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कभी ऐसा नहीं लगता कभी वैसा नहीं लगता - निदा फ़ाज़ली

कभी ऐसा नहीं लगता कभी वैसा नहीं लगता
ग़रज़ के कोई भी पूरी तरह पूरा नहीं लगता

किसी के लब पे गाली है न ग़ुस्सा है निगाहों में
ये कैसा शह्र है इसमें कोई अपना नहीं लगता

अदालत मोहतरिम है जो भी चाहे फ़ैसला दे दे
सज़ा पाये न जब कोई खता अच्छा नहीं लगता

न रोशनदान चिड़ियों के, न कमरा है किताबों का
इमारतसाज़ ये नक़्शा मिरे घर का नहीं लगता

मदारी की सदा अपनी कशिश खोने लगी शायद
पुराने शोब्दों से अब नया मजमा नहीं लगता
-निदा फ़ाज़ली

निदा फ़ाजली के दोहे

सीधा साधा डाकिया जादू करे महान
इक ही थैली में भरे आँसू अरु मुस्कान ॥

घर को खोजे रात दिन घर से निकले पाँव
वो रस्ता ही खो गया जिस रस्ते था गाँव॥

मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दिल ने दिल से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार॥

बच्चा बोला देखके मस्जिद आलिशान
अल्ला' तेरे एक को इत्ता बड़ा मकान॥