साहित्यम्
हिन्दुस्तानी-साहित्य सेवार्थ एक शैशव-प्रयास
01.03.2026 (महिला विशेषांक भाग 2)
अतिथि सम्पादकीय - अर्चना वर्मा सिंह
आलेख - ये अंग्रेजी स्कूलों की हिंदी - ममता श्रवण अग्रवाल
कविता - कभी ऐसे भी सोचना - प्रज्ञा मिश्र ‘पद्मजा’
भीतर कहीं खटकने लगते हैं
सही समय पर बात न हो
तो सम्बन्ध चटकने कहते हैं
कविता - अंहकार क्या है - डॉ. शबनम आलम
अंहकार है
या, खुद को सर्वश्रेष्ठ समझना
अंहकार है
सहजता या सरलता का अभाव
अंहकार है
पिरामिड - डॉ इन्दु मिश्र मंडला
हुआ 🌹
उदित 🌹
नव सूर्य 🌹
लालिमा फैली🌹
नव आस जगी 🌹
सूरज सा उगना🌹
पंख पसार उड़ो🌹
मत घबराना 🌹
आगे बढ़ना 🌹
सदा रोज🌹
सीखना 🌹
यही 🌹
है 🌹
🌷
निरूप घनाक्षरी छन्द - अनीता सिंह तोमर 'अनी
छवि लगती है न्यारी, रास रचते बिहारी,
मोहित हैं गोपी सारी, कान्हा की दीवानी।
कुंडलियां छंद - डॉ ऋतु अग्रवाल
मौसम ने परवान चढ़, किया धरा को तुष्ट।।
किया धरा को तुष्ट, फूलती सरसों पीली।
विहग रहे हैं झूम, देख नभ आभा नीली।।
पुष्पों से 'ऋतु' प्रेम,
जताने आए भँवरे।
तनिक ठहर जा दुष्ट, कहाँ जाता है कुहरे।।
चौपाई छंद - श्रद्धा पाठक 'स्वस्ति'
ढूँढे आज गोपियाँ सारी।।
कहाँ छुपे हो कान्हा छलिया।
रंग साँवरा ले साँवलिया।।
दोहे - प्रतिभा प्रसाद 'कुमकुम
जंबुद्वीप में आज भी , प्रेम
सुधा अनुबंध ।।
संस्कृति में संस्कार हो , शिक्षा
जग में पूर्ण ।
नई कोंपलें जब खिलें , मधुरसता का चूर्ण ।।
दोहे - डॉ रानी तँवर
बाँधै ऊखल सौं कसे, जसुदा माखन चोर।।
नरम देह कनु की भई, रसरी गरि कै लाल।
अँखियन तें अँसुवा झरैं, गरम हु’इ गवा भाल।।
राजस्थानी लघुकथा - पर्दो अर गहना - डॉ रानी तँवर
सोने-चाँदी री झंँकार, गहना-गठ्ठा, लाल-पीळा जोड़ा, बींदणी असी सजली लागी जणों कोई देवी मूर्त्ति हो।
संस्मरण - रवि रश्मि 'अनुभूति'
हिन्दीगजल - प्रेम की भावना रखो मन में – डॉ आरती कुमारी
फूल खिलते हैं जैसे उपवन में
राम जैसे न बन सको लेकिन
तुम लगाओ न ध्यान रावन में
ગુજરાતી ગઝલ - શબદ નામે સાથી, શબદ છે સહારો - શબનમ ખોજા
લખ્યો એની નિશ્રામાં મારો ગુજારો.
મને મારી ભીતર મળ્યો એકતારો
કોઈ આવી, મારી નજર તો ઉતારો!
ગુજરાતી ગઝલ - ધૈર્ય મારું જોઈ શરમાઈ જશે - અંજના ભાવસાર ‘અંજુ’
તારી 'ના' 'ના'.. 'હા'માં બદલાઈ જશે!
તારી પાંપણ ઢાળીને તું રાખજે,
જૂઠ તારું નહિ તો પકડાઈ જશે.
मराठी गझल - प्रवाहाचे नियम विसरायचे आता – निर्मिती कोलते
दिवे पाण्यामधे सोडायचे आता
उशाला स्वप्न जर झोपून गेले
तर
कशाला रात्रभर जागायचे आता
ग़ज़ल - मैं दर्दो अज़ीयत की तलबगार नहीं हूँ - सपना एहसास
सो जिन्स-ए-महब्बत की ख़रीदार
नहीं हूँ
ख़ुद अपने ही हाथों से किया
तर्के-त’अल्लुक़
अब छोड़ दिया उसको तो नादार नहीं हूँ




































