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श्री राधा आराध्य सुगम गति आराधन की - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

राधा रानी और तुलसी पूजा







श्री राधा आराध्य सुगम गति आराधन की।
जो अति अगम अपार न है मति जहँ निगमन की।
ज्ञान मान की खान ध्यान धारा भगतन की।
प्रिय 'प्रीतम' की प्रान प्रमान पतित पावन की।।


पत्रकारिता यानि, आम इन्साँ का जीवन

जर्नलिस्ट भी यार, देखिए गजब करें हैं|
टी.वी. पे दिन रात, अब क्रिकेटी खबरें हैं|
क्या करते हो यार, हद्द तुमने कर डाली|
अच्छी ख़ासी न्यूज, लगे है चम्मच वाली|१|

ये निकले, वो पहुँच गये, वो बोल रहे हैं|
नाच रहे वो, कूद रहे वो, डोल रहे हैं|
ये खाया, वो पेय पिया, वो कपड़ा पहना|
ये माता, वो बाप, भाई वो उनकी बहना|२|

राजनीति में आप, 'हेय' जिसको कहते हो|
खुद वैसे ही ढोल, बजाते क्यों रहते हो|
बीत गया अब खेल, वर्ल्ड कप जीत गये हम|
बस भी करिए यार, ताकि दम में आए दम|३|

लेकिन यार रवीश, आप जो काम कर रहे|
सही अर्थ में जर्नलिज़्म का नाम कर रहे|
पत्रकारिता यानि, ग़ूढ बातों पे चिंतन|
पत्रकारिता यानि, आम इन्साँ का जीवन|४|

रोला छंद के बारे में अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

भद्रजनों की रीत नहीं ये संगाकारा

हार गए जो टॉस, किसलिए उसे नकारा|
भद्रजनों की रीत, नहीं ये संगाकारा|
देखी जब ये तुच्छ, आपकी आँख मिचौनी|
चौंक हुए स्तब्ध, जेफ क्रो, शास्त्री, धोनी|1|

तेंदुलकर, सहवाग, ना चले, फर्क पड़ा ना|
गौतम और विराट, खेल खेले मर्दाना|
धोनी लंगर डाल, क्रीज़ से चिपके डट के|
समय समय पर दर्शनीय, फटकारे फटके|2|

जब सर चढ़े जुनून, ख्वाब पूरे होते हैं|
सब के सम्मुख वीर, बालकों से रोते हैं|
दिल से लें जो ठान, फिर किसी की ना मानें|
हार मिले या जीत, धुरंधर लड़ना जानें|3|

त्र्यासी वाली बात, अब न कोई बोलेगा|
सोचेगा सौ बार, शब्द अपने तोलेगा|
अफ्रीका, इंगलेंड, पाक, औसी या लंका|
सब को दे के मात, बजाया हमने डंका|4|

छन्द - रोला

पाक दिल जीत घर गया

तेंदुलकर, सहवाग, कोहली, गौतम, माही|
रैना सँग युवराज, कामयाबी के राही|
नहरा और मुनाफ़, इक दफ़ा फिर से चमके|
भज्जी संग जहीर, खेल दिखलाया जम के|१|

हारा मेच परन्तु, पाक दिल जीत घर गया|
एक अनोखा काम, इस दफ़ा पाक कर गया|
नफ़रत का हो अंत, प्यार वाली हो बिगिनिंग|
शाहिद ने ये बोल, बिगिन कर दी न्यू ईनिंग|२|

अब अंतिम है मेच, दिल धड़कता है पल छिन|
सब के सब बेताब, हो रहे घड़ियाँ गिन गिन|
कैसा होगा मेच, सोचते हैं ये ही सब|
बोल रहे कुछ लोग, जो नहीं अब, तो फिर कब|३|

तेंदुलकर तुम श्रेष्ठ, मानता है जग सारा|
आशा तुमसे चूँकि, खास अंदाज तुम्हारा|
तुम हो क्यूँ जग-श्रेष्ठ, आज फिर से बतला दो|
मारो सौवाँ शतक, झूमने का मौका दो|४|

