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निशाँ पाया,.....न कोई छोर निकला - सालिम शुजा अन्सारी

निशाँ पाया,.....न कोई छोर निकला

मुसाफ़िर क्या पता किस ओर निकला


अपाहिज लोग थे सब कारवाँ में

सितम ये राहबर भी कोर निकला


जिसे समझा था मैं दिल की बग़ावत

महज़..वो धड़कनों का शोर निकला


निवाला बन गया मैं.... ज़िन्दगी का

तुम्हारा ग़म तो आदमख़ोर निकला


दिये भी....लड़ते लड़ते थक चुके हैं

अँधेरा इस ...क़दर घनघोर निकला


हुआ पहले क़दम पर ही शिकस्ता

करूँ क्या हौसला कमज़ोर निकला


सुना ये था, है दुनिया गोल "सालिम"

मगर नक़्शा तो ये चौकोर निकला


सालिम शुजा अन्सारी
9837659083



बहरे हज़ज  मुसद्दस महजूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन ,

1222 1222 122

हमें तो शायरी से है मुहब्बत - नवीन

हमें तो शायरी से है मुहब्बत।
सियासत का भला हम क्या करेंगे।
मगर जब कोई मनमानी करेगा।
तो कितने रोज़ तक हम चुप रहेंगे॥
सियासत शायरी में यों घुसी कि।
पुरस्कारों के गोले दग रहे थे॥
अचानक ही उन्हों को लग रहा था।
कि बस उन पर ही शोले दग रहे थे॥
अरे माँ भारती के लाड़लो तुम।
ज़रा कहिये तो आख़िर क्या हुआ था॥
ज़मीं अपनी जगह से हट गयी थी।
कि अम्बर टूट कर गिरने लगा था॥
अमाँ अँगरेज अफसर की तरह से।
ज़ुबाँ क्या काट डाली थी तुम्हारी।
कि नादिरशाह के जैसे किसी ने ।
बहन-बेटी उठा ली थी तुम्हारी॥
तुम्हारी पुस्तकों के सब ज़ख़ीरे।
किसी ने आग में धधका दिये क्या।
तुम्हारे गूढतम शोधों के मन्तर।
समन्दर बीच में फिकवा दिये क्या॥
अरे तुम तो वही हो न बिरादर।
जो अब तक कुर्सियों पर सो रहे थे।
तुम्हारे जैसों के रह्मोकरम पर।
सरस साहित्य के वांधे पड़े थे॥
अरे तुम तो वही हो न बिरादर।
जिन्हें कश्मीर दिखता ही नहीं है।
वहाँ के पण्डितों का दर्द ओ ग़म।
तुम्हें ग़मगीन करता ही नहीं है॥
अरे नेताओं के सम्बन्धियो तुम।
भला उस वक़्त किस गढ में छुपे थे।
कि जब दिल्ली की सड़कों पर टपाटप।
सिखों के जिस्म कट कर गिर रहे थे॥
अरे अखलाक की पीड़ा से पीड़ित।
हमें भी शर्म है उस वाक़ये पर।
मगर तुम जैसे कितनों ने कहो तो।
सुमन रक्खे पुजारी की चिता पर॥
हमें भी बाबरी का ग़म बहुत है।
मगर मन्दिर बताओ किस ने तोड़ा।
बशर जो स्वर्ग जाना चाहते थे।
उन्हें जन्नत की जानिब किस ने मोड़ा॥
बहुत सी और भी बातें हैं जिन को।
गिना कर हम भी रो सकते हैं रोना।
मगर पीतल के बदले हम बिरादर।
थमा दें क्यों किसी को अपना सोना॥
ज़रा कहिये तो अपने घर के झगड़े।
कभी बाज़ार में लाता है कोई।
कि अपने बाल-बच्चों की शिकायत।
पराये कान में कहता है कोई॥
ज़रा कहिये तो उस को क्या कहेंगे।
जो घर का भेद दुश्मन को बता दे।
हुकूमत की मलाई चाटने को।
जो अपने देश के टुकड़े करा दे॥
महज़ इक राज्य की सत्ता की ख़ातिर।
घिनौना खेल क्यों खेला बिरादर।
सुनहरे वक़्त को आख़िर भला क्यों।
अँधेरों की तरफ़ ठेला बिरादर॥
तो ये भी याद रख लीजे बिरादर।
तुम्हारा भेद सारा खुल चुका है।
लगाया दाग़ जो तुम ने बिरादर।
इलेक्शन बाद ख़ुद ही धुल चुका है॥
चलो अब माफ़ कर देते हैं तुम को।
यही करना मुनासिब लग रहा अब।
परिस्थितियाँ करा देती हैं सब कुछ।
बहक जाते हैं अच्छे-अच्छे साहब॥
मगर ये इल्तिज़ा भी कर रहे हैं।
अमन के दूत हो तो दीखिये भी ।
पुराने हिन्द का नक्शा उठा कर।
सबक गुजरे समय से लीजिये भी॥
जो कुछ होता रहा या हो रहा है।
किसी भी हाल में अच्छा नहीं है।
अमन और शान्ति के लमहों का ज़िम्मा।
फ़क़त कुछ लोगों का होता नहीं है॥
अगर तुम जौहरी कहते हो ख़ुद को।
तो मत लोहार जैसे घन चलाओ।
जो मानव मात्र को मानव बनाये।
नवीन’अब बस वही लिक्खो सुनाओ॥

