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व्यंग्य - टेस्टायमान भव - अर्चना चतुर्वेदी

देखो भई हम हैं नए ज़माने के यानी मशीनी युग के लोग | हर काम मशीनों से करने के आदीहाथ से कोई काम ना करें | 

व्यंग्य - कंजूसों का बादशाह - डॉ. प्रमोद सागर

कहते हैं कि हर मुल्क, हर क़ौम और हर मोहल्ले में, कमोबेश एक न एक बादशाह ज़रूर पैदा होता है—कहीं शायरी का, कहीं सियासत का, कहीं जुर्म का। मगर हमारे दौर का जो बादशाह है, वह न ताज पहनता है, न सिंहासन पर बैठता है; वह बैठता है अपनी तिजोरी पर, और ताज की जगह

व्यंग्य - आम आदमी और मसीहा – कमलेश पाण्डेय

वो भी एक आम आदमी ही हैइसमें संदेह की कोई गुंजाईश नहीं दिखती।  इस वजह के अलावा कि सीजन के सबसे आम फल आम को वो खूब पसंद करता हैऔर अपने परिवेश में शक्तिशाली व्यक्ति या संस्थाओं को खुद इसी रसीले फल सरीखा नज़र आता है, कुछ और तथ्य भी हैं जो उसे आम सिद्ध करते हैं।  

व्यंग्य - हम गुटबाजी नहीं करते - अर्चना चतुर्वेदी

हम गुटबाजी से दूर रहते हैं ...

मठ बनाने वाले हमें सख्त नापसन्द हैं |

हम ग्रुप बनाते है, हम लोग एक दूसरे को चढाते हैं, किसी छठे को हम टिकने भी नहीं देते पर हम गुटबाजी से दूर रहते हैं |

व्यंग्य - मिडिल क्लास- द डोनर - समीक्षा तैलंग

दान-पुण्य की बातें हम न करें तो कौन करेगा!! भारत में जन्म लेनेवाला, दान का भाव साथ लेकर जन्मता है। बात ये है कि वे भी और हम भी इसी माटी के हैं। समय के साथ वे जोंक बन गए और हम मनुष्य के मनुष्य ही रहे। उन्हें जोंक का आहार-व्यवहार बड़ा पसन्द आता। हमारे लिए नापसन्दगी जैसा कुछ था ही नहीं,,,। हमारी जुर्रत भी नहीं थी कि हम अपनी पसन्द बतायें। हम तो वे हैं जो ट्रेन की निचली बर्थ देकर मिडिल पर एडजस्ट हो जाते हैं। जरूरत पड़े तो बस के बोनट पर आराम भी फरमा लेते हैं।

व्यंग्य - आचार्य अतरंगी - सुभाष काबरा

महाभारत का युद्ध जीतने के बाद एकदिन कृष्ण ने अर्जुन से कहा, ‘हे पार्थ! तुम अच्छे योद्धा हो. अब मुझसे गीता सुनने के बाद, विद्वान भी हो गये हो. मेरा मन है कि तुम आचार्य अतरंगी के पास जाओ और उन्हें शास्त्रार्थ में हरा कर आओ!’

व्यंग्य - शादी के मौसम में भूषण के छंद - अरुणेन्द्र नाथ वर्मा


शादी की मौसम गर्माया हुआ है. बैंड-बाजा-बारात के धंधे के आगे अन्य हर धंधा मंदा पड़ गया है. शहर की सडकों पर बारातियों के झुंड के झुंड टिड्डी दल की तरह उमड़ पड़े हैं. गलियों के ऊपर शामियाने तने हुए हैं. बारातों से अवरुद्ध सड़कें ज़ुकाम के प्रकोप से बंद नाक की तरह न अनुलोम के लायक रह गई हैं ना विलोम के. घंटों पहले घर से निकली गृहस्वामिनी

व्यंग्य - शो ऑफ युग - अर्चना चतुर्वेदी

कलियुग सतयुग आदि चार युगों के बाद जो पांचवा युग है वो है दिखाबा युग अंग्रेजी में बोलेन तो शो ऑफ़ युग ...इस युग के लोग हर चीज दुनिया को दिखाकर ही खुश होते हैं ..वे जमाने गए जब कहा जाता था दान गुप्त रखो ..अपनी तारीफ़ खुद मत करो आदि | अब तो दिखाया नहीं तो समाज में बैठने लायक नहीं समझे जायेंगे

व्यंग्य - आ बैल मुझे मार - अर्चना चतुर्वेदी

 यदि आप आ बैल मुझे मार टाइप कहावत का वास्तविक अनुभव लेना चाहते हैं और गलती से या खुशनसीबी से आप साहित्य की दुनिया में भी हैं तो आप चाचा मामा पिता पत्नी जिससे भी आपको प्रेम हो तुरंत उनके नाम से एक पुरस्कार शुरू कर दें , यदि आपको सिर्फ खुद से प्रेम हो और खुद को महान भी समझते हैं तो अपने मरने का इंतजार करने की जरूरत नही आप अपने नाम से ही पुरस्कार शुरू कर दें आपकी महानता में चार चाँद लगाने का कार्य दूसरे कर ही देंगे ।

व्यंग्य - साहित्य का रेंगता कीड़ा - मुकेश असीमित

  

चैम्बर में बैठा अपने पीछे की अभी तक खाली पडी अलमारी को देख रहा हूँ ,आलमारी में शीशे लगवा लिए ,बस इंतज़ार है तो कुछ दो चार पुरुस्कारों का जो भूले भटके से कोई मेरी झोली में भी डाल दे! 

