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व्यंग्य द ग्रेट इण्डियन वैडिंग तमाशा - नीरज बधवार

व्यंग्य

द ग्रेट इण्डियन वैडिंग तमाशा - नीरज बधवार

ये मेरे मित्र की मति का शहादत दिवस है। आज वो शादी कर रहा है। मैं तय समय से एक घंटे बाद सीधे विवाह स्थल पहुंचता हूं, मगर लोग बताते हैं कि बारात आने में अभी आधा घंटा बाकी है। मैं समझ गया हूं कि शादी पूरी भारतीय परम्परा के मुताबिक हो रही है।

तभी मेरी नज़र कन्या पक्ष की सुंदर और आंशिक सुंदर लड़कियों पर पड़ती है। सभी मेकअप और गलतफहमी के बोझ से लदी पड़ी हैं। इस इंतज़ार में कि कब बारात आए और वर पक्ष का एक-एक लड़का खाने से पहले, उन्हें देख गश खाकर बेहोश हो जाए।तभी ध्वनि प्रदूषण के तमाम नियमों की धज्जियां उड़ाती हुई बारात पैलेस के मुख्य द्वार तक पहुंचती है।

ये देख कि उनके स्वागत में दस-बारह लड़कियां मुख्य द्वार पर खड़ी हैं, नाच- नाच कर लगभग बेहोश हो चुके दोस्त, फिर उसी उत्साह से नाचने लगते हैं। किराए की शेरवानी में घोड़ी पर बैठा मित्र पुराने ज़माने का दरबारी कवि लग रहा है। उम्र को झुठलाती कुछ आंटियां सजावट में घोडी को सीधी टक्कर दे रही हैं और लगभग टुन्न हो चुके कुछ अंकल,जो पैरों पर चलने की स्थिति में नहीं हैं,धीरे-धीरे हवा के वेग से मैरिज हॉल में प्रवेश करते हैं।

अंदर आते ही बारात का एक बड़ा हिस्सा फूड स्टॉल्स पर धावा बोल देता है। मुख्य खाने से पहले ज़्यादातर लोग स्नैक्स की स्टॉल का रुख करते हैं। मगर पता चलता है कि वो तो बारात आने से पहले ही लड़की वालों ने निपटा दीं।

ये सुन कुछ आंटियों की बांछे खिल जाती है। उन्हें अगले दो घंटे के लिए मसाला मिल गया। वो चुन-चुन कर व्यवस्था से कीड़े निकालने लगती है। एक को मैरिज हॉल नहीं पसंद आया तो दूसरी को लड़की का लहंगा।

मगर मैं देख रहा हूं इन बुराईयों में एक सुकून भी है। ये निंदारस उन्हें उस आमरस से ज़्यादा आनंद दे रहा है, जिसका आने के बाद से वो चौथा गिलास पी रही हैं।इस बीच स्नैक्स न मिलने से मायूस लोग बिना वक्त गंवाए मुख्य खाने की तरफ लपकते हैं। एक प्लेट में सब्ज़ियां, एक में रोटी।फिर भी चेहरे पर अफसोस है कि ये प्लेट इतनी छोटी क्यों है?

कुछ का बस चलता तो घर से परात ले आते। कुछ पेंट की जेब में डाल लेते। खाते-खाते कुछ लोग बच्चों को लेकर परेशान हो रहे हैं। भीड़ की आक्रामकता देख उन्हें लगता है कि पंद्रह मिनट बाद यहां कुछ नहीं बचेगा। बच्चा कहीं दिखाई नहीं दे रहा। मगर उसे ढूंढने जाएं भी तो कैसे…कुर्सी छोड़ी तो कोई ले जाएगा। या तो बच्चा ढूंढ लें या कुर्सी बचा लें।इसी कशमकश में उन्हें डर सताता है कि वो शगुन के पैसे पूरे कर भी पाएंगे या नहीं।

उनका नियम है हर बारात में सौ का शगुन डाल कर दो सौ का खाते हैं।मगर लगता है कि आज ये कसम टूट जाएगी। तभी वहां खलबली मचती है। कुछ लोग गेट की तरफ भागते हैं। पता चलता है कि लड़के के फूफा किसी बात पर नाराज़ हो गए हैं। दरअसल, उन्होंने वेटर को पानी लाने के लिए कहा था, मगर जब दस मिनटतक पानी नहीं आया तो वो बौखला गए।

