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व्यंग्य - आम आदमी और मसीहा – कमलेश पाण्डेय

वो भी एक आम आदमी ही हैइसमें संदेह की कोई गुंजाईश नहीं दिखती।  इस वजह के अलावा कि सीजन के सबसे आम फल आम को वो खूब पसंद करता हैऔर अपने परिवेश में शक्तिशाली व्यक्ति या संस्थाओं को खुद इसी रसीले फल सरीखा नज़र आता है, कुछ और तथ्य भी हैं जो उसे आम सिद्ध करते हैं।  

व्यंग्य - कर लेना काम है सरकार का - कमलेश पाण्डेय

टैक्स को कर कहा गया है। यही करदाता के करों से किसी कर्ता के हाथों में आकर उसे कुछ करने की प्रेरणा और शक्ति देता है। कर सभी देते हैंवो भी जिनकी कमर कर के बोझ से टूटी हुई होती हैमगर कर्ता गिने चुने ही होते हैं जिन्हें करों की राशि से संपन्न होने वाले काजों से अच्छा कट प्राप्त होता है। कर चाहे कड़ाई से वसूला जाता होउससे

व्यंग्य वो एक पार्टी - कमलेश पाण्डेय

व्यंग्य

वो एक पार्टी  - कमलेश पाण्डेय

पूरी दुनिया में दावत लेने-देने की बड़ी समृद्ध परंपरा है। लोग-बाग बात-बात में दावत दे डालते हैं और लेने यानी मांगने की स्थिति तो कुछ ऐसी है कि दावत बिना बात के भी मांगी जाती है। दावत को हिन्दी में पार्टी कहा जाता है। वैसे राजनीतिक दल भी अपने आप को पार्टी ही कहते हैं। इतना तो निश्चित है कि पार्टी बनाने या आयोजित करने कामूल उद्देश्य खाना-पीना है बशर्ते यह खाना-पीना दूसरों के ख़र्चे पर हो।

कुछ लोग नियमित रूप से अपने आस-पड़ोस में संभावित पार्टी-दाताओं की खोज में रहते हैं। कहीं खुशी की एक किरण कौंधी नहीं कि वे जा धमके। बिना पार्टी का वादा लिये वे कभी नहीं लौटते। हमारी कॉलोनी में भी एक शर्मा परिवार है जिनकी पार्टी मांगने की छापामार शैली से बाक़ी लोग इस कदर आक्रांत हैं कि मनहूसियत ओढ़े बैठे रहते हैं और ईश्वर से दुआ करते हैं कोई खुशख़बरी भूले से भी उनकी ज़िन्दगी में न आ टपके।

पार्टियां घर पर भी आयोजित की जाती हैं। मेरी श्रीमतीजी का तो ये ख़ास शगल है। अक़्सर वो किसी को भी घर बुला लेती हैं और जी-भर के जीमाती हैं। इस पार्टी के दौरान और बाद भी वे इन तृप्त मेहमानों द्वारा बनाये गये तारीफ़ों के पुल परखुश-खुश टहलती रहती हैं। पार्टियों की आचार-संहिता में साफ़ लिखा है कि पार्टी लेने वाले को देनी भी पड़ती है। श्रीमतीजी की इस ख़ब्त के एवज में दूसरे भी अक्सर हमें पार्टी दे डालते हैं। हमारी पार्टी और बदले में चुकाई गई पार्टी में कभी-कभी वही फ़र्क होता है जो आकार के संदर्भ में कद्दू और सरसों के दाने में। श्रीमतीजी का उत्साह आम तौर पर इससे मलिन नहीं होता। पर एक बार वे पार्टियों की लेन-देन का रिश्ता ऊपर बताये गये शर्मा-परिवारसे जोड़ बैठीं। ज़ाहिर है पार्टी पहले हमने ही दी। फिर जो हुआ पार्टियों के दर्शन पर हमारे नज़रिये में एक नया पहलू जोड़ गया। वही प्रसंग पाठकों के लाभार्थ यहां प्रस्तुत है।