देखोपुरस्कार की सब जगह पूछ है। बिना पुरुस्कृत लेखक समाज में तिरस्कृत सा डोलता है। पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशक भी उन्ही लेखकों

व्यंग्य - कर लेना काम है सरकार का - कमलेश पाण्डेय

टैक्स को कर कहा गया है। यही करदाता के करों से किसी कर्ता के हाथों में आकर उसे कुछ करने की प्रेरणा और शक्ति देता है। कर सभी देते हैंवो भी जिनकी कमर कर के बोझ से टूटी हुई होती हैमगर कर्ता गिने चुने ही होते हैं जिन्हें करों की राशि से संपन्न होने वाले काजों से अच्छा कट प्राप्त होता है। कर चाहे कड़ाई से वसूला जाता होउससे

व्यंग्य - सच्चे देशभक्त - अर्चना चतुर्वेदी

हम भारतीय लोग दिल से बड़े ही प्यारे होते हैं और बड़े ही एडजस्टिंग टाइपहम हर त्यौहार हर माहौल में खुद को सेट कर लेते हैं | जैसे वेलेंटाइन डे और करवा चौथ पर हम सोहनी महिवाल और शिरी फरहाद को भी कोम्प्लेक्स दे सकते हैं | मदर्स डे और फादर्स डे पर हर तरफ श्रवण कुमार की खेती लहलहाने लगती है | ठीक उसी तरह 26

'लव की हॅप्पी एंडिंग' एवं 'कुछ दिल की कुछ दुनिया की' - पुस्तक समीक्षा

अब जरूर हम मथुरा को ठीकठाक सा एक टाउन कह सकते हैं मगर 1990 के आसपास मथुरा इतना डिवैलप नहीं हुआ था । हालाँकि रिफायनरी आ चुकी थी, टाउनशिप बस चुकी थी, कॉलोनियों की बात हवाओं में तैरने लगी थी फिर भी 1990 का मथुरा 1980 के मथुरा से बहुत अधिक उन्नत नहीं लगता था ।

उस मथुरा की एक गली में जन्मी हुई लड़की की शादी महानगर में होती है । मथुरा के संस्कारों को मस्तिष्क में और महानगर वाले पतिदेव के अहसासात को दिल में सँजोये हुए वह गुड़िया बाबुल का घर छोड़ कर पी के नगर के लिए निकल पड़ती है । जिस तरह कहते हैं न कि दुनिया गोल है उसी तरह गृहस्थी की दुनिया भी सभी जगह और सभी के लिए गोल-मोल ही होती है । उस गोल-मोल दुनिया में यह लड़की डटकर परफोर्म करती है, दूरदर्शन, सी एन एन, सी एन बी सी, डी डी भारती और आई बी एन से मीडिया अनुभव ग्रहण करते हुए कालान्तर में एक सफल लेखिका बन कर राष्ट्रीय पटल पर छा जाती है । इस लड़की का घर का नाम गुड़िया ही है और अब भारतीय साहित्य-जगत इसे अर्चना चतुर्वेदी के नाम से जानता है । उत्कृष्ट कोटि की व्यंग्य लेखिका अर्चना जी का साहित्यिक प्रवास उत्तरोत्तर ऊर्ध्व-गामी रहा है । ब्रजभाषा और हिन्दी दौनों ही क्षेत्रों में आप की रचनाओं को पाठकों का अपरिमित स्नेह प्राप्त हुआ है । आप की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । आपको अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं ।

पिछले दिनों आप की दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं । पहली पुस्तक “लव की हॅप्पी एंडिंग” जो कि हास्य कहानी संग्रह है और दूसरी पुस्तक “कुछ दिल की कुछ दुनिया की” किस्सा गोई पर आधारित है । अर्चना चतुर्वेदी प्रसन्नमना लेखिका हैं, दिल से लिखती हैं, मज़े ले-ले कर लिखती हैं, इसीलिए इन्हें पढ़ने वाले इन्हें बार-बार पढ़ना चाहते हैं ।





इन पुस्तकों को भावना प्रकाशन से मँगवाया जा सकता है ।

भावना प्रकाशन – फोन नम्बर – 8800139685, 9312869947

व्यंग्य - वाह रे मीडिया - अर्चना चतुर्वेदी

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धर्म के काम में हवन होवे चाहे विवाह में हो या गृहशांति में तब थोड़ो थोड़ो घी डारो जाए ताकि अग्नि प्रज्वलित रहे, पर हमारे देश में  मीडिया देश में अशांति के हवन में कनस्तर भर घी उड़ेल कर अग्नि कूं भड़काबे कौ काम बखूबी कर रह्यो है  | जैसे कुटिल पडौसने सास बहु की लड़ाई करा कै मजा लेमे, उनके कान में मंतर फूंक कें वैसे ही न्यूज चैनल वाले भी अलग अलग धर्मन की सास बहु अर्थात कट्टर लोगन कूं बिठा के , ऐसे ऐसे सवाल कर डारे  कि कई बार तो वहीँ हाथापाई की नौबत आ जाबे है | ऐसे लोगन के लिए हमारे यहाँ बृज भाषा में एक कहावत बोली जाबे  “भुस में आग लगाय जमालो,दूर भजी” पर ये मीडिया वारे तो इतने पहुंचे भये  हैं कि आग लगाकें  बापे ही  रोटियां सेकबे बैठ जामे,भाजे भी नाय  |