नवीन सी चतुर्वेदी

बहरे हज़ज  मुसद्दस महजूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन ,
1222 1222 122

November, 2015

सितारा एक भी बाकी बचा क्या - मयङ्क अवस्थी

सितारा एक भी बाकी बचा क्या
निगोड़ी धूप खा जाती है क्या-क्या

फ़लक कङ्गाल है अब, पूछ लीजै
सहर ने मुँह दिखाई में लिया क्या
फ़लक – आसमान, सहर – सुबह

सब इक बहरे-फ़ना के बुलबुले हैं
किसी की इब्तिदा क्या इन्तिहा क्या
बहरे-फ़ना – नश्वर समुद्र, इब्तिदा – आरम्भ, इन्तिहा – अन्त

जज़ीरे सर उठा कर हँस रहे हैं
ज़रा सोचो समन्दर कर सका क्या
जज़ीरा – टापू

ख़िरद इक नूर में ज़म हो रही है
झरोखा आगही का खुल गया क्या
ख़िरद – बुद्धि, नूर – उजाला / ज्ञान, ज़म होना – मिल जाना, आगही – ज्ञान / अगमचेती

तअल्लुक आन पहुँचा खामुशी तक
यहाँ से बन्द है हर रास्ता क्या”

बहुत शर्माओगे यह जान कर तुम
तुम्हारे साथ ख्वाबों में किया क्या

उसे ख़ुदकुश नहीं मज़बूर कहिये
बदल देता वो दिल का फ़ैसला क्या

बरहना था मैं इक शीशे के घर में
मेरा क़िरदार कोई खोलता क्या
बरहना – निर्वस्त्र के सन्दर्भ में

अजल का खौफ़ तारी है अज़ल से
किसी ने एक लम्हा भी जिया क्या
अजल – मौत, अज़ल – आदिकाल

मक़ीं हो कर मुहाज़िर बन रहे हो
मियाँ, यकलख़्त भेजा फिर गया क्या
मक़ीं – मकान-मालिक, मुहाज़िर – शरणार्थी, यकलख़्त – अचानक

ख़ुदा भी देखता है, ध्यान रखना
ख़ुदा के नाम पर तुमने किया क्या

उठा कर सर बहुत अब बोलता हूँ
मेरा क़िरदार बौना हो गया क्या

:- मयङ्क अवस्थी
8765213905

बहरे हजज मुसद्दस महज़ूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222 122

तुम्हे मुहतात होना चाहिए था - फ़हमी बुदाउनी

तुम्हे मुहतात होना चाहिए था
बगैर अश्कों के रोना चाहिए था

मिरी वादा-खिलाफी पर वो चुप हैं
उसे नाराज़ होना चाहिए था

हमारा हाल तुम भी पूछते हो
तुम्हे मालूम होना चाहिए था

अब उसको याद करके रो रहा हूँ
बिछड़ते वक़्त रोना चाहिए था

चला आता यकीनन ख्वाब में वो
हमें कल रात सोना चाहिए था

पड़ा था इश्क में पहला भंवर जब

वहीँ कश्ती डुबोना चाहिए था......

