शिवकाव्य.कोम से साभार:-
अतल शून्य का मौन, तोडते - कौन कहाँ तुम|
१११ २१ २ २१ = ११ / २१२ २१ १२ ११ = १३
दया करो कुछ और, न होना मौन यहाँ तुम|
१२ १२ ११ २१ = ११ / १ २२ २१ १२ ११ = १३
नव जीवन संचार, करो , फिर से तो बोलो|
११ २११ २२१ = ११ / १२ ११ २ २ २२ = १३
तृषित युगों से श्रवण, अहा अमरित फिर घोलो||
१११ १२ २ १११ = ११ / १२ १११११ ११ २२ = १३
रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी के ब्लॉग उच्चारण से साभार:-
समझो आदि न अंत, खिलेंगे सुमन मनोहर|
११२ २१ १ २१ = ११ / १२२ १११ १२११ = १३
रखना इसे सँभाल, प्यार अनमोल धरोहर|
११२ १२ १२१ = ११ / २१ ११२१ १२११ = १३
कवि श्रेष्ठ श्री मैथिली शरण गुप्त जी द्वारा रचित साकेत का द्वादश सर्ग तो रोला छन्द में ही है और उस की शुरुआती पंक्तियों पर भी एक नज़र डालते हैं:-
ढाल लेखनी सफल, अंत में मसि भी तेरी
२१ २१२ १११ = ११ / २१ २ ११ २ २२ = १२
तनिक और हो जाय, असित यह निशा अँधेरी
१११ २१ २ २१ = ११ / १११ ११ १२ १२२ = १३
इसी रोला छंद की तीसरी और चौथी पंक्तियाँ खास ध्यान देने योग्य हैं:-
ठहर तभी, क्रिश्णाभिसारिके, कण्टक कढ़ जा
१११ १२ २२१२१२ = १६ / २११ ११ २ = ८
बढ़ संजीवनि आज, मृत्यु के गढ़ पर चढ़ जा
११ २२११ २१ = ११ / २१ २ ११ ११ ११ २ = १३
तीसरी पंक्ति में यदि यति को प्रधान्यता दी जाए तो यति आ रही है १६ मात्रा के बाद| कुल मात्रा १६+८=२४ ही हैं| परंतु यदि हम 'क्रिष्णाभिसारिके' शब्द का संधि विच्छेद करते हुए पढ़ें तो यूँ पाते हैं:-
ठहर तभी क्रिश्णाभि-सारिके कण्टक कढ़ जा
१११ १२ २२१ = ११ / २१२ २११ ११ २ = १३
अब कुछ अपने मन से| छंद रचना को ले कर लोगों में फिर से जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से एकत्रित हो रहे हैं हम और आप यहाँ पर| हम में से कई सारे न सिर्फ़ बहुत ही सफलता से ग़ज़ल कह रहे हैं बल्कि उनकी तख्तियों को आसानी से समझ भी जाते हैं| एक्जेक्टली शायद न भी हो, पर कुछ कुछ ये नीचे दिए गये वज्ञ [काल्पनिक] भी रोला छंद लिखने में मदद कर सकते है, यथा:-
अपना तो है काम, छंद की बातें करना
फइलातुन फइलात फाइलातुन फइलातुन
२२२ २२१ = ११ / २१२२ २२२ = १३
भाषा का सौंदर्य, सदा सर चढ़ के बोले
फाईलुन मफऊलु / फईलुन फइलुन फइलुन
२२२ २२१ = ११ / १२२ २२ २२ = १३