चाचा मामा की जुगाड़ से चैनल और अखबार में नौकरी पाए भये  ये रिपोर्टर खुद कूं  सर्वज्ञानी समझें और किसी पे  भी कमेन्ट करना काई भी  आग को हवा देना अपनो  परम कर्तव्य समझें  | इनके हिसाब से समाचार मतलब बुरी बातें ही होबे |

ये लोग हर खबर कूं  चटपटी  और मसालेदार बनाबे  के चक्कर में ख़बरन कूं  गरिष्ठ बना रहे हैं दिल्ली में कछु  ब्लूलाइन बस वारे  एक दूसरे से होड़ कर बसों कूं  भगाते थे बिना ये सोचे कि सवारी की सुरक्षा भी उनकी ही  जिम्मेदारी हते , उसी तरह ये लोग भी अपनी आपसी दौड़ और ब्रेकिंग न्यूज के कम्पटीशन में देश के लिए घातक बनते जाय  रहे हैं | काई  के बयान को तोड़ मरोड़ कर बार बार दिखानो  और तुरंत दो चार खर खोपड़ीन कूं  बुलाके कुचर्चा कराबो इनको टाइम पास है क्योंकि बा चर्चा कौ कछु निष्कर्ष तौ निकलेगो ना जूतम पजार और है जाबेगी |

काई भी  साधारण सी न्यूज कूं  भी डरावने म्यूजिक अजीब ढंग से सुनाके ये रामगोपाल वर्मा की डरावनी फिल्मन कूं भी पीछे छोड़ चुके हैं | ये लोग भूल चुके हैं कि ये पत्रकार हैं और इनको  काम लोगन तक खबर पहुंचाबो हैं, लोग बागन कूं कब्र में पहुँचाबे कौ ना है  | इनकी हरकतन  कूं  देखके कभी कभी तौ  अपने देश के मीडिया पर शक होबे लगो है ...  क्या सचमुच जे  हमारे देश के ही हैं मुंबई हमलन  के दौरान जा तरीका से  इन्होने पल पल की खबर और प्लानिंग दिखाई  बाको  फायदा देश कूं नहीं आतंकवादियन कूं ज्यादा भयो जो टीवी देखकर अपनी रणनीति बना रहे हे | यानी बिनकुं हमारे न्यूज चैनलों की अक्लमंदी पर पूरो  भरोसो हो  | जे तौ अधर तैयार रहें जे बताबे कूं कि सरकार पकिस्तान और आतंकवाद के खिलाफ अब का करबे की सोच रही हते | जा देश में ऐसी मीडिया ऐसी पत्रकारिता होबेगी बाको मालिक तौ भगवान भी ना है सके |

मीडिया तो जो है सो है हमारे यहाँ की जनता भी सुभानअल्लाह है, कोई बोले “कौवा कान ले गयो ” तो जे लोग डंडा लेके कौव्वे के पीछे भाग लेंगे | अरे महानआत्मा पहले कान देख तौ  लो गयो  भी है कि नाय  | भाई अक्ल ना चल रही तो वो वाली कोल्ड्रिंक पीकें अपनी ‘अकल लगाओ’ कम से कम सुने सुनाये पर तौ ना जाओ तभी जा  देश कौ  और लोगन  कौ कुछ भलो है सके।

अर्चना चतुर्वेदी
9899624843







ब्रजभाषा व्यंग्य - जा रे कारे बदरा - मदन मोहन 'अरविन्द'


चहुँ दिस कान्ह कान्ह कहि टेरत अँसुअन बहत पनारे 

जा रे कारे बदरा
 
मदन मोहन 'अरविन्द'

'ब्रज के बिरही लोग बिचारे', अब महाकवि सूर के बचन हैं सो टारे कैसैं जायँ। ब्रज सौं बिरह कौ सम्बन्ध जोड़ दियौ तौ जोड़ दियौ, पर इतनौ कहकें सूरदास ठहरे नायँ। वे जानते हते कै बरसात बिना बिरह अधूरौ, तासौं संग की संग कह दई, 'सदा रहत पावस ऋतु हम पै जबते स्याम सिधारे'। सौ टका साँची कही, काहू बुजुर्ग बिरही सौं पूछ कै देख लीजौं, पतौ चल जायगौ, पावस में बिरह की डिगरी बढ़ती-चढ़ती ही दीखै। अब आप हम सौं पूछौगे कै भैया बाबड़े भये हौ का, कौन से ज़माने के बिरह की बात लै बैठे, दुनिया इक्कीसमी सदी में पहुँच गयी और तुम बाबा आदम के जमाने कौ बिरहा गायवे बैठ गए। उत्तर में आपते निवेदन मात्र इतनौ कै नई नौ दिना, पुरानी सौ दिना। बैसैं हू बिरह नयौ कहा, पुरानौ कहा। पैकिंग बदली होय तौ बदली होय प्रोडक्ट तौ पुरानौ ही है। 