भारत में किरकेट, बोलता है सर चढ़ के|
सब ने किया क़ुबूल, प्रशंसा भी की बढ़ के|
अपनी तो ये राय, हार हो या फिर विक्ट्री|
खेलें ऐसा खेल, जो क़ि बन जाए हिस्ट्री|५|

छन्द : रोला
विधान ११+१३=२४ मात्रा

उफ़ ये थर्टीफर्स्टेनिया और रोला छन्द पर चर्चा

उफ़ ये थर्टीफर्स्टेनिया| हर साल आता है और गुजर जाता है| ये भी जैसे कि एक पर्व बन चुका है, होली दीवाली की तरह| अधिकतर लोगों से जुड़ा होता है ये अलग अलग स्वरूपों में|

इस बार की होली यादगार होली रही| समस्या पूर्ति मंच पर 'होली का त्यौहार' बहुत जोरदार तरीके से मना| वातायन पर भी जहाँ एक ओर हिन्दी साहित्य के पितामह भारतेंदु हरीशचंद्र जी की ग़ज़ल पढ़ने को मिली वहीं दुष्यंत कुमार और धर्मवीर भारती जी के बीच का ग़जलिया पत्राचार भी उन दिनों की साहित्यिक नोंक झोंक की यादें ताज़ा करा गया| ठाले बैठे पर तो लालम लाल रंग थे ही|

आप सभी ने इस होली का मज़ा कइयों गुना बढ़ा दिया| वैसे तो हम में से ज़्यादातर, अभी क्रिकेट के महाकुंभ यानि कि वर्ल्ड कप के फाइनल मेच के ख़यालों में खोए हुए हैं उस के बाद भारतीय नववर्ष / संवत्सर आ रहा है| कई सारे दफ़्तरों में तो शनि / रवि / सोम छुट्टियों वाला माहौल है| उस के बाद मंगलवार ओन्वार्ड्स हम लोग रेगयुलर लाइफ की पटरी पर लौटेंगे, मोस्ट प्रोबेबली|

लगे हाथों कुछ बातों की शुरुआत कर देते हैं| जैसा क़ि हमने पहले भी व्यक्त किया क़ि अगली समस्या पूर्ति रोला छंद पर होने वाली है सो आइए बेसिक बातों की शुरुआत करते हैं रोला छंद की, बहुत ही संक्षेप में; और सभी विद्वत्जनों से फिर से सविनय अनुरोध करते हैं क़ि वे अपने अपने आलेख [रोला छन्द पर] प्रस्तुत करने की कृपा करें| उस के बाद हम घोषणा करेंगे समस्या पूर्ति की पंक्ति की|

रोला छंद

१. चार पंक्तियों वाला होता है रोला छंद
२. रोला छन्द की हर पंक्ति दो भागों में विभक्त होती है
३. रोला छन्द की हर पंक्ति के पहले भाग में ११ मात्रा अंत में गुरु लघु [२१] या लघु लघु लघु [१११] अपेक्षित
४. रोला छन्द की हर पंक्ति के दूसरे भाग में १३ मात्रा अंत में गुरु गुरु [२२] / लघु लघु गुरु [११२] या लघु लघु लघु लघु [११११] अपेक्षित| कई सारे विद्वानों का मत है क़ि रोला की पंक्ति की समाप्ति गुरु गुरु [२२] से ही होनी चाहिए|
५. रोला छन्द की किसी भी पंक्ति की शुरुआत में लघु गुरु लघु [१२१] के प्रयोग से बचना चाहिए, इस से लय में व्यवधान उत्पन्न होता है|

रोला छन्द के कुछ उदाहरण:-

हिंद युग्म - दोहा गाथा सनातन से साभार:-:-

नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है.
२२११ ११२१=११ / १११ ११ ११ २११२ = १३
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है.
२१२१ ११ १११=११ / २१२ २२११२ = १३
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारा-मंडल हैं
११२ २१ १२१=११ / २१ २२ २११२ = १३
बंदीजन खगवृन्द, शेष-फन सिंहासन है.
२२११ ११२१ =११ / २१११ २२११२ = १३


