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सवैया छन्द - गोपाल प्रसाद गोप

 


कविता की निराली है जाति घनी कवि के अधरान हँसै कविता।

कविता जु उमंग रहै हित सौं प्रिय के हिय माँहिं बसै कविता।

कविता इक प्रेम कौ आश्रय है, बिरहीन के नैन खसै कविता।

कविता कहूँ मंचन पै ठुमकै जु अमीरन कैं बिलसै कविता।

अँगुरीन लों पोर झुकें उझकें मनु खञ्जन मीन के जाले परे - गोविन्द कवि

अँगुरीन लों पोर झुकें उझकें मनु खञ्जन मीन के जाले परे
दिन औधि के कैसें गिनों सजनी अँगुरीन की पोरन छाले परे
कवि गोविन्द का कहियै किहिं सों हमें प्रीत करे के कसाले परे
जिन लालन चाँह करे इतनी उनें देखन के अब लाले परे 

औधि - अवधि 

गोविन्द कवि


दुर्मिल सवैया
कुल चार चरण, आठ सगण प्रति चरण

सवैया, घनाक्षरी, दोहा, सोरठा

कृष्ण के छन्द

आज़ कुछ फुटकर छन्द। पहले तीन दुर्मिल सवैया :-


मन की सुन के मन मीत बने तब कैसे कहें तुम हो बहरे।
पर बात का उत्तर देते नहीं यही बात हिया हलकान करे।
सच में तुमको दिखते नहीं क्या अपने भगतों के बुझे चहरे।
दिखते हैं तो मौन लगाए हो क्यूँ, जगदीश तो वो है जो पीर हरे।।

नव भाँति की भक्ति सुनी तो लगा इस जैसा जहान में तत्व नहीं।
जसुधा की कराह सुनी तो लगा तुमरे दिल में अपनत्व नहीं।
तुम ही कहिये घन की गति क्या उस में यदि होय घनत्व नहीं। 

कृष्ण के छंद

उँगली पे उठाय लिया गिरिराज, प्रबुद्ध, प्रवीण प्रशासक हो। 
तुम कालिय नाग के नाथनहार  - सचेतक, तत्व-विचारक हो।
कुबजा अरु द्रौपदि लाज रखी - तुम सत्य समाज सुधारक हो।
तुम ही तुम ही तुम ही तुम ही तुम ही तुम ही अधिनायक हो।।
    [दुर्मिल सवैया]

प्रेम का पाठ पढ़ाया हमें अरु भक्ति का भाव सिखाते रहे हो।
जीवन की महिमा हमको मुरली की धुनों में सुनाते रहे हो।
सभ्य 'नवीन' समाज बने इस कारण चीर चुराते रहे हो।
गौ-कुल के हित साधन को खुद माखन चोर कहाते रहे हो॥
[मत्तगयन्द सवैया]

माखन से धन को भी कमाएँ कमाल का मन्त्र सिखाया हमें।
कंस से लोहा लिया तुमने जनतंत्र का मन्त्र सुझाया हमें।
वक़्त के साथ चले हर वक़्त यों वक़्त का मोल बताया हमें।
प्रेम सिवाय विकल्प नहीं यह पाठ तुम्हीं ने पढ़ाया हमें॥
 [मालिनी सवैया]

सखियों के सखा गउओं के गुपाल गुवालों के मीत कहाते रहे।
ललिता के मनोहर जाम्बुवती सँग भी तुम रास रचाते रहे।
सब से सब की सब भाँति सुचारू सदैव 'नवीन' निभाते रहे।
समता के लिए तुम जन्म लिया समभाव की ज्योति जगाते रहे॥
[दुर्मिल सवैया]

ब्रजभाषा - दुर्मिल सवैया - अनुप्रास अलंकार

बिरहाकुल बीथि-बजारन बीच बढ़े बहुधा बिन बात किए|
मन में मनमोहन मूरत मंजुल, मादकता मधु-राग हिए|
पहचान पुरातन प्रीतम प्रीत, परी पगलाय प्रवीन प्रिए|
सजनी सब सुंदर साज़-सिँगार सहेज सजी सजना के लिए||