सत्य ही तो है जब जब जो जो होना है तब तब सो सो होता है.
साहित्यम्
हिन्दुस्तानी-साहित्य सेवार्थ एक शैशव-प्रयास
अतिथि सम्पादकीय - अर्चना वर्मा सिंह
पन्नों
में कुछ शब्द उकेर देना मात्र ही साहित्य नहीं है। साहित्य एक साधना है, एक परंपरा
है जो सतत चलती आ रही है। पाठकों के लिए यह एक मानसिक खुराक है, माँ शारदे का आशीष है, समाज का दर्पण है।
कविता - हिसाब किताब में कच्ची महिलाएँ - अम्बिका झा
कविता - हिसाब किताब में कच्ची महिलाएँ – अम्बिका झा
हिसाब किताब में
बहुत ही कच्ची होती हैं
महिलाएँ
तभी तो खर्च कर देती हैं
अपने सुकून के पल
खर्च कर देती हैं लड़कियाँ
बचपन
ताकि उसे भी वो स्नेह मिल
सके
जो भाइयों को मिलता आ रहा है
व्यंग्य - टेस्टायमान भव - अर्चना चतुर्वेदी
देखो भई हम हैं नए ज़माने के यानी मशीनी युग के लोग | हर काम मशीनों से करने के आदी, हाथ से कोई काम ना करें |
लघुकथा - माघ की ठिठुरन में हरीराम की झोपड़ी – सुनीता चौधरी
मधु की कलम से - अन्धायुग: एक युग की प्रतिश्रुति
डॉ. धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘अंधा युग’ (१९५३ ई.) हिंदी साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रभावशाली काव्य-नाटक है। ‘अंधा युग’ का कथास्रोत महाभारत है।
गीत - निज को कभी नहीं बहकाना - श्रद्धा पाठक ‘स्वस्ति’
(आधार छंद - अरिल्ल छंद, कुल – संस्कारी, 16 मापनी
का सममात्रिक छंद, चरणान्त - 122/11)
निज को कभी नहीं बहकाना
माया देख नहीं भरमाना
गीत - जब हूक उठे व्याकुल दिल में, और धड़कन रुकती सी लागे - दीपशिखा सागर
जब हूक उठे व्याकुल दिल में, और धड़कन
रुकती सी लागे,
तुम उसी जगह आना मिलने,जिस जगह से बिछड़े थे हम तुम...
गीत - संकेतों में प्रेम - सुविधा पंडित
(दोहा छन्द आधारित गीत)
भास्वर है भ्रू-भंगिमा, भव्य रुचिर रस-रीति
प्रकट करे पल-पल पलक, पुलकित प्रणय-प्रतीति
नवगीत - त्राहि-त्राहि करती है धरती, पौधे हरे लगाओ - डॉ ऋतु अग्रवाल
त्राहि-त्राहि करती है धरती, पौधे हरे लगाओ
मानव जीवन मिट जाएगा,पर्यावरण बचाओ
अवधी लोकगीत - हम तो हई बाबा अंगना के चिड़िया - किरन तिवारी
( विदाई गीत )
हम तो हई बाबा अंगना के चिड़िया
चहकीले हम
सुबहो-शाम हो
काहिके शदियां
रचाव तारा बाबा
काहे देते घर से निकाल हो
अवधी लोकगीत – गवनवां हम कबहुँ न जइबे – कुसुम तिवारी ‘झल्ली’
सुनी ल हो बाबुल अर्जियां
गवनवां हम कबहुँ न जइबे
माई के कोरवा में रहिबे
गवनवां हम कबहुँ न जइबे
माई के अचरा में रहबै
गवनवां हम कबहुँ न जइबे
ब्रजगजल - प्रेम कौ अनुपात आखिर कैसैं आँकौ जायगौ – उर्मिला माधव
यों बताऔ, मन के भीतर कैसैं झाँकौ जायगौ
एक ही लठिया ते कैसे प्रेम हाँकौ जायगौ
हिन्दी गजल - भीड़ दुखों की पल-पल भारी रहती है – डॉ. दमयन्ती शर्मा ‘दीपा’
जीवन है सो मारा-मारी रहती है
मन में तो सुरभित फुलवारी रहती है
हिन्दी गजल - न पौरुष और न ही पुरुषार्थ समझा – पूनम विश्वकर्मा
परम् समझा न तू परमार्थ समझा
कहाँ तू ज्ञान का भावार्थ समझा
मराठी गझल - जरा जरा माझ्या डोक्याला ताप पाहिजे - पूजा भडांगे
पिदाड, भोळा, मारकुटा पण मायाळूही
ग़ज़ल - वादियों से ख़ामुशी के ज़ख़्म वो धोने लगा - मुमताज़ अज़ीज़ नाज़ाँ
चुप हुए जब हम तो मौसम फूट कर रोने लगा
फिर हुई ज़ख़्मी परों को आरज़ू परवाज़ की
हौसला फिर से जुनूँ की हसरतें ढोने लगा
ग़ज़ल - इन निगाहों पे मुहब्बत में है इल्ज़ाम बहुत - अर्चना वर्मा सिंह
इन निगाहों पे मुहब्बत में हैं इल्ज़ाम बहुत
बेसबब दिल को ये देती रहीं पैग़ाम बहुत
दिल-ए-नादाँ जो कभी करता नहीं उल्फ़त तो
ज़िन्दगी में नहीं होते कभी कोहराम बहुत


































