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स्पर्श का आनंद - गणेश कानाटे


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मेरे दिल के नन्हे नर्म गालों पर उम्र चढ़ी ही नहीं!

स्पर्श क्षणिक होता है
स्पर्श का आनंद अमर होता है
माँ और बाबूजी का चूमना
मेरे नन्हे नर्म गालों को
मेरे दिल के नन्हे नर्म गालों को अब भी याद है
मेरे दिल के गालों पर
उम्र चढ़ी ही नहीं!

बाबूजी तो रहे नहीं
उनके गाल चूमने का स्मरण है
अम्मा अब बूढ़ा गयी है
मैं भी अधेड़ हो गया हूँ
अम्मा अब भी चूमती है मेरे गाल
मेरी सालगिरह पर

मै इस नए चूमने का स्मरण
और बचपन के चूमने का स्मरण
दोनों को मिला देता हूँ
मेरे दिल के नन्हे नर्म गाल
सुरक्षित रखेंगे यह सारे स्मरण
उस क्षण तक
जब मैं खुद एक स्मरण हो जाऊंगा

अंततः धरती माँ सहेज कर रखती है
हर बच्चे के नन्हे नर्म गालों को चूमने के स्मरण
जब वें आसमान को चूमने चलें जाते हैं...


गणेश कनाटे

मृद्गन्ध - गणेश कनाटे

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अब जो बारिश आती है 
अब जो मिट्टी भीग जाती है
अब जो गीली मिट्टी की गंध आती है
- बदली बदली सी आती है

इस मृद्गन्ध में अब घुल गयी है सड़ांध
सड़ांध उन मुर्दा जिस्मों की
जो बेटे थे मिट्टी के
पर मिट्टी में मिल गए
उसी मिट्टी में मजबूती से खड़े
पेड़ों पर लटक कर

मैं इस नई गंध के लिए
ढूंढ रहा हूँ, एक नया नाम

आपको सूझे तो लिख दीजियेगा
अपने पास ही कहीं गीली मिट्टी पर
मुझ तक वह गंध पहुंच जाएगी...

गणेश कनाटे

हजारों की संख्या में आत्महत्या करते किसानों को श्रद्धांजलि देते हुए...


* औसतन, हर आधे घंटे में एक किसान आत्महत्या, यह हमारे देश का सच है.

मृद्गन्ध का नया नाम ढूंढ रहा हूँ...

"Philosophers have hitherto interpreted the world; the point however, is to change it." - Karl Marx

अंतिम आलिंगन के आगोश में प्रवेश - गणेश कनाटे


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अंतिम आलिंगन के आगोश में प्रवेश
मेरे प्राणतत्त्व की थकान
अब थक चुकी है, पूर्णतः

मुश्किल है अब
पलकों को उलटकर देखना
सपनों की आंखों में
जो बेहद डरी डरी है हकीकत देखकर

मुश्किल है अब
कानों में प्राण रखना और सुनना
वो आदिम चीखें, चीत्कार
जो उपस्थित है अब भी हवाओं में

मुश्किल है अब
देखना प्राणवान उंगलियों को
जिनसे झरते हैं रंग सतरंगी
और बनाते हैं एक चित्र -
आदम और हव्वा की वेदना का

मुश्किल है अब
साक्षीभाव से देखना
अपने ही शुक्राणुओं को
जीवन का बोझ ढोते हुए...
बड़ा ही मुश्किल है....

मैं और मेरा प्राणतत्त्व अब खड़े हैं थकान के इस अंतिम छोर पर
तुम भी तो थक चुकी हो इस सफर में और खड़ी हो यहां मेरे पास

चल, अब हम छोड़ देते है सारी फिक्र
- फिक्र इस दुनिया के वीभत्स होने की
- फिक्र इस दुनिया के विषम होने की
- फिक्र ये दुनिया बदलेगी या नहीं इसकी

चल ओढ़ लेते हैं एक रजाई
और करते हैं प्रवेश
हमारे अंतिम आलिंगन के आगोश में!


गणेश कनाटे