फ़हमी बुदाउनी

कई रिश्ते बचाना चाहता हूँ - नवीन



कई रिश्ते बचाना चाहता हूँ।
लिहाज़ा दूर जाना चाहता हूँ॥



भटकने का बहाना चाहता हूँ।
तुम्हारे पास आना चाहता हूँ॥



फ़लक़ पर टिमटिमाना चाहता हूँ।
फ़ना हो कर दिखाना चाहता हूँ॥



किसी को लूट कर मैं क्या करूँगा।
मैं तो ख़ुद को लुटाना चाहता हूँ॥

घटाओं की नहीं दरकार मुझ को।
मैं अश्क़ों से नहाना चाहता हूँ॥



नज़र तुम से मिलाऊँ भी तो कैसे।
तुम्हारा ग़म छुपाना चाहता हूँ॥



बहुत मुशकिल है तुम को भूल पाना।
मगर अब भूल जाना चाहता हूँ॥




:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222 122

दिलों से तो निकाला जा रहा हूँ

दिलों से तो निकाला जा रहा हूँ
ख़लाओं में तलाशा जा रहा हूँ



मैं ख़ुशबू से नहाना चाहता था
मगर मिट्टी में सनता जा रहा हूँ



तेरी नज़रों ने कुछ बोला था मुझ से
उसी ख़ातिर निभाता जा रहा हूँ



मैं अपने ज़ख़्म दिखलाऊँ तो कैसे
सलीक़े से घसीटा जा रहा हूँ



मेरी हस्ती मुकम्मल हो रही है
चराग़ों पर उँड़ेला जा रहा हूँ



क़ज़ा आई तो लौटा दिल बदन में
अकेला था - दुकेला जा रहा हूँ




नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे हजज मुसद्दस महजूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222 122

ग़नीमत से गुज़ारा कर रहा हूँ - नवीन

ग़नीमत से गुज़ारा कर रहा हूँ।
मगर चर्चा है जलसा कर रहा हूँ ॥

तरक़्क़ी का ये आलम है कि पल-पल।
बदन का रंग नीला कर रहा हूँ॥

ठहरना तक नहीं सीखा अभी तक।
अज़ल से वक़्त जाया कर रहा हूँ॥

तसल्ली आज भी है फ़ासलों पर।
सराबों का ही पीछा कर रहा हूँ॥

मेरा साया मेरे बस में नहीं है।
मगर दुनिया पे दावा कर रहा हूँ॥


:- नवीन सी. चतुर्वेदी 


अज़ल - आदि , सराब - मृग तृष्णा 

तमन्नाओं पे हावी है तकल्लुफ़ - नवीन

सुनाना आप अपने दिल की बातें
मुझे कहने दें मेरे दिल की बातें

सुनी थीं मैंने माँ के पेट में ही
निवालों को तरसते दिल की बातें

न जुड़ जाओ अगर इन से तो कहना
ज़रा सुनिये तो टूटे दिल की बातें

तमन्नाओं पे हावी है तकल्लुफ़
चलो सुनते हैं सब के दिल की बातें

मुझे कुछ भी नहीं आता है लेकिन
समझता हूँ तुम्हारे दिल की बातें

शकर वालों को भी हसरत शकर की
कोई कैसे सुनाये दिल की बातें

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 


जो इतना ही गिला है तीरगी से- नवीन

जो इतना ही गिला है तीरगी से
सहर सज कर दिखा दे रौशनी से

हरा कर तो दिया दिल को जला कर
मैं चाहूँ और क्या अब आशिक़ी से

 मुझे तब्दीलियाँ कम ही करेंगी
शकर निकलेगी कितनी चाशनी से

 मिरे दर पर नहीं आती मुसीबत
मैं ख़ुश होता अगर सब की ख़ुशी से

तसल्ली की फुहारें छोड़ती है
जुड़ी हो गर तजल्ली बन्दगी से

बशर लेते हैं यूँ मंदर के फेरे

कि जैसे भागते हों सब सभी से


:- नवीन सी. चतुर्वेदी

हमीं तनहा नहीं हैं आसमाँ पर - नवीन

नया काम


हमीं तनहा नहीं हैं आसमाँ पर
कई टूटे हुये दिल हैं यहाँ पर



किसी की रूह प्यासी रह न जाये
लिहाज़ा दर्द बरसे है जहाँ पर



अमाँ हम भी  किरायेदार ही हैं
भले ही नाम लिक्खा है मकाँ पर



बहारों के लिये मुश्किल घड़ी है
अज़ाब उतरे हैं एक-एक बागवाँ पर



बहुत कुछ याद आ जायेगा फिर से
न रक्खें हाथ ज़ख़्मों के निशाँ पर



हमें जाना है बस पी की नगरिया
नज़र रक्खे हुये हैं कारवाँ पर



'नवीन'अब ख़ैर ही समझो तुम अपनी
वो देखो तीर नज़रों की कमाँ पर



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अजब सा हाल देखा आसमाँ पर
कई टूटे हुये दिल हैं वहाँ पर