दोस्त के पापा, चाचा और बाकी रिश्तेदार फूफा के पीछे पानी ले कर गए हैं। पीछे से किसी रिश्तेदार की आवाज़ सुनाई पड़ती है…इनका तो हर शादी-ब्याह में यही नाटक होता है। झगड़े की ज़रूरी रस्म अदायगी के बाद समारोह आगे बढ़ता है। कुछ देर में फेरे शुरू हो जाते हैं।

मंडप में पंडित जी इनडायरैक्ट स्पीच में बता रहे हैं कि कन्या पत्नी बनने से पहले तुमसे आठ वचन मांगती है। अगर मंज़ूर हो तो हर वचन के बाद तथास्तु कहो। जो वचन वो बात रहे हैं उसके मुताबिक लड़के को अपना सारा पैसा, अपनी सारी अक्ल,या कहूं सारा वजूद कन्या के हवाले करना होगा।

फिर एक जगह कन्या कहती है अगर मैं कोई पाप करती हूं, तो उसका आधा हिस्सा तुम्हारे खाते में जायेगा, और तुम जो पुण्य कमाओगे उसमें आधा हिस्सा मुझे देना होगा….बोलो मंज़ूर है! मित्र आसपास नज़र दौड़ता है.. लगता है…वही दरवाज़ा ढूंढ रहा है जहां से कुछ देर पहले फूफा जी भागे थे!


नीरज बधवार - 9958506724

व्यंग्य - संदेसे आते हैं, हमें फुसलाते हैं! - नीरज बधवार

एक ज़माने में ईश्वर से जो चीज़ें मांगा करता था, आज वो सब मेरी चौखट पर लाइन लगाए खड़ी हैं। कभी मेल तो कभी एसएमएस से दिन में ऐसे सैंकड़ों सुहावने प्रस्ताव मिलते हैं। लगता है कि ईश्वर ने मेरा केस मोबाइल और इंटरनेट कम्पनियों को हैंडओवर कर दिया है। पैन कार्ड बनवाने से लेकर, मुफ्त पैन पिज़्ज़ा खाने तक के न जाने कितने ही ऑफर हर पल मेरे मोबाइल पर दस्तक देते हैं! इन कम्पनियों को दिन-रात बस यही चिंता खाए जाती है कि कैसे नीरज बधवार का भला किया जाए?

कुछ समय पहले ही किन्हीं पीटर फूलन ने मेल से सूचित किया कि मेरा ईमेल आईडी दो लाख डॉलर के इनाम के लिए चुना गया है। हफ्ते भर में पैसा अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाएगा। सिर्फ दो हज़ार डॉलर की मामूली प्रोसेसिंग फीस जमा करवा मैं ये रक़म पा सकता हूं। ये जान मैं बेहद उत्साहित हो गया। कई दिनों से न नहाने के चलते बंद हो चुका मेरा रोम-रोम, इस मेल से खिल उठा। इलाके की सभी कोयलें कोरस में खुशी के गीत गाने लगीं, मोर बैले डांस करने लगे। मैं समझ गया कि मेरी हालत देख माता रानी ने स्टिमुलस पैकेज जारी किया है।  

पहली फुरसत में मैंने ये बात बीवी को बताई। मगर खुश होने के बजाए वो सिर पकड़कर बैठ गई। फिर बोली...मैं न कहती थी आपसे कि अब भी वक़्त है... संभल जाओ....मगर आप नहीं माने...अब तो आपकी मूर्खता को भुनाने की अंतर्राष्ट्रीय कोशिशें भी शुरू हो गई हैं। मैंने वजह पूछी तो वो और भी नाराज़ हो गईं। कहने लगी कि आज के ज़माने में दुकानदार तक तो बिना मांगे आटे की थैली के साथ मिलने वाली मुफ्त साबुनदानी नहीं देता और आप कहते हैं कि किसी ने आपका ई-मेल आईडी सलेक्ट कर आपकी दो लाख डॉलर की लॉटरी निकाली है! हाय रे मेरा अंदाज़ा...आपकी जिस मासूमियत पर फिदा हो मैंने आपसे शादी की थी, मुझे क्या पता था कि वो नेकदिली से न उपज, आपकी मूर्खता से उपजी है!

दोस्तों, एक तरफ बीवी शादी करने का अफसोस जताती है तो दूसरी तरफ हर छठे सैकिंड मोबाइल पर शादी करने के प्रस्ताव आते हैं। बताया जाता है कि मेरे लिए सुन्दर ब्राह्मण, कायस्थ, खत्री जैसी चाहिए, वैसी लड़की ढूंढ ली गई है। बंदी अच्छी दिखती है और उससे भी अच्छा कमाती है। सेल के आख़िरी दिनों की तरह चेताया जाता है कि देर न करूं। मगर मैं बिना देर किए मैसेज डिलीट कर देता हूं। ये सोच कर ही सहम जाता हूं कि बिना ये देखे कि मैसेज कहां से आया है, अगर बीवी ने उसे पढ़ लिया तो क्या होगा?