शिवकाव्य.कोम से साभार:-

अतल शून्य का मौन, तोडते - कौन कहाँ तुम|
१११ २१ २ २१ = ११ / २१२ २१ १२ ११ = १३
दया करो कुछ और, न होना मौन यहाँ तुम|
१२ १२ ११ २१ = ११ / १ २२ २१ १२ ११ = १३
नव जीवन संचार, करो , फिर से तो बोलो|
११ २११ २२१ = ११ / १२ ११ २ २ २२ = १३
तृषित युगों से श्रवण, अहा अमरित फिर घोलो||
१११ १२ २ १११ = ११ / १२ १११११ ११ २२ = १३

रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी के ब्लॉग उच्चारण से साभार:-

समझो आदि न अंत, खिलेंगे सुमन मनोहर|
११२ २१ १ २१ = ११ / १२२ १११ १२११ = १३
रखना इसे सँभाल, प्यार अनमोल धरोहर|
११२ १२ १२१ = ११ / २१ ११२१ १२११ = १३


कवि श्रेष्ठ श्री मैथिली शरण गुप्त जी द्वारा रचित साकेत का द्वादश सर्ग तो रोला छन्द में ही है और उस की शुरुआती पंक्तियों पर भी एक नज़र डालते हैं:-

ढाल लेखनी सफल, अंत में मसि भी तेरी
२१ २१२ १११ = ११ / २१ २ ११ २ २२ = १२
तनिक और हो जाय, असित यह निशा अँधेरी
१११ २१ २ २१ = ११ / १११ ११ १२ १२२ = १३

इसी रोला छंद की तीसरी और चौथी पंक्तियाँ खास ध्यान देने योग्य हैं:-
ठहर तभी, क्रिश्णाभिसारिके, कण्टक कढ़ जा
१११ १२ २२१२१२ = १६ / २११ ११ २ = ८
बढ़ संजीवनि आज, मृत्यु के गढ़ पर चढ़ जा
११ २२११ २१ = ११ / २१ २ ११ ११ ११ २ = १३

तीसरी पंक्ति में यदि यति को प्रधान्यता दी जाए तो यति आ रही है १६ मात्रा के बाद| कुल मात्रा १६+८=२४ ही हैं| परंतु यदि हम 'क्रिष्णाभिसारिके' शब्द का संधि विच्छेद करते हुए पढ़ें तो यूँ पाते हैं:-

ठहर तभी क्रिश्णाभि-सारिके कण्टक कढ़ जा
१११ १२ २२१ = ११ / २१२ २११ ११ २ = १३

अब कुछ अपने मन से| छंद रचना को ले कर लोगों में फिर से जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से एकत्रित हो रहे हैं हम और आप यहाँ पर| हम में से कई सारे न सिर्फ़ बहुत ही सफलता से ग़ज़ल कह रहे हैं बल्कि उनकी तख्तियों को आसानी से समझ भी जाते हैं| एक्जेक्टली शायद न भी हो, पर कुछ कुछ ये नीचे दिए गये वज्ञ [काल्पनिक] भी रोला छंद लिखने में मदद कर सकते है, यथा:-

अपना तो है काम, छंद की बातें करना
फइलातुन फइलात फाइलातुन फइलातुन
२२२ २२१ = ११ / २१२२ २२२ = १३

भाषा का सौंदर्य, सदा सर चढ़ के बोले
फाईलुन मफऊलु / फईलुन फइलुन फइलुन
२२२ २२१ = ११ / १२२ २२ २२ = १३

रोला छन्द संबन्धित कुछ अन्य उदाहरणों के लिए यहाँ पर क्लिक करें :-



तख्तियों के जानकार इस बारे में और भी बहुत कुछ हम लोगों से साझा कर सकते हैं|

बहुत लंबा न खींचते हुए फिलहाल यहाँ विराम लेते हैं और इंतेज़ार करते हैं आप लोगों के विचारों का| कई सारे लोग सोनेट और रुबाई को भी रोला से जोड़ते हुए बातें करते हैं.......................................