बहरे मुतदारिक मुसमन सालिम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बहरे मुतदारिक मुसमन सालिम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

राजस्थानी गजल - है दसूं दिश अमूझो घणो श्हैर में - राजेन्द्र स्वर्णकार

है दसूं दिश अमूझो घणो श्हैर में
म्हैं  रैवूं बैवतो आपरी लै’र में
दसों दिशाओं में दमघोटू गुम्फन है इस शहर में
(लेकिन) मैं अपनी ही मौज में (इन सबसे अछूता) घूमता रहता हूं

भीड़ मांहीं मुळकता म्हनैं बै मिळ्या
ले लियो म्हैं अमी रौ मज़ो ज्हैर में
भीड़ में मुझे मुस्कुराती हुई वे मिल गईं
मैंने ज़हर में भी अमृत का आनंद पा लिया

कोई अणजाण बाथां में जद आयग्यो
भेद रैयो कठै आपणै-गैर में
जब कोई अपरिचित बाहों में समा गया तो
अपने-पराये का भेद कहां रहा

भाव कंवळा सवाया हुया प्रीत में
ज्यूं कै बिरखा रौ पाणी मिळ्यो न्हैर में
प्यार में कोमल भावों में श्रीवृद्धि हुई
मानो नहर में वर्षा का शुद्ध जल मिल गया

रीस रै मिस लड़ण’ बै घरै आयग्या
नीं इंयां धन कियो बै म्हनैं म्हैर में
गुस्से के बहाने झगड़ने वे घर आ गईं
मेहरबां हो'कर कभी उन्होंने ऐसे धन्य नहीं किया

आवो बैठो , करो बात मीठी कोई
कैवै राजिंद कांईं पड़्यो बैर में
आओ बैठो , कुछ मीठी बातें करें
राजेन्द्र कहता है कि बैर-विरोध में पड़ा क्या है 

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212

:- राजेन्द्र स्वर्णकार

आप की हूक दिल में जो उठबे लगी - नवीन

आप की हूक दिल में जो उठबे लगी
जिन्दगी सगरे पन्ना उलटिबे लगी

बस निहारौ हतो आप कौ चन्द्र-मुख
जा ह्रिदे की नदी घाट चढ़िबे लगी

पीउ तनिबे लग्यौ, बन गई बौ  लता
छिन में चढ़िबे लगी छिन उतरिबे लगी

प्रेम कौ रंग जीबन में रस भर गयौ
रेत पानी सौ ब्यौहार करिबे लगी

मन की आबाज सुन कें भयौ जै गजब
ओस की बूँद सूँ प्यास बुझबे लगी



:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212


[मानकों के अधिकतम निकट रहते हुये उपरोक्त गजल का भावार्थ]


आप की हूक दिल में जो उठने लगी
जिन्दगी सारे पन्ने उलटने लगी

बस निहारा ही था आप का चन्द्र-मुख
इस हृदय की नदी घाट चढ़ने लगी

पिय जो तनने लगे, बन गई वह लता
छिन में चढ़ने लगी छिन उतरने लगी

प्रेम का रङ्ग जीवन में रस भर गया
रेत पानी सा ब्यौहार करने लगी

मन की आवाज़ सुन कें हुआ ये गज़ब

ओस की बूँद से प्यास बुझने लगी