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वातायन - ग़ज़ल - प्राण शर्मा / छंद - सौरभ पाण्डेय.

शौक़  से  पढ़िए मेरे दिल की किताब - प्राण शर्मा

प्राण शर्मा

हर किसी के घर का रखते हैं हिसाब
ख़ुफ़िया से होते हैं जिनके दिल जनाब

पूछता  हूँ  आपसे  कि  गाली  में
आपको अच्छा लगेगा  क्या  जवाब

खैरख्वाहों  में  भी  वो  खामोश  है
दिल में सच्चाई जो हो तो दे जवाब

आपको  रोका  नहीं  मैंने  कभी
शौक़  से  पढ़िए मेरे दिल की किताब

बात  सोने  पर सुहागा  सी  लगे
सादगी  के साथ हो कुछ तो हिजाब

छोड़ अब दिन-रात का गुस्सा सभी
कम न पड़ जाए तेरे चेहरे की आब

वास्ता खुशियों से पड़ता है ज़रूर
कौन रखता है मगर उनका हिसाब

धुंध  पस्ती  की  हटे  तो बात हो
कुछ नज़र आये दिलों के आफताब

कोई क्या पूछे कभी उससे कि वो
माँगने  पर  भी  नहीं  देता जवाब
 
देखने  में  भी  तो लगता है हसीं
सिर्फ  खुशबू  ही नहीं देता गुलाब

रोज़ ही इक ख्वाब से आये हैं तंग
`प्राण` परियों वाला हो कोई तो ख्वाब
:- प्राण शर्मा


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सौरभ पाण्डेय



जीवन-सार
नाधिये जो कर्म पूर्व, अर्थ दे  अभूतपूर्व
साध के संसार-स्वर, सुख-सार साधिये|

साधिये जी मातु-पिता, साधिये पड़ोस-नाता
जिन्दगी के आर-पार, घर-बार बाँधिये|

बाँधिये भविष्य-भूत, वर्तमान,  पत्नि-पूत
धर्म-कर्म, सुख-दुख, भोग, अर्थ राँधिये|

राँधिये आनन्द-प्रेम, आन-मान, वीतराग
मन में हो संयम, यों, बालपन नाधिये|१|

 
हो धरा ये पूण्यभूमि, ओजसिक्त कर्मभूमि
विशुद्ध हो विचार से, हर व्यक्ति हो खरा|

हो खरा वो राजसिक, तो आन-मान-प्राण दे
जिये-मरे जो सत्य को, तनिक न हो डरा|
 
हो डरा मनुष्य लगे, जानिये हिंसक उसे
तमस भरा विचार स्वार्थ-द्वेष हो भरा|

हो भरा उत्साह और सुकर्म के आनन्द से-
वो मनुष्य सत्यसिद्ध, ज्ञानभूमि हो धरा|२|

 
दीखते व्यवहार जो हैं व्यक्ति के संस्कार वो
नीति-धर्म साधना से, कर्म-फल रीतते|

रीतते हैं भेद-मूल, राग-द्वेष, भाव-शूल
साधते विज्ञान-वेद, प्रति पल सीखते|

सीखते हैं भ्रम-काट, भोग-योग भेद पाट
यों गहन कर्म-गति, वो विकर्म जीतते|

जीतते अहं-विलास, ध्यान-धारणा प्रयास
संतुलित विचार से, धीर-वीर दीखते|३|

 

-- सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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तान दें पताका उच्च हिंद की जहान में

ध्यान दें समाज पर अग्रज हमारे सब,
अनुजों की कोशिशों को बढ़ के उत्थान दें|

उत्थान दें
जन-मन रुचिकर रिवाजों को,

भूत काल वर्तमान भावी को भी मान दें|

मान दें
मनोगत विचारों को समान रूप,
हर बार अपनी ही जिद्द को न तान दें|

तान दें
पताका उच्च हिंद की जहान में औ,

उस के तने रहने पे भी फिर ध्यान दें||

सांगोपांग सिंहावलोकन छन्‍द:-
घनाक्षरी कवित्त की तरह ८+८+८+७ = ३१ अक्षर / वर्ण
अंत में गुरु वर्ण
पहले चरण के अंत के शब्द दूसरे चरण के शुरू में, दूसरे के तीसरे, तीसरे के चौथे चरण के शुरू में आने चाहिए
चौथे चरण के अंत के शब्द पहले चरण के शुरू के शब्दों के समान होने चाहिए
प्रस्तुत छंद में 'दें' शब्द सम्मिलित और अर्थ पूर्ति करने वाला शब्द है

रब नें ग़ज़ब यार प्रकृति बनाई है

ROSE


बनाई है विधाता नें वसुंधरा बाक़ायदा
रीति-नीति-प्रीति, कन-कन में समाई है|

समाई है सम्‍वेदना, दान-प्रतिदान, मान,
आन-बान, ख़ान-पान प्रभुता बताई है|

बताई है पते की बात यै ही हर शास्त्र* नें
लाँघी मरज़ाद जानें, वानें हार पाई है|

पाई है बिना एफर्ट हमनें बतौर गिफ्ट
रब नें ग़ज़ब यार प्रकृति बनाई है||
बनाई है..............

ब्रजभाषा, हिन्दी, उर्दू और अँग्रेज़ी शब्दों के साथ अनुप्रास अलंकार से अलंकृत यह "सांगोपांग सिंहावलोकन" छंद है|
इस छंद में व्यक्त बातों से जुड़ी शंकाओं के समाधान हेतु गुलाब के फूल का चित्र है|



*one may consider this as a research based STUDY with logics

सांगोपांग सिंहावलोकन छंद - घनाक्षरी कवित्त - नवीन

सांगोपांग सिंहावलोकन छंद
घनाक्षरी कवित्त

कवित्त का विधान
टोटल ४ पंक्तियाँ
हर पंक्ति ४ भागों / चरणों में विभाजित
पहले, दूसरे और तीसरे चरण में ८ वर्ण
चौथे चरण में ७ वर्ण, १६+१५ भी चलता है।
इस तरह हर पंक्ति में ३१ वर्ण

सिंहावलोकन का विधान
कवित्त के शुरू और अंत में समान शब्द
जैसे प्रस्तुत कवित्त शुरू होता है "लाए हैं" से और समाप्त भी होता है "लाए हैं" से

सांगोपांग विधान
ये मुझे प्रात:स्मरणीय गुरुवर स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी ने बताया कि छंद के अंदर भी हर पंक्ति जिस शब्द / शब्दों से समाप्त हो, अगली पंक्ति उसी शब्द / शब्दों से शुरू हो तो छंद की शोभा और बढ़ जाती है| वो इस विधान के छंन्द को सांगोपांग सिंहावलोकन छंद कहते थे|


कवित्त:
लाए हैं बाजार से दीप भाँति भाँति के हम,
द्वार औ दरीचों पे कतार से सजाए हैं|
सजाए हैं बाजार हाट लोगों ने, जिन्हें देख-
बाल बच्चे खुशी से फूले ना समाए हैं|
समाए हैं संदेशे सौहार्द के दीपावली में,
युगों से इसे हम मनाते चले आए हैं|
आए हैं जलाने दीप खुशियों के जमाने में,
प्यार की सौगात भी अपने साथ लाए हैं||


:- नवीन सी. चतुर्वेदी