आज की दुनिया में बिरह कौ बैक्टीरिया अपने पूरे जोबन पै है। सब के सब बिरही, काहू कूँ सत्ता कौ बिरह, काहू कूँ सम्पदा कौ, काहू कूँ पद-प्रतिष्ठा कौ तौ काहू कूँ रोजी-रोटी कौ, नाना प्रकार के बिरह। 'बिरह की मारी बन बन डोलूँ बैद मिला नहिं कोय', जा बीमारी कौ इलाज न पहलै भयौ न आज होय। हाथ कंगन कू आरसी का, पढ़े लिखे कू फारसी का, सब देख रहे हैं, आजकल सत्ता के बिरह कौ बुखार कैसौ लाइलाज होतौ जाय रह्यौ है। सन्निपात में सत्ता कौ रोगी कैसी-कैसी ऊल-जलूल बकै, है जाकी दवाई काऊ बैद के पास? हाँ, पहलै की तरह अब काऊ कौं पिया के परदेस कौ बिरह नायँ होय, और होय तौ काहे कू, सम्पदा सौं संजोग की संभावना बन जाय तौ फिर मानस जात के बिरह पै कौन ध्यान देय। बड़ी कोठी, लंबी कार, मोटौ बैंक बैलेंस सब कछू है सकै तौ फिर दस-बीस बरस एक दूसरे ते अलग पड़े रहे तौ जा बिरह कौ का रोमनौ? अरे मोबाइल है, वीडियो चैट है, रोज मिलौ, रोज बात करौ। संचार क्रांति के या दौर में कौनसी काऊ कबूतर की चोंच में चिट्ठी चिपकानी है, कै फिर काऊ बदरा कूँ दूत बनाय कै बालम के द्वार भेजनौ है। जो ऐसौ होतौ फिर तौ हर बरसात अटरिया-अटरिया पै जा रे कारे बदरा की गूँज है रही होती। जानै कितने मेघदूत रचे जाय चुके होते और न जानै कितने काव्य-रस-रसिक नित्य इनकौ रस पान कर कै अघाय रहे होते।


अब मानौ कै न मानौ, रामगिरि पर्वत पै अकेले पड़े निष्कासन कौ डंड झेल रहे यक्ष की बिरह-बेदना यक्षलोक स्थित अलकापुरी के एकांत में उनकी प्रियतमा तक एक मेघ के माध्यम सौं पहुँचाय कै महाकवि कालिदास और उनकी रचना मेघदूत कूँ कालजयी प्रतिष्ठा प्राप्त भई। सोच कै मन में हूक सी उठै कै ऐसी प्रतिष्ठा काऊ और के भागन में क्यों नायँ। मेरी पड़ौसन खाय दह्यौ, मो पै  कैसैं जाय रह्यौ, अरे हम काऊ ते कम हैं का। मन में आई सो ठान बैठे, बिरह कौ अनुभव तौ अपनौ हू काहू सौं उन्नीस नायँ पर सन्देसौ भेजवे कू मेघ की खोज जरूरी हती। अब कोई ऐसौ टिकाऊ मेघ होय जो थोड़ी देर ठहरै और ढंग ते हमारी बात सुनै तौ कछू बात बनै, पर आजकल के मेघ इत आये उत गए। देखते-देखते एक दिन ऐसौ हू आयौ कै हमने दीखवे में अनुभवी और वयोवृद्ध एक मेघ कू थोड़ी देर के ताईं हमारी बात सुनवे कू जैसें-तैसें मनाय लियौ, पर दुर्भाग्य देखौ कै हमारी मर्मान्तक पीड़ा सुनकै हू मेघ पसीज्यौ  नायँ, कहवे लग्यौ भैया अबते कोई मेघ न कहूँ सन्देस लै कै जायवे की हिम्मत करैगौ न पानी लै जायवे की। आजकल तिहारे राजकरमचारी जमीन-आसमान एक करै दै रहे हैं। बरसन पहलै मैं पानी लै कै चल्यौ तौ संग-संग अनेक बिरही जनन के सँदेसे पहुँचायवे की इच्छा मन में हती पर जाते भये मारग में ऐसे-ऐसे महानुभावन सौं भेंट भई कै दुबारा सपने हू में उनसौं मिलवे की कामना न रही।  कोई कहै हम स्थानीय निकाय के, कोई कहै हम राज्य सरकार के तौ कोई कहै हम केंद्र सरकार के अधिकारी हैं। बड़ी निराली बात लगी। इलाकौ एक और राज करवे बारे इतने। सबके सब मेरी तरफ सिकारी की नजर सौं घूरते मिले। जगह-जगह उत्कोच, अरे रिस्वत, जाते तुम पृथ्वी वासी अब सेवाशुल्क कहौ, दैते-दैते दम फूल गयौ। एक जगह तौ ऐसौ इरझ्यौ कै भैया बरसन बाद घर लौटनौ है रह्यौ है। कछू सज्जन मिले, कहवे लगे आमन्दनी की जाँच करवे बारे बिभाग ते हैं, पानी कहाँ ते लाये, बही-खाते दिखाऔ, मैनें लाख समझाए भैया जि पानी तौ मैं हर बरसात में सागर सौं लाय कै धरती कू दैतौ आयौ हूँ, इतनी सुनकै दूसरे सज्जन कड़क अवाज में बोले अच्छा, सफेद झूठ। चल बताय, समुद्र कौ खारौ पानी लै कै कौनसी प्रोसेसिंग यूनिट में मीठौ करै और समुद्र का तेरौ रिस्तेदार लगै सो वाते बिना बिल-परचा पानी मिल जाय। एक तीसरे सज्जन ने मेरी बात सुनी तौ चौंकवे के अंदाज में कहवे लगे अरे, हर बरसात काम करै और बच कै निकर जाय, तेरौ सबरौ कारौ कारोबार अब हमारी निगाह में आय गयौ है। देखें अब कैसें  छूटैगौ। इतने दिन सेवाशुल्क अदा करते-करते  मैं एक दम खाली है गयौ हतो और कहाँ ते लामतौ सो इन सबके घर-दफतरन के  चक्कर मारते-मारते का खबर कितने साल बीत गए, न मैं कहूँ पानी पहुँचाय पायौ और न घर की कछू खबर-सुध लै पायौ। भैया, सौगंध खाय लई अब सन्देस तौ दूर मैं काहू जगह पानी हू न लाऊँ। मेघ कौ दर्द देख्यौ तौ हम अपनी बिरह-ब्यथा भूल गए। खाली एक सलाह दै कै हमनें भरे मन सौं बरसन के बिरही मेघ कू बिदा कियौ कै मित्र, अब अगर ऐसी स्थिति में फिर कहूँ घिरवे लगौ तौ निर्भय है कै काऊ निरीह-निर्धन की आँखिन में स्थान ग्रहण कर लीजौं , ता पीछै  जितने चाहौ बरसते राहियोंतुम न राजा की आँखिन में आऔगे, न राज की और न राजकरमचारिन की।