और जैसे ये संदेश अपनेआप में तलाक के लिए काफी न हों, अब तो सुन्दर और सैक्सी लड़कियों के नाम और नम्बर सहित मैसेज भी आने लगे हैं। कहा जा रहा है कि मैं जिससे,जितनी और जैसी चाहूं, बात कर सकता हूं। बिना ये समझाए कि सुन्दर और सैक्सी लड़की के लालच का भला फोन पर बात करने से क्या ताल्लुक है। साथ ही मुझे बिकनी मॉडल्स के वॉलपेपर मुफ्त में डाउनलोड करने का अभूतपूर्व मौका भी दिया जाता है। मानो, इस ब्रह्माण्ड में जितने और जैसे ज़रूरी काम बचे थे, वो सब मैंने कर लिए हैं, बस यही एक बाकी रह गया है!

दोस्तों, ऐसा नहीं है कि ये लोग मेरा घर उजाड़ना चाहते हैं। इन बेचारों को तो मेरे घर बनाने की भी बहुत फिक्र है। नोएडा से लेकर गाज़ियाबाद और गुडगांव से लेकर मानेसर तक का हर बिल्डर मैसेज कर निवेदन कर कर रहा है कि सिर्फ मेरे लिए आख़िर कुछ फ्लैट बाकी हैं। ये सोच कभी-कभी खुशी होती है कि इतने बड़े शहर में आज इतनी इज्ज़त कमा ली है कि बड़े-बड़े बिल्डर पिछले एक साल से सिर्फ मेरे लिए आख़िर के कुछ फ्लैट खाली रखे हुए हैं। पिछली दिवाली पर शुरू किए सीमित अवधि के डिस्काउंट को सिर्फ मेरे लिए खींचतान कर वो इस दिवाली तक ले आए हैं। उनके इस प्यार और आग्रह पर कभी-कभी आंखें भर आती हैं। मगर मकान भरी आंखों से नहीं, भरी जेब से खरीदा जाता है। मैं खाली जेब के हाथों मजबूर हूं और वो मेरा भला चाहने की अपनी आदत के हाथों। वो संदेश भेज रहे हैं और मैं अफसोस कर रहा हूं। मकान से लेकर जैसी टीवी पर देखी, वैसी सोना बेल्ट खरीदने के एक-से-एक धमाकेदार ऑफर हर पल मिल रहे हैं। कभी-कभी सोचता हूं कि सतयुग में अच्छा संदेश सुन राजा अशर्फियां लुटाया करते थे, ख़ुदा न ख़ास्ता अगर उस ज़माने में वो मोबाइल यूज़ करते, तो उनका क्या हश्र होता.


नीरज बधवार - 9958506724

व्यंग्य - अपने-अपने गौरव द्वीप! - नीरज बधवार



बुक स्टॉल पर किताबें पलटते हुए अचानक मेरी नज़र एक मैगज़ीन पर पड़ती है। ऊपर लिखा है, ‘गीत-ग़ज़लों की सर्वश्रेष्ठ त्रैमासिक पत्रिका’। ‘सर्वश्रेष्ठ त्रैमासिक पत्रिका’ये बात मेरा ध्यान खींचती हैं। स्वमाल्यार्पण का ये अंदाज़ मुझे पसंद आता है। मैं सोचने लगता हूं कि पहले तो बाज़ार में गीत-ग़ज़लों की पत्रिकाएं हैं ही कितनीउनमें भी कितनी त्रैमासिक हैंबावजूद इसकेप्रकाशक ने घोषणा कर दी कि उसकी पत्रिका ‘सर्वश्रेष्ठ’ है। अपने मां-बाप की इकलौती औलाद होने पर आप ये दावा तो कर ही सकते हैं कि आप उनकी सबसे प्रिय संतान हैं! जीने के लिए अगर वाकई किसी सहारे की ज़रूरत है तो कौन कहता है कि ग़लतफ़हमी सहारा नहीं बन सकती। गौरवपूर्ण जीवन ही अगर सफल जीवन हैतो उस गौरव की तलाश भी तो व्यक्ति या संस्था को खुद ही करनी होती है।