ये एक ऐतिहासिक पार्टी थी। श्रीमतीजी अपनी शामत यानी शर्मा परिवार को शाम की पार्टी यानी डिनर का न्यौता देकर हमेशा की तरह हरक़त में आ गईं। ऐसे मूड में वो सिवा इसके कि क्या पकेगा औरकितना पकेगा, कुछ भी सोचना, सुनना या बोलना पसंद नहीं करतीं। होते-होते व्यंजनों की फ़ेहरिश्त लंबी और रंग-बिरंगी होती चली जाती है। इसका भी ध्यान रखती हैं कि अगले दो दिन तक घर में खाना पकाने की नौबत न आये । आख़िर में परोसा जाने वाला ‘मीठा’ सबसे पहले बनता है और आठ-दस परिवारों के लिये काफ़ी होता है। उस दिन भी इसी अंदाज़ में तैयारी हुई।

मेहमान कुल ढाई ही थे- मियां-बीबी और एक बच्चा। शुरुआत तो धीमी रही पर धीरे-धीरे तीनों की जठराग्नि भभकने लगी। हाथों और मुखों के बीच चल रही गतिविधियां रफ़्तार पकड़ने लगीं तब हमें एहसास हुआ कि अब तक तो सिर्फ़ ‘वार्म-अप’ का दौर था। सुरसा देवी की सच्ची भक्त प्रतीत होती मिसेज़ शर्मा ने तक़रीबन तीस बार दो-दो चम्मच हर व्यंजन को चख-चख कर ही टेबल पर रखे सारे डोंगे निबटा दिये। तब श्रीमतीजी को अपना ‘रिज़र्व’भी खोलना पड़ा। कड़ाही चढी हुई थी, डोंगे, मर्तबान, पतीले और हांडियों के ढक्कन खुले पड़े थे, मेहमान हमें परोसने की ज़हमत से आज़ाद कर ख़ुद ही अपने प्लेट भर रहे थे। कचौरियां तो तीनों मुखों में यों समाती जा रही थीं जैसे आंधियों में पत्ते उड़-उड़ कर किसी कुएं में गिरते जायें। चावल, रायता, पापड़और मिर्च के अचार भी हमारी फटी-फटी आंखों के सामने ही उन तीन हवन कुंडों में समा गये। मुझे तो ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी रेगिस्तान से ऊंटों का एक परिवार हमारे यहां पड़ाव डाले हुये है और किसी लम्बे सफ़र के लिये अपने कूबड़ भर रहा है। श्रीमतीजी ने बदहवासी में मीठे का पूरा डोंगा ही उनके सामने रख दिया और समूचे का समूचा अपनी आंखों के सामने ही अदृश्य होता देखते हाथ मलती रहीं। इस पड़ाव पर श्रीमतीजी के मन में अपने प्लेट और डोंगों को लेकर भी आशंका उठी कि कहीं वोभी न उदरस्थ कर लिए जायें। पर उन्हें सिर्फ चाटकर छोड़ दिया गया। आख़िर छः घंटों बाद ये कारवां गुजर गया और हम टेबल पर उड़ता जूठन का ग़ुबार देखते रहे। अगले दो तीन दिन तो खाना बनाने कीक्या ज़रूरत न पड़ती, श्रीमतीजी के साथ-साथ मुझेभी बच्चों सहित उसी रात खाना बनाने में जुतना पड़ा।