मदन मोहन 'अरविन्द
9897562333 

हरिशंकर परसाई जी के कुछ चुटीले उद्धरण - अनूप शुक्ल

हरिशंकर परसाई जी
अनूप शुक्ल

परसाईजी के जन्मदिन [22.08.16] के अवसर पर परसाई जी की स्मृति को नमन करते हुये उनके कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण भाई अनूप शुक्ल जी ने अपनी फेसबुक वाल पर शेयर किये थे, उन के हवाले से साभार :

1.इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं,पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं.
2.जो कौम भूखी मारे जाने पर सिनेमा में जाकर बैठ जाये ,वह अपने दिन कैसे बदलेगी!
3.अच्छी आत्मा फोल्डिंग कुर्सी की तरह होनी चाहिये.जरूरत पडी तब फैलाकर बैठ गये,नहीं तो मोडकर कोने से टिका दिया.
4.अद्भुत सहनशीलता और भयावह तटस्थता है इस देश के आदमी में.कोई उसे पीटकर पैसे छीन ले तो वह दान का मंत्र पढने लगता है.
5.अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं.बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है.
6.चीनी नेता लडकों के हुल्लड को सांस्कृतिक क्रान्ति कहते हैं,तो पिटने वाला नागरिक सोचता है मैं सुसंस्कृत हो रहा हूं.
7.इस कौम की आधी ताकत लडकियों की शादी करने में जा रही है.
8.अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ बैठता है तब गोरक्षा आन्दोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं.
9.जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का खून बिना छना पी जाते हैं .
10.नशे के मामले में हम बहुत ऊंचे हैं.दो नशे खास हैं--हीनता का नशा और उच्चता का नशा,जो बारी-बारी से चढते रहते हैं.
11.शासन का घूंसा किसी बडी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है पर न जाने किस चमत्कार से बडी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूंसा पड जाता है.
12.मैदान से भागकर शिविर में आ बैठने की सुखद मजबूरी का नाम इज्जत है.इज्जतदार आदमी ऊंचे झाड की ऊंची टहनी पर दूसरे के बनाये घोसले में अंडे देता है.
13.बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो तो आधी इज्जत बच जाती है.
14.मानवीयता उन पर रम के किक की तरह चढती - उतरती है,उन्हें मानवीयता के फिट आते हैं.
15.कैसी अद्भुत एकता है.पंजाब का गेहूं गुजरात के कालाबाजार में बिकता है और मध्यप्रदेश का चावल कलकत्ता के मुनाफाखोर के गोदाम में भरा है.देश एक है.कानपुर का ठग मदुरई में ठगी करता है,हिन्दी भाषी जेबकतरा तमिलभाषी की जेब काटता है और रामेश्वरम का भक्त बद्रीनाथ का सोना चुराने चल पडा है.सब सीमायें टूट गयीं.
16.रेडियो टिप्पणीकार कहता है--'घोर करतल ध्वनि हो रही है.'मैं देख रहा हूं,नहीं हो रही है.हम सब लोग तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं.बाहर निकालने का जी नहीं होत.हाथ अकड जायेंगे.लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं फिर भी तालियां बज रही हैं.मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं ,जिनके पास हाथ गरमाने को कोट नहीं हैं.लगता है गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है.गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की तालियां मिलती हैं,जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा नहीं है.
17.मौसम की मेहरवानी का इन्तजार करेंगे,तो शीत से निपटते-निपटते लू तंग करने लगेगी.मौसम के इन्तजार से कुछ नहीं होता.वसंत अपने आप नहीं आता,उसे लाना पडता है.सहज आने वाला तो पतझड होता है,वसंत नहीं.अपने आप तो पत्ते झडते हैं.नये पत्ते तो वृक्ष का प्राण-रस पीकर पैदा होते हैं.वसंत यों नहीं आता.शीत और गरमी के बीच जो जितना वसंत निकाल सके,निकाल ले.दो पाटों के बीच में फंसा है देश वसंत.पाट और आगे खिसक रहे हैं.वसंत को बचाना है तो जोर लगाकर इन दो पाटों को पीचे ढकेलो--इधर शीत को उधर गरमी को .तब बीच में से निकलेगा हमारा घायल वसंत.
18.सरकार कहती है कि हमने चूहे पकडने के लिये चूहेदानियां रखी हैं.एकाध चूहेदानी की हमने भी जांच की.उसमे घुसने के छेद से बडा छेद पीछे से निकलने के लिये है.चूहा इधर फंसता है और उधर से निकल जाता है.पिंजडे बनाने वाले और चूहे पकडने वाले चूहों से मिले हैं.वे इधर हमें पिंजडा दिखाते हैं और चूहे को छेद दिखा देते हैं.हमारे माथे पर सिर्फ चूहेदानी का खर्च चढ रहा है.
19.एक और बडे लोगों के क्लब में भाषण दे रहा था.मैं देश की गिरती हालत,मंहगाई ,गरीबी,बेकारी,भ्रष्टाचारपर बोल रहा था और खूब बोल रहा था.मैं पूरी पीडा से,गहरे आक्रोश से बोल रहा था .पर जब मैं ज्यादा मर्मिक हो जाता ,वे लोग तालियां पीटने लगते थे.मैंने कहा हम बहुत पतित हैं,तो वे लोग तालियां पीटने लगे.और मैं समारोहों के बाद रात को घर लौटता हूं तो सोचता रहता हूं कि जिस समाज के लोग शर्म की बात पर हंसे,उसमे क्या कभी कोई क्रन्तिकारी हो सकता है?होगा शायद पर तभी होगा जब शर्म की बात पर ताली पीटने वाले हाथ कटेंगे और हंसने वाले जबडे टूटेंगे .
20.निन्दा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं.निन्दा खून साफ करती है,पाचन क्रिया ठीक करती है,बल और स्फूर्ति देती है.निन्दा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं.निन्दा पयरिया का तो सफल इलाज है.सन्तों को परनिन्दा की मनाही है,इसलिये वे स्वनिन्दा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं.
21.मैं बैठा-बैठा सोच रहा हूं कि इस सडक में से किसका बंगला बन जायेगा?...बडी इमारतों के पेट से बंगले पैदा होते मैंने देखे हैं.दशरथ की रानियों को यज्ञ की खीर खाने से पुत्र हो गये थे.पुण्य का प्रताप अपार है.अनाथालय से हवेली पैदा हो जाती है.


