लें कहकर ही उरिन होऊंगा :) शुक्रिया और अभिवादन !!

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  18. लाख टके का लेख !! सर ग़ालिब की कृपा आप पर बनी रहे !!!

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  19. दादा को प्रणाम
    हम जैसे ग़ज़ल के नए विद्यार्थियों के लिए तो यह एक वरदान है

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  20. ये 1 और 2 में क्या अंतर होता है जैसे 11212 और 2122 ?

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    1. 1 means laghu akshar as ka kha ga and 2 means deergh / guru akshar as kaa khaa gaa

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  21. बहुत ही उपयोगी! हार्दिक आभार!

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  22. इस पोस्ट ने मेरी सब शंका दूर कर दी आभार आपका

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  23. हार्दिक धन्यवाद

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  24. बहुत ही बेहतरीन पोस्ट नवीन जी ...!!

    सादर !

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  25. अगर इन सभी जानकारी के साथ इन सभी बहरों की तरन्नुम और पता चल जाये तो मजा आ जाये

    धन्यवाद

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  26. आदरणीय नवीन जी,
    सादर प्रणाम

    एक जिज्ञासा है- क्या इन बहरों में कुछ मात्राएँ समान रूप से जोड़ी जा सकती हैं ?
    जैसे मैंने एक मतला लिखा--

    सफ़र अंजान है और रास्ते उलझे हुए
    भटक जाते सभी अक्सर यहाँ चलते हुए

    जो विन्यास निकलकर आया वह है - 1222 1222 1222 12

    आपने जो लिस्ट दी है उसमे ऐसी कोई बहर नहीं है। सबसे निकट बहर है- 1222 1222 1222 .

    तो क्या यह बहर मानी जाएगी या नहीं

    सादर
    प्रताप

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    Replies
    1. बहरे हजज़ मुसद्दस मकसूर। 1222 1222 1222 12...
      सालिम के स्थान पर मकसूर हो जायेगा, क्रम 26 वाली बहर सालिम है,

      Delete

  27. वैसे आपने लिखा है कि बहरें तो और भी कई हैं। क्या बहरों की संख्या सीमित है या सामन मात्राएँ रखते हुए कोई भी बहर बनाई जा सकती है ?

    एक बार मैंने कुछ यूँ लिखा --

    नम हैं आँखें और हमारे दिल जले हुए
    चल रहे हम फिर भी लेकिन लब सिले हुए
    2122 2122 212 12

    एक जानकार सज्जन ने कहा कि ऐसी कोई बहर नहीं है इसे इसे शेर नहीं कहा जा सकता है.

    मेरी जिज्ञासा मुख्यतः यही है कि क्या बहरों की संख्या निर्धारित है और उसी बहर में ग़ज़ल कहनी चाहिए या फिर सामान विन्यास वाले किसी भी बहर का प्रयोग कर सकते हैं.

    सादर
    प्रताप

    ReplyDelete
  28. भाई प्रताप नारायण जी नमस्कार। यहाँ बहु-प्रचलित ग़ज़ल की बहरों की जानकारी बाबत बात की गयी है। ग़ज़ल की बह्रें और भी हैं। प्रयोग पहले भी हुये हैं और भी हो रहे हैं। जिन प्रयोगों को अधिक लोग अपना लेते हैं, वह सिस्टम में समाहित हो जाते हैं। बाक़ी प्रयोग भी चरचा में तो कहीं न कहीं कभी न कभार रहते ही हैं। यदि मानव जाति ने प्रयोग न किये होते तो हमें गेंहू,टमाटर; गुलाब; दूध वग़ैरह कैसे दस्तयाब होते। हाँ स्वीकार्यता के लिये सरसता एक अत्यधिक अनिवार्य तत्व है। मुझे लगता है सम्भवत: मैं आप के प्रश्न का उत्तर दे पाया हूँ।

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  29. बहुत ही उपयोगी पोस्‍ट नवीन जी

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  30. भाई नवीन जी आज के समय में लोग बहुत सी गज़लें लिख रहे हैं वह बहर में तो हैं परंतु आपकी लिखी 32 बहरों से अलग हैं । उन्हें उर्दू शायर कहते हैं यह तो कोई बहर ही नही है । यह बन्धन तो ग़ज़ल का दायरा ही सीमित कर देता है । यदि ऐसा कोई नियम भी हो जो इन 32 से के बाद की बहर को भी मान्यता देता हो तो उसका भी उल्लेख कीजिये । मजबूरन लोग अपनी ग़ज़लो को गीतिका नाम देने लगे हैं ।

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  31. भाई नवीन जी आज के समय में लोग बहुत सी गज़लें लिख रहे हैं वह बहर में तो हैं परंतु आपकी लिखी 32 बहरों से अलग हैं । उन्हें उर्दू शायर कहते हैं यह तो कोई बहर ही नही है । यह बन्धन तो ग़ज़ल का दायरा ही सीमित कर देता है । यदि ऐसा कोई नियम भी हो जो इन 32 से के बाद की बहर को भी मान्यता देता हो तो उसका भी उल्लेख कीजिये । मजबूरन लोग अपनी ग़ज़लो को गीतिका नाम देने लगे हैं ।

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काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

My Bread and Butter

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