30 November 2014

मराठी गजल – नवीन सी. चतुर्वेदी




मराठी गजल – नवीन सी. चतुर्वेदी


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https://m.youtube.com/watch?v=j6xgsnc76yA


हो! तुला विसराय चे राहून गेले।
जिन्दगी समजाय चे राहून गेले॥



वेदनेच्या पार पर्मोत्कर्ष होता।
वेस ओळण्डाय चे राहून गेले॥

महफिलो-महफिल सुखा ची सन्धि होती।
बस, अटी पाणाय चे राहून गेले॥



ज्या क्षणी सामीप्य नी सत्कार केला। 
त्या क्षणी तूटाय चे राहून गेले॥







सर्व सुख असताना ही अडचण हवे
काही लोकांना सतत भाण्डण हवे

काही लोकांना जमत नाहीं प्रयास
ठिकठिकाणी बस्स आरक्षण हवे

ज्यांनी घर जङ्गल बनविला त्यांना ही
आज त्यांच्या साठी संरक्षण हवे

शिक्षणार्थ्यांना प्रशिक्षण द्यायला
आज गुरु लोकांना ही शिक्षण हवे

आपली प्रगतीच्या दर्पण बघ नवीन
आज हसण्या साठी ही कारण हवे

भावार्थ :

सब सुविधाएँ होते हुये भी असुविधाएँ चाहिये
कुछ लोगों को बस झगड़ा चाहिये

कुछ लोगों को प्रयास नहीं जमता
हर जगह बस आरक्षण चाहिये

जिन्हों ने घर जङ्गल बनाया उन को भी
आज उन के लिये संरक्षण चाहिये

विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देने के लिये
आज गुरु लोगों को भी शिक्षण चाहिये

अपनी प्रगति का आईना देख नवीन
आज हँसने के लिये भी कारण चाहिये



एक तिला विसरायला राहून गेले
अन स्वत: बदलायला राहून गेले

ते स्वत: घेऊन आले होते उत्तर
प्रश्न जे सोडायला राहून गेले

गाँवाहून आले शहर जे मानवी, ते
गाँवाला परतायला राहून गेले

देश-भाषा-जाति-मज़हब मोजले, बस
मानवी मोजायला राहून गेले

आमची तुमची म्हणत बसले सकल-जन
आपली बोलायला राहून गेले


भावार्थ :

एक उसे भूलना रह गया
और ख़ुद बदलना रह गया

वो स्वयं उत्तर ले कर आए थे
जिन प्रश्नों को हल करना रह गया

गाँव से जो लोग शहर आये, उन का
गाँव वापस जाना रह गया 

देश-भाषा-जाति-मज़हब गिने, मगर
मनुष्यों को गिनना रह गया

सभी लोग हमारी[मेरी-तुम्हारी] कहते रहे

हमारी [हम-सब की] बोलना रह गया


[शायर की माँ-बोली मराठी नहीं है]

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