ओलम्पिक, जैशा और पानी की बोतल - ललित कुमार

एक भारतीय अफ़सर की पत्नी अपनी पड़ोसन से:

"मेरे हस्बेंड का ना रियो का टूर लग गया है... सच्ची! दो साल पहले से ही हमने जुगाड़ लगाना शुरु कर दिया था। तब बात बनी। ये तो बड़े ख़ुश हैं --कह रहे हैं कि ओलम्पिक में हो गया है तो पैराल्म्पिक का टूर भी पक्का ही समझो... बच्चों को भी सैर कराने ले जाएँगे। हमनें पिछली बार अर्जेन्टाइना और पेरु निपटा लिया था। इस बार ब्राज़ील देखेगें। मैंने तो इन्हें कह दिया है कि रियो में सब जगह अच्छे से देख आना ताकि पैरालम्प्लिक में हमें सब पहले से ही पता रहे कि कौन-कौन-सी जगह निपटानी है। इन्हें जो अलाउंस मिलते हैं न मिसिज वर्मा... उससे शॉपिंग, रेस्टोरेंट वैगरा सब आराम से हो जाता है। होटल और घूमने-फिरने के लिए तो फ़लां-फ़लां इनके पीछे पड़े रहते हैं कि सेवा का मौका तो दीजिए..."

रियो में जब मैराथन रनर ओ पी जैशा देश के लिए मीलों दौड़ते हुए पानी की बोतल ढूँढ रही थीं... तब मिस्टर हस्बेंड रियो के एक अप-मार्केट मॉल में अपनी मिसिज के लिए रिस्ट-वॉच ढूँढ रहे थे...

ओ पी जैशा के करीब से तीर की तरह निकली दूसरे देश की धाविका ने देखा कि भारतीय स्टॉल खाली पड़ा था और जैशा को पानी नहीं मिला... तो उस धाविका के होंठो पर मुस्कान दौड़ गई... वह समझ गई कि जो देश जैशा को पानी की बोतल तक नहीं दे सकता उ(स)से जीतना कोई मुश्किल नहीं...
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इस कटाक्ष से मेरा इरादा किसी ईमानदार और अपने काम के प्रति निष्ठावान अफ़सर को दु:ख पहुँचाना नहीं है... लेकिन ओ पी जैशा का खुलासा पढ़ने के बाद मन में इस टिपिकल अफ़सरी माइंडसेट को लेकर बहुत ज़्यादा गुस्सा है... शर्म आनी चाहिए कि साक्षी/सिंधु को लेकर इतना हो-हल्ला करने वाला देश जैशा को पानी की बोतल तक नहीं दे सका। जिन लोगों को भारतीय स्टालों पर होना चाहिए था... वे लोग उसी पानी में डूब मरें जो उन्होनें हांफ़ती जैशा को नहीं दिया... हम इसी लायक हैं कि ओलम्पिक में एक कांसा और एक चांदी लाएँ (और वो भी खिलाड़ियों की ख़ुद की मेहनत की वजह से)...

