01.02.2026 (महिला विशेषांक)

नमस्कार.

सत्य ही तो है जब जब जो जो होना है तब तब सो सो होता है.

अतिथि सम्पादकीय - अर्चना वर्मा सिंह

पन्नों में कुछ शब्द उकेर देना मात्र ही साहित्य नहीं है। साहित्य एक साधना है, एक परंपरा है जो सतत चलती आ रही है। पाठकों के लिए यह एक मानसिक खुराक है, माँ शारदे का आशीष है, समाज का दर्पण है। 

कविता - वक्त की अहमियत – शशि दीप

 

 

वक्त किसी का पहले या बाद में नहीं होता,

वह किसी से कोई फरक नहीं बरतता;

कविता - मन की लिपि - अनिता सुरभि

 

 
जैसे कोरी हथेलियों पर
हिना छोड जाती है अपना रंग-
जैसे पीछे छूट गई
पुरानी पगडंडियाँ

कविता - निधी सिंह खींची

 

मुझमें एक कहानी
आहिस्ते–आहिस्ते बसर
कर रही है,
छोटे–छोटे किस्सों,
छोटी खुशियों से
बुनती जा रही है।

कविता – सुकून - हर्षा खेड़ा खन्ना

 


राम ने जब पिनाक उठाकर,

प्रत्यंचा होगी चढ़ाई ,

तब क्या एक सांस सुकून की

सीता ले पायी होगी ?

कविता - हिसाब किताब में कच्ची महिलाएँ - अम्बिका झा

कविता - हिसाब किताब में कच्ची महिलाएँ – अम्बिका झा

 

हिसाब किताब में

बहुत ही कच्ची होती हैं महिलाएँ

तभी तो खर्च कर देती हैं अपने सुकून के पल

खर्च कर देती हैं लड़कियाँ बचपन

ताकि उसे भी वो स्नेह मिल सके

जो भाइयों को मिलता आ रहा है

कविता - मैंने रास्तों से ज्यादा खुद को पढ़ा है इस साल - कल्याणी गुप्ता 'कृति'


मैंने रास्तों से ज्यादा

 खुद को पढ़ा है इस साल

हर मोड़ पर

कोई मंजिल नहीं,

व्यंग्य - टेस्टायमान भव - अर्चना चतुर्वेदी

देखो भई हम हैं नए ज़माने के यानी मशीनी युग के लोग | हर काम मशीनों से करने के आदीहाथ से कोई काम ना करें | 

कहानी – कृतज्ञता – आशा पाण्डेय ‘ओझा’

आज अच्छी बरसात आई, गाँव-गलियों नालियों में पानी भर गया, घरों के चौगान भी सभी जलमग्न हो गये।

लघुकथा - माघ की ठिठुरन में हरीराम की झोपड़ी – सुनीता चौधरी

 माघ का महीना था। ठंडी हवा सुइयों की तरह शरीर में चुभ रही थी। आसमान से उतरती ओस मानो धरती को और ठंडा करने पर तुली हो।

मधु की कलम से - अन्धायुग: एक युग की प्रतिश्रुति

डॉ. धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘अंधा युग’ (१९५३ ई.) हिंदी साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रभावशाली काव्य-नाटक है। ‘अंधा युग’ का कथास्रोत महाभारत है। 

झूलना छंद - विनीता निर्झर


छवि श्याम की अनुपम लगे, प्रिय राधिका के संग

मुस्कान है जादूभरी, भरती हृदय, निज रंग

सायली - ललिता जोशी

 

मीरा

हुई वैरागन

गाती गिरिधर-गोपाल

जग कहता

भक्तिमति

माहिये - डॉ. मधु गुप्ता

 

कोई ना वेध सका,

पुतली मछली की,

राजा का धैर्य थका

गीत - निज को कभी नहीं बहकाना - श्रद्धा पाठक ‘स्वस्ति’

 
 (अरिल्ल छन्द आधारित गीत)

(आधार छंद - अरिल्ल छंद, कुल – संस्कारी, 16 मापनी का सममात्रिक छंद, चरणान्त - 122/11)

 

निज को कभी नहीं बहकाना

माया देख नहीं भरमाना

गीत - जब हूक उठे व्याकुल दिल में, और धड़कन रुकती सी लागे - दीपशिखा सागर


जब हूक उठे व्याकुल दिल में, और धड़कन रुकती सी लागे,

तुम उसी जगह आना मिलने,जिस जगह से बिछड़े थे हम तुम...

गीत - सूझें कहीं न राहें, भ्रम जाल है बिछाता - रश्मि शुक्ल 'किरण'

  

सूझें कहीं न राहें, भ्रम जाल है बिछाता

हो कर घना बहुत ही, ये कोहरा डराता

गीत - संकेतों में प्रेम - सुविधा पंडित

 

(दोहा छन्द आधारित गीत)

भास्वर है भ्रू-भंगिमा, भव्य रुचिर रस-रीति

प्रकट करे पल-पल पलक, पुलकित प्रणय-प्रतीति

गीत - हर बूँद में पीड़ा झरे, इतना विरह मत दीजिए - डॉ माधुरी डड़सेना "मुदिता "

 

हर बूँद में पीड़ा झरे, इतना विरह मत दीजिए

जीवन अधूरी प्यास है, बस प्यार देकर सींचिए

नवगीत - त्राहि-त्राहि करती है धरती, पौधे हरे लगाओ - डॉ ऋतु अग्रवाल


 (सार छन्द आधारित नवगीत )

त्राहि-त्राहि करती है धरती, पौधे हरे लगाओ

मानव जीवन मिट जाएगा,पर्यावरण बचाओ

नवगीत - प्रेम बंधक - सीमा अग्रवाल

 


प्रेम बंधक

फ़रतें आज़ाद ! 