दैनिक अख़बारों में तो ये स्थिति और भी ज़्यादा रोचक है। एक लिखता हैभारत का सबसे बड़ा समाचार-पत्र समूह। दूसरा कहता हैभारत का सबसे तेज़ी से बढ़ता अख़बार। तीसरा कहता हैसबसे अधिक संस्करणों वाला अख़बार। और जो अख़बार आकारतेज़ी और संस्करण की ये लड़ाई नहीं लड़ पाते वो इलाकाई धौंस पर उतर आते हैं। ‘हरियाणा का नम्बर वन अख़बार’ या ‘पंजाब का नम्बर दो अख़बार’। एक ने तो हद कर दी। उस पर लिखा आता है-फलां-फलां राज्य का ‘सबसे विश्वसनीय अख़बार’। अब आप नाप लीजिए विश्वसनीयताजैसे भी नाप सकते हैं। कई बार तो स्थिति और ज़्यादा मज़ेदार हो जाती है जब एक ही इलाके के दो अख़बार खुद को नम्बर एक लिखते हैं। मैं सोचता हूं अगर वाकई दोनों नम्बर एक हैं तो उन्हें लिखना चाहिए ‘संयुक्त रूप से नम्बर एक अख़बार’! खैरये तो बात हुई पढ़ाने वालों की। पढ़ने वालों के भी अपने गौरव हैं। मेरे एक परिचित हैंउन्हें इस बात का बहुत ग़ुमान हैं कि उनके यहां पांच अख़बार आते हैं। वो इस बात पर ही इतराते रहते हैं कि उन्होने फलां-फलां को पढ़ रखा है। प्रेमचन्द को पूरा पढ़ लेने पर इतने गौरवान्वित हैं जितना शायद खुद प्रेमचन्द वो सब लिखकर नहीं हुए होंगे। अक्सर वो जनाब कोफ्त पैदा करते हैं मगर कभी-कभी लगता है कि इनसे कितना कुछ सीखा जा सकता है। बड़े-बड़े रचनाकार बरसों की साधना के बाद भी बेचैन रहते हैं कि कुछ कालजयी नहीं लिख पाए। घंटों पढ़ने पर भी कहते हैं कि उनका अध्ययन कमज़ोर हैं। और ये जनाब घर पर पांच अख़बार आने से ही गौरवान्वित हैं! साढ़े चार सौ रूपये में इन्होंने जीवन की सार्थकता ढूंढ ली।

पढ़ना या लिखना तो फिर भी कुछ हद तक निजी उपलब्धि हो सकता हैपर मैंने तो ऐसे भी लोग देखे हैं जो जीवन भर दूसरों की महिमा ढोते हैं। एक श्रीमान अक्सर ये कहते पाए जाते हैं कि मेरे जीजाजी तो एसपी हैं। मैं सोचता हूं...परीक्षा जीजा ने पास की। पढ़ाया उनके मां-बाप ने। रिश्ता बिचौलिए ने करवाया। शादी बहन की हुई और इन्हें ये सोच रात भर नींद नहीं आती कि मेरे जीजाजी तो एसपी हैं। हर जानने वाले पर ये अपने जीजा के एसपी होने की धौंस मारते हैं। परिचितों का बस चले तो आज ही इनके जीजाजी का निलंबन करवा दें! उन्हें देखकर मुझे अक्सर लगता है कि पढ़-लिख कर कुछ बन जाने से इंसान अपने मां-बाप का ही नहींअपने साले का भी गौरव बन सकता है! सच...सफलता के कई बाप ही नहींकई साले भी होते हैं।

पद के अलावा पोस्टल एड्रेस में भी मैंने बहुतों को आत्मगौरव ढूंढते पाया है। सहारनपुर में रहने वाला शख़्स दोस्तों के बीच शान से बताता है कि उसके मामाजी दिल्ली रहते हैं। दिल्ली में रहना वाला व्यक्ति सीना ठोक के कहता है कि उसके दूर के चाचा का ग्रेटर कैलाश में बंगला है। उसके वही चाचा अपनी सोसायटी में इस बात पर इतराते हैं कि उनकी बहन का बेटा यूएस में सैटल्ड है। कभी-कभी सोचता हूं तो लगता है कि जब आत्मविश्लेषण में ईमानदारी की जगह नहीं रहती तब ‘जगह’ भी आत्गौरव बन जाती है। फिर वो भले ही दिल्ली में रहने वाले दूर के चाचा की होया फिर यूएस में सैटल्ड बहन के बेटे की!  क्या अपने इस सुदूर या शून्य में स्थित गौरव-द्वीप को अपनी सच्ची  उपलब्धियों के महाद्वीप से जोड़ देने की इच्छा नहीं होती इन महानुभावों को?

-नीरज बधवार  - फोन- 9958506724