कविता के अखाड़े में - शरद सुनेरी

नागपुर, भारत के सांस्कृतिक महत्व का शहर है। इसके अनेक कारण हैं जिनमें से तीन प्रमुख कारण मैं आपको बतलाता हूँ। एक, कहते हैं कि डलहौजी ने अपनी साम्राज्यवादीराज्य-हड़पनीति का आरंभ यहीं से किया था। जिसका पटाक्षेप सन् अठारह सौ सत्तावन के गदर के रूप में हुआ था और भारत  में क्रांति के बीज का सूत्रपात हुआ। यानि कह सकते हैं कि यदि नागपुर  ना होता तो देश के स्वाधीनता संघर्ष का मार्ग भी प्रशस्त हुआ होता। दूसरा, यह शहर नाग नदी जैसी महान नदी के तट पर बसा हुआ है। मैंने जबसे देखा है जिसे लोग नदी कहते हैं वह एक नाला है। चंूकि नाले की परिणीति अंत में नदी में हो जाती है, लोग इसे सम्मान से नदी कहने लगे हैं। इसमें शहर की सारी गंदगी बह कर जाती है और शहर को साफ-सुथरा रखती है। यदि यह नहीं होती तो नागपुर को भी बरसात में बाढ़ का वह सुख मिलता जो मुंबई को मिलता है। नाग नदी, नागपुर की रीढ़ हैं क्योंकि यह नागपुर के बीच से बहती है। रीढ़ की हड्डी होने से इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। क्योंकि बिना रीढ़ के लोगों का कोई अस्तित्व नहीं होता। और तीसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण यह कि इसमेंमैंरहता हूँ। एक कवि और रचनाकार! संस्कृति का संवाहक!! किसी भी नगर या शहर में कवि का होना बहुत आवश्यक है। वरना वहाँ की संस्कृति की रक्षा कैसे होगी? इस नाते प्रधानमंत्री जी को हमारे शहर कोस्मार्ट सिटीकी सूची में रखना चाहिए था। संशोधन के लिए मैं महापौर जी को यह जानकारी देना चाहता हूँ कि इन महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर प्रधानमंत्री जी का ध्यान आकर्षित कर अपने शहर कोस्मार्ट-सिटीकी सूची में लाने की ओर पुनः प्रेरित करें। सुबह का भूला यदि शाम तक घर लौट आए, तो भूला नहीं कहलाता!
यहाँ कवि होते हैं इसलिए कविता भी होती है। कविता-लेखन को हमारे पूर्वजों ने एक पवित्र कर्म माना है। यह बात और है कि काव्य-लेखन का इतिहास यह सिद्ध करता है कि कवि अपने आरंभिक जीवन में एक कुकर्मी और अपवित्र जीव हुआ करता है जो कविता लिखते-लिखते कालांतर में अतिपुनीत और पवित्र आत्मा हो जाता है। मैं इस तथ्य को प्रमाणसहित सिद्ध कर सकता हूँ। अब महर्षि वाल्मीकि जी को ही लीजिए। अपने आरंभिक जीवन में क्या करते थे दद्दा? चोरी! डकैती!! लूटमार!!! आप ही बताइए क्या ये कोई महान कर्म हैं? नहीं ना। रत्नाकर डाकू के नाम से कुख्यात थे। गब्बरसिंह के पूर्वज वे ही थे। पचास - पचास मील तक उनके नाम की तूती बोलती थी। मजाल है साहब कोई बच्चा आधी रात को उठ कर चूँ भी बोल दे।एकला चालो रेका दर्शन उन्होंने ही प्रतिपादित किया था। कभी कोई गिरोह नहीं बनाया। जो भी लूटा अपने दम पर, अपने लिए। स्वाभिमानी और परिश्रमी थे। लेकिन बाद में लाठी-कृपाण छोड़कर कविता के धंधे में बैठे। पराये माल को अपने कब्ज़े में पहले ही कर लिया था। बाद में अच्छा नाम कमाया रामायण लिखकर। समझदार थे। इधर राम का नाम लेकर महाकवि बने तुलसी बाबा का रिकार्ड भी बहुत ठीक-ठाक था। विवाह के बाद पत्नी रत्नावली की गोरी चमड़ी पर ऐसे आसक्त हुए कि भरी बरसात में उफनती में छलाँग दी। अच्छे तैराक थे मुर्दे के सहारे नदी भी लाँघ गए। डूबे नहीं। आधी रात में ससुराल की छत पर लटकते हुए साँप को रस्सी समझकर पत्नी सेआय लव यूकहने धमक गए। पर यहाँ पत्नी समझदार थी। ऐसा लताड़ा चैबे जी को कि रामबोला  से सीधेतुलसीदासबन गए। कविता के पेशे में गए। बाद में महाकवि कहलाए। प्रेम में पिटे लेकिन कविता के पवित्र कर्म में हिट हो गए। संस्कृत के महाकवि कवि कालिदास जी के बारे में भी उनकी मूर्खता को लेकर कुछ अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। केशवदास जी का चरित्र भी ज़रा-सा ढीला ही रहा। कुएँ पर खड़ी लड़कियों ने उन्हें ज़रा-साबाबाक्या कह दिया महाराज का दिल टूट गया-‘चंद्रवदन मृगलोचिनी बाबा कहि-कहि जाए।