श्रीमतीजी इस हादसे से जल्दी ही उबर आईं। उन्हें दावतों की परम्परा पर पूरा भरोसा था सो आश्वस्त थीं कि इसका बदला पार्टी लेने की बारी के वक़्त चुका लिया जायेगा। अपने स्वभाव के विपरीत वे अक्सर उन्हें पार्टी देने के लिये टोकने लगीं। शर्मा दंपत्ति पार्टी के देन-पक्ष से बिल्कुल अनजान थे।ख़बर थी कि आजतक अपने घर में उन्होंने किसी को पानी तक नहीं पिलाया। गज़ब की एकरूपता थी परिवार के हर सदस्य में- सब एक से खाऊ और एक से ही टरकाऊ। उनके बच्चे का जन्मदिन गुजरा, शादी की सालगिरह बीती, पर हर बार पूरे एहतियात से याद रख हमारे अग्रिम बधाईयां देने के बावज़ूद पार्टी देने का इरादा उनके हाव-भाव से कतई नहीं झलका। एक रोज़ सुबह-सुबह हमारे जासूसों ने हमें ख़बर दी कि उनके यहां कल रात केक कटा है। हमने तुरन्त एक बड़ा सा गुलदस्ता बनवाया और उनके यहां धावा बोल दिया। वे टालने वाले पैंतरे देते रहे पर हमने उनके ही पार्टी वसूली के पैंतरों से उन्हें काटा और उनसे शाम की पार्टी मुकरर्र करवा ही ली। अपने यहां पिछली पार्टी का भोजन-ध्वंस याद कर-कर के हमने दोपहर के भोजन का त्याग किया। ऊंट वाले कूबड़ तो हमें थे नहीं पर अपने इकलौटे पेट अपनी औक़ात-भर खाली रखते हुये हम देर शाम उनके यहां पार्टी खाने जा पहुंचे।
पहुंच तो गये पर रसोई में कोई सुगबुगाहट न देख पेट की कुलबुलाहट बढ़ने लगी। ये अच्छा हुआ कि पकते हुये स्वादिष्ट खानों की गंध हवा में न होने से पूरे शबाब पर जागी हुई हमारी भूख ऊंघने लगी। कुछ देर और हुई तो वह लोट गई और लगभग आख़िरी सांसें ले रही थी कि अचानक कुछ डोंगे और प्लेट हमारे सामने पेश होकर हमारी भूख में प्राण फूंक गये।

हमारे सामने दो अनोखे व्यंजन न देखे न सुने रखे थे। एक डोंगे में ऊपर तक पतले कीचड़ सा पानी भरा था। हमने कौतूहलवश उसमें चम्मच हिलाया तो वहां कुछ ठोस पदार्थ भी होने का अंदेशा हुआ। ज़रा गहरे पैठ कर हमने चम्मच बाहर निकाला तो वह एक मुर्गे का टुकड़ा निकला। स्थिति को समझकर मैंने मेज़बान से एक सुझावनुमा निवेदन किया कि इस जलाप्लावित व्यंजन में अगर मुर्गे की बजाय मछलियां होतीं तो क्या बेहतर नहीं होता। आगे श्रीमतीजी ने, जो अबतक भूख और सदमे से चुप बैठी थीं, कुढ़ते हुये जोड़ा कि आज तक उन्होंने मुर्गों को पानी में डुबकी लगाते नहीं देखा। मेरे बेटे ने भी लगे हाथों अपने सामान्य ज्ञान की झलक पेश करते हुए कहा कि कुछ लोग पानी में हाथ डाल कर ज़िंदा मछलियां पकड़ लेते हैं और अफ़सोस ज़ाहिर किया कि काश हम इस डोंगे में हाथ डाल कर वैसा कर पाते; पर ये तो हो नहीं पायेगा क्योंकि डोंगे में भरे पानी में तो मुर्गे हैं, वो भी ज़िन्दा नहीं। श्रीमतीजी ने तत्काल इस व्यक्तव्य को सुधारा कि- मुर्गे नहीं मुर्गा कहो, वो भी पूरा नहीं, शायद एक चौथाई। इस मुर्ग-मीन -विवाद पर शर्माजी ने ये सूचना देकर विराम डाल दिया कि डोंगे में पड़ी वस्तु वस्तुतः‘चिकन करी’ है इसलिये इसमें ‘फ़िश’ डालने का तो सवाल ही नहीं उठता। इस नई जानकारी के बाद मैं‘करी’ शब्द की परिभाषा पर चिंतन करने लगा।