कैसा दौर है यह !

संस्कृत गीति – मधुमासः – डॉ. रेखा शुक्ला

 


विलसति आलि ! मधुरवसन्तः
प्रवहति शीतलमन्दसमीरः

संस्कृत गीति – अयि शातनाहतपादपाः – डॉ. नवलता

 


 अयि शातनाहतपादपा विपिनेद्य दूयध्वे कथम्
शाखासु नूतनपल्लवानां हास आगन्ता पुनः

संस्कृत गीति - हे भरतमातः! ते नमः - डॉ. कमला पाण्डेय

कथय कैकयि! साम्प्रतं किमु दुष्करं विहितं त्वया।
राज्याऽभिषेकविधिः कथं विफलीकृतःपरिशङ्कया।।१ ।।

अवधी लोकगीत - हम तो ह‌ई बाबा अंगना के चिड़िया - किरन तिवारी

 

( विदाई गीत )

हम तो ह‌ई बाबा अंगना के चिड़िया

चहकीले  हम सुबहो-शाम हो

काहिके शदियां  रचाव तारा बाबा

काहे देते घर से निकाल हो

अवधी लोकगीत – गवनवां हम कबहुँ न जइबे – कुसुम तिवारी ‘झल्ली’

 

सुनी ल हो बाबुल अर्जियां

गवनवां हम कबहुँ न जइबे

माई के कोरवा में रहिबे

गवनवां हम कबहुँ न जइबे

माई के अचरा में रहबै

गवनवां हम कबहुँ न जइबे

ब्रजगजल - प्रेम कौ अनुपात आखिर कैसैं आँकौ जायगौ – उर्मिला माधव

 

 
प्रेम कौ अनुपात आखिर कैसैं आँकौ जायगौ
यों बताऔ, मन के भीतर कैसैं झाँकौ जायगौ
 
पीर कौ अनुमान अब तक कौन कर पायौ कहौ
एक ही लठिया ते कैसे प्रेम हाँकौ जायगौ

हिन्दी गजल - भीड़ दुखों की पल-पल भारी रहती है – डॉ. दमयन्ती शर्मा ‘दीपा’

 


 भीड़ दुखों की पल-पल भारी रहती है
जीवन है सो मारा-मारी रहती है
 
बोल पिता के काँटे जैसे हैं तो क्या
मन में तो सुरभित फुलवारी रहती है

हिन्दी गजल - न पौरुष और न ही पुरुषार्थ समझा – पूनम विश्वकर्मा

 

न पौरुष और न ही पुरुषार्थ समझा
परम् समझा न तू परमार्थ समझा
 
तुझे तो ज्ञान का अपने अहम है
कहाँ तू ज्ञान का भावार्थ समझा

ગુજરાતી ગઝલ - કલમનો સાથ લઈ મથવાનું બાકી છે - અંકિતા મારુ 'જીનલ


કલમનો સાથ લઈ મથવાનું બાકી છે,

હજી તો કેટલું લખવાનું બાકી છે!

मराठी गझल - जरा जरा माझ्या डोक्याला ताप पाहिजे - पूजा भडांगे

 

जरा जरा माझ्या डोक्याला ताप पाहिजे
असो कसाही जगावयाला बाप पाहिजे
 
पिदाड, भोळा, मारकुटा पण मायाळूही
बाबा बाबा म्हणावयाला बाप पाहिजे

भोजपुरी गजल - एक दिन एक साल गुजरत बा - वीणा सिन्हा


एक दिन एक साल गुजरत बा

का पता बात ई उ समझत बा  

 

छोड़ के चल गइल कहाँ जाने

अब करेजा में टीस टुभकत बा

ग़ज़ल - वादियों से ख़ामुशी के ज़ख़्म वो धोने लगा - मुमताज़ अज़ीज़ नाज़ाँ

 

वादियों से ख़ामुशी के ज़ख़्म वो धोने लगा
चुप हुए जब हम तो मौसम फूट कर रोने लगा

फिर हुई ज़ख़्मी परों को आरज़ू परवाज़ की
हौसला फिर से जुनूँ की हसरतें ढोने लगा

ग़ज़ल - इन निगाहों पे मुहब्बत में है इल्ज़ाम बहुत - अर्चना वर्मा सिंह

 

इन निगाहों पे मुहब्बत में हैं इल्ज़ाम बहुत
बेसबब दिल को ये देती रहीं पैग़ाम बहुत
 
दिल-ए-नादाँ जो कभी करता नहीं उल्फ़त तो
ज़िन्दगी में नहीं होते कभी कोहराम बहुत