अब वे सलमान, आमीर, सैफ, शाहरूख़ या अक्षय कुमार तो थे नहीं कि पचास की उम्र में भी हसीनाएँ उन्हें दिल से लगातीं। और मीरा बाई का तो कहना ही क्या? उस ज़माने में जब पत्नियाँ अपने पति का नाम तक नहीं लेती थीं एक पराए को कहती फिरती थीं कि-‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों ना कोई। जाके सिर मोर-मुकुट मेरो पति सोई।।दूसरे आदमी के चक्कर मे पड़कर अपना जीवन बर्बाद कर डाला। हद हो गयी भाई शराफ़त की! उनके द्वारा कृष्ण को लिखे हुए प्रेमपत्रों को आज पाठ्य-पुस्तकों मेंभजनका सम्मान प्राप्त है। शोधार्थी उस पर डाक्टरेट ले रहे हैं। अब भई प्रेमी भगवान ही थे तो क्या हुआ? ये भी तो एक राजा की रानी थीं। वह भी राजपूत-राजा की। भला यह भी कोई बात हुई कि पैरों में घुंघरू पहने और संतों के बीच चलीं ठुमकने!! अब आप ही सोचिए आज केमाॅडर्न इंडियामें भी प्रेम के अखाड़े में जहाँ एक म्यान में दो तलवारें नहीं जा सकतीं और खून-खराबा हो जाता है। तो मीरा का वह पति तो राजा था वह भी राजपूत। करेला भी और नीम चढ़ा भी। भला वह कैसे यह बर्दाश्त कर पाता? सूरदास जी के बारे में कुछ कहना बेकार है। उनके साथ टेक्निकल प्राॅबलम थी। वे जन्म से अंधे थे-दिव्यांग। उन्हें किसी की ओर बुरी नज़र से देखने की फुर्सत ही नहीं रही। सारा जीवन गोपाल-कृष्ण को माखन खिलाने और उनकी पंुतरिया बदलने में बीता डाला। कबीर बाबा इस क्षेत्र में अपवाद रहे। क्यों? क्योंकि उन्हें लिखना नहीं आता था-‘मसि कागद छुयो नहिं, कलम गहि नहिं हाथ।हथकरघा चलाते और बैठे-बैठे उस समय के उत्पाती और अलगाववादी हिन्दू-मुसलमानों को गरियाते रहते। ये दद्दा की तो बाबागिरी और दादागिरी दोनों साथ में चलती रहती थी। इनकी गालियों को उनके चेले कविता में ढाल कर पवित्र कर देते थे। साँप भी मर जाता था और लाठी भी नहीं टूटती थी। दादा तो लड़कियों के चक्कर में कभी पड़े ही नहीं। ऊपर सेढाई आखर का प्रेमग्रंथ दान कर गए।
जो भी हो कविता लेखन एक पवित्र कर्म के रूप में हमारी संस्कृति में जाना जाता है।  यूँ कहे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कविता वह गंगा है जिसमें डुबकी लगाकर अपवित्र भी पवित्र हो जाता है। मैं भी संस्कृति की इस पावन गंगा में कभी-कभी एक-दो डुबकी मार कर अपने पाप धो लेता हूँ। भाई कविता लिखना एक पवित्र कर्म हो सकता है, लेकिन कवितासुनना या सुनाना’? कविता सुनना एक दुस्साहस है! और कविता सुनाना एक दुष्कर्म!! किसी कवि के हत्थे चढ़ जाइए। इतनी कविता सुनाएगा कि अच्छे-अच्छे पहलवानों को छठी का दूध याद जाए।
मैंने कहा ना हमारा शहर एक सांस्कृतिक शहर है। इस संस्कृति के अनुसार यहाँ पर कविता के अनेक अखाड़े हैं। सभी में अलग-अलग उस्ताद हैं। यहाँ नये-पुराने और मँजे हुए सभी प्रकार के पहलवान अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार के दंड पेलते हैं, मुगदर घुमाते हैं और कुश्ती लड़ते हैं। इन अखाड़ों में आकर लोग अपनी कविता को सुनाने का दुष्कर्म भी करते हैं। यहाँ कविता सुनाना दुष्कर्म इसलिए हो जाता है क्योंकि ये अखाड़ेबाज़ कवि, कविता सुनाकर ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। बलात्कार, चोरी, डकैती और अश्लील कर्म करनेवाला अपराधी जैसे अपराध के बाद उस स्थान को जल्दी से जल्दी छोड़कर भागने की फिराक में रहता हैं वैसे ही कविता के अखाडे़ में ये दंडपेलु कवि, लंगोट समेटकर भागने की तैयारी में रहते हैं। अब आखिर में बचा इकलौता श्रोता-कवि तो वैसे ही श्रोता के अभाव मेंवीरगतिको प्राप्त हो जाता है। अब बचे हुए संचालक और अध्यक्ष महोदयपरमवीर चक्र के हकदार। बेचारे एक दूसरे को अपनी रचना सुनाकर एक दूसरे के प्रति आभार प्रकट करते हुए विदा लेते और देते हैं।
हमारे मनीषियों ने साहित्य को समाज का दर्पण कहा है। पर ये दर्पण मुझे प्रदर्शनियों में रखे उन दर्पणों की याद दिलाते रहते हैं जिनमें अपनी सूरत देखकर लोग डरते हैं। हँसते हैं और कभी-कभी घबराते भी हैं। सही भी है। जब दर्पणों को निर्माण करनेवाले ही उसमें अपनी शकलें देखने को तैयार नहीं होंगे और उपेक्षा करेंगे तो हम समाज से क्या अपेक्षा करेंगे? संभवतः इसलिए समाज पर आज सत-साहित्य का प्रभाव नहीं पड़ रहा है।
शरद सुनेरी
मो. 9421803149