बदन की प्यास की ख़ातिर है पानी
लिहाज़ा दर्द बरसे है जहाँ पर

किरायेदार से बढ़ कर नहीं हम
भले ही नाम लिक्खा है मकाँ पर

बहारों में ख़िज़ाएँ नाचती हैं
असर दिखता नहीं पर बागवाँ पर

हमें जाना है बस पी की नगरिया
नज़र रक्खे हुये हैं कारवाँ पर

: नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे हजज मुसद्दस महजूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222 1222 122

मयंक अवस्थी जी को श्रीमती सरस्वती सिंह स्मृति श्रेष्ठ सृजन सम्मान

साहित्य-सृजन हालाँकि किसी सम्मान का मुहताज़ नहीं होता फिर भी "एकनौलेजमेंट इज एकनौलेजमेंट"। समाज के द्वारा मिलने वाली प्रशस्ति बहुत उत्साह प्रदान करती है। विगत दिनों लखनऊ में 'तीसरी-आँख' के वार्षिक समारोह के दौरान भाई श्री मयंक अवस्थी जी को "श्रीमती सरस्वती सिंह स्मृति श्रेष्ठ सृजन सम्मान" प्रदान किया गया। मयंक अवस्थी जी के रचना संसार में ग़ज़ल, छंद के अलावा कवितायें और आलेख भी शामिल हैं। समीक्षा के क्षेत्र में उन्होंने नई राहें खोली हैं। सत्तर के दशक के आख़िरी वर्षों से उन का साहित्यिक सृजन अबाध रूप से ज़ारी है। विभिन्न पत्र पत्रिकायेँ उन्हें स-सम्मान छापती हैं। विभिन्न स्तरीय मंचीय कार्यक्रमों का हिस्सा भी बनते रहते हैं वह। पुरस्कार जिस रचना को मिला, पहले उसे पढ़ते हैं और फिर कार्यक्रम की कुछ झलकियाँ फ़ोटोस के माध्यम से 

 सितारा एक भी बाकी बचा क्या
निगोड़ी धूप खा जाती है क्या-क्या

फ़लक कंगाल है अब, पूछ लीजै
सहर ने मुँह दिखाई में लिया क्या

सब इक बहरे-फ़ना के बुलबुले हैं
किसी की इब्तिदा क्या इंतिहा क्या

जज़ीरे सर उठा कर हँस रहे हैं

मिरी दीवानगी पर वो, हँसा तो - नवीन

मिरी दीवानगी पर वो, हँसा तो
ज़रा सा ही सही लेकिन, खुला तो

अजूबे होते रहते हैं जहाँ में
किसी दिन आसमाँ फट ही पड़ा, तो?

उमीदों का दिया बुझने न देना
जलेगी जाँ अगर दिल बुझ गया, तो

सभी को चाहिये अपना सा कोई
घटेंगे फ़ासले, निस्बत – ‘बढ़ा तो’

सुना है तुमको सब से है मुहब्बत
अगर हमने तुम्हें झुठला दिया, तो?

वो दुनिया भर में भर देंगे उजाले
अगर मग़रिब से कल सूरज उगा – तो

मैं उसको पेश तो कर दूँ जवाहिर
मगर उसकी नज़र में दिल हुआ, तो?

सफ़ीने क्यूँ हटा डाले नदी से?
पुराना पुल अचानक ढह गया, तो?

नहीं कह पाना मुमकिन ही न होगा
“दिया अपना जो उसने वासता, तो”

ग़ज़ल सुनते ही दिल बोला उछल कर
अरे क्या बात है – फिर से ‘सुना तो’


:- नवीन सी. चतुर्वेदी 

हज़ारों साल मैं सोता रहा क्या - नवीन

Youtube Link - https://www.youtube.com/watch?v=SMfEK76YSdc 

हवा के साथ उड़ कर भी मिला क्या
किसी तिनके से आलम सर हुआ क्या

मेरे दिल में ठहरना चाहते हो
ज़रा फिर से कहो – तुमने कहा क्या

डरा-धमका के बदलोगे ज़माना
अमाँ! तुमने धतूरा खा लिया क्या

उन्हें लगता है बाकी सब ग़लत हैं
वो खेमा साम्प्रदायिक हो गया क्या

बदल सकते नहीं पल में अनासिर
हज़ारों साल मैं सोता रहा क्या

अँधेरे यूँ ही तो घिरते नहीं हैं
उजालों ने किनारा कर लिया क्या

बड़े उम्दा क़सीदे पढ़ रहे हो
वजीफ़े में इजाफ़ा हो गया क्या

क़दम रहते नहीं उस के ज़मीं पर
वो पैदा भी हुआ उड़ता हुआ क्या

झगड़ता है कोई यूँ अजनबी से
उसे मुझ में कोई अपना दिखा क्या

तुम्हारे वासते कुछ भी किया नईं
तुम्हारे वासते करना था क्या-क्या

फ़लक पर थोड़ा सा हक़ है मेरा भी
परिंदों को ही उड़ते देखता क्या
नवीन सी. चतुर्वेदी


बहरे हजज मुसद्दस महजूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222 122

ख़ुदा क्या कुछ नहीं लगता हमारा - तुफ़ैल चतुर्वेदी

Tufail Chaturvedi
लफ़्ज़ का अगला अंक आ. तुफ़ैल चतुर्वेदी जी की ग़ज़लों पर आधारित है, ये मालूम पड़ने के बाद कुछ मित्रों ने फरमाइश की थी कि अंक आने में तो अभी काफ़ी वक़्त है तो क्यूँ न २-४ ग़ज़लें यहाँ ठाले-बैठे के माध्यम से पढ़ने को मिलें। मित्रों की इच्छा जब मैंने गुरु जी तक पहुंचाई तो उन्होने सहर्ष २ ग़ज़लें ब्लॉग के प्रेमियों के लिए भेज दीं। आइये पढ़ते हैं उन ग़ज़लों को:- 



उरूज पर ही रहेगी ये रुत ज़वाल की नईं ।
ग़मों को थोड़ी ज़रुरत भी देखभाल की नईं।१।

बहुत सँवार के रखता हूँ दोस्ती को मैं।
कि कोई उम्र मुहब्बत के इंतक़ाल की नईं।२।

तुम्हारे एक इशारे पे हो गया हूँ तबाह।
 ये मुस्कुराने की रुत है ये रुत मलाल की नईं।३।

सुकूते-शहरे-ख़मोशाँ भी कुछ नहीं साहब।
मेरी उदासी अनूठी है ये मिसाल की नईं।४। 

उसे भी ध्यान नहीं है कि अब कहाँ हूँ मैं।
मुझे भी अब तो ख़बर अपने माहो-साल की नईं।५।


उरूज - ऊँचाई
ज़वाल - पतन
सुकूते-शहरे-ख़मोशाँ - क़ब्रिस्तान की शान्ति
माहो-साल - महीने-वर्ष


 बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
मुफ़ाएलुन फ़एलातुन मुफ़ाएलुन फालुन
१२१२ ११२२ १२१२ २२


=====


चमक आभास पर होगी हमारी।
अँधेरों में बसर होगी हमारी ।१।

ख़ुदा क्या कुछ नहीं लगता हमारा।
दुआ क्यों बेअसर होगी हमारी।२।

 फ़रिश्ते खुद को छोटा पा रहे हैं।
ज़मीं पर ही बसर होगी हमारी।३।

उजाले जब अँधेरा बाँटते हैं।
यहाँ कैसे सहर होगी हमारी।४।

उडानी ख़ुद पड़ेगी ख़ाक अपनी।
हवा तो साथ भर होगी हमारी।५।

बचा लेना हवा के रुख़ से दामन।
कि मिट्टी दर-ब-दर होगी हमारी।६।

तिरे बिन हम अकेले क्यों चलेंगे।
उदासी हमसफ़र होगी हमारी।७।

कभी थम जाएँगे आँसू हमारे।
कभी उनको ख़बर होगी हमारी।८।

कभी थमता नहीं सैलाब उस का ?
यक़ीनन चश्मे-तर होगी हमारी।९।

सहर - भोर

बहरे हजज मुसद्दस महजूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
१२२२ १२२२ १२२