टेबल पर पड़े दूसरे डोंगे में रखा पदार्थ भी हमें चुनौती दे रहा था कि हमें पहचानो तो जानें। उसे व्यंजनों की श्रेणी में शामिल करने से पहले आश्वस्त हो लेने की ज़रूरत थी। ये एक वर्णसंकर-सी वस्तु थी जिससे कभी खिचड़ी का भ्रम होता था तो कभी हलवे का। यों लगता था मानो खिचड़ी बनते-बनते हलवा हो गई हो, या इसका उलटा भी हुआ हो सकता है। इस संभावना से भी मुकरना ठीक नहीं होगा कि मेज़बान ने खिचड़ी का हलवा नामक कोई व्यंजन ट्राई किया हो। ये चीज़ देखने में मूलतः श्वेत-श्याम थी, पर बीच-बीच में हरा और लाल रंग भी झलकता था। नन्हें-नन्हें काले कण तो सब ओर बिखरे थे। संभवतः जीरा, चावल-दाल और सब्ज़ियों की मदद से इसे बनाया गया था, पर इस क्षण सबका अस्तित्व एक-दूसरे में यों आत्मसात हो चुका था जैसे आत्मा एक रोज़ परमात्मा में समाहित हो  जाती है। हम पेशोपेश में थे कि इसे डोंगे से प्लेट में कैसे लाया जाये क्योंकि चम्मच की मदद से ऐसा करने की कोशिश में पूरा डोंगा ही टेबल से उठकर प्लेट की ओर लपका था। तब मेरे बेटे ने इज़ाजत मांगी कि क्या वो इसमें से ज़रा-सी अपनी फटी किताब की ज़िल्द के लिये ले ले। मैंने दरियादिली से कहा कि ले सके तो ले ले। इससे पहले कि हम इस पदार्थ की अन्य उपयोगिताओं के बारे में विचार करते, सीन पर तीसरा तत्व प्रकट हुआ।

इस बार मेज़बान ने हमारी कल्पनाशीलता की उड़ान पर रोक लगाते हुये एकदम घोषणा कर दी कि ये चीज़-विशेष कचौरी है। हमारे लिये ये और भी जोख़िम का सामान हुआ क्योंकि हाज़िर की गई चीज़ कचौरियों के लिये निर्धारित मानदंडों के अनुरूप न तो फूली-फूली थी, न गोल-गोल, न ख़स्ता, बल्कि ग़रीब के पेट-सी सपाट, अंडमान के द्वीपों-सी छितर-बितर और पत्थरों-सी मज़बूत दिख रही थी। एक का आकार तो ऐसा था मानों एक छिपकली पकड़ कर बेल दी गई हो। श्रीमतीजी ने आख़िर मुंह खोला, बेशक खाने के लिये नहीं, बल्कि फुसफुसा कर ये बताने के लिए कि ऐसी कचौरी उस पनियल चिकन करी को ध्यान में रख कर ख़ास बनाई गई है कि उसमें अगर इसे सुबह तक डुबा कर रखा जाय तो मज़बूत दांत वाले कल ज़रूर खा सकेंगे।
जिस अद्भुत पाक-कला का प्रदर्शन कर इन पदार्थों का निर्माण किया गया था उसे नमन कर हमने एक तश्तरी में थोड़ा-थोड़ा सब कुछ मिला लिया और कुछ देर उससे जूझते रहे। पहला निवाला ज्यों ही चम्मच पर चढ़कर मुंह में उतरा गले से एक चीख-सी निकली। गले ने उसे रास्ता देने से साफ़ इनकार कर दिया था। उधर जीभ जो थी उस निवाले को बाहर ठेलने में लगी रही जबकि औपचारिकता ने हमारा मुंह बंद कर रखा था। ख़ुद को सांप कहने में संकोच होते हुये भी हम इसे सांप- छ्छूंदर वाली हालत कहेंगे क्योंकि गले में अटकी चीज़ उसी पशु-विशेष सी बू लिये थी। जहां तक स्वाद का सवाल है इस मिश्रण में ज़रूर किसी दूसरी दुनिया का ही होगा, क्योंकि अगले निवाले को उठाने से हाथ ने भी साफ़ मना कर दिया। हम क्षमा-सी मांगते घर लौट आये। हमारे पीछे एक और डोंगा गुहार लगाता रह गया कि ज़रा हमें भी चख लो। इस डोंगे में पीले रंग का एक मलीदा-सा भरा था जिसे मेज़बान ने बड़े इसरार से हमें पेश कर कहा था कि ‘मीठा तो लीजिए!’

पार्टी से लौट कर हमें वही करना पड़ा जो घर पर शर्मा परिवार को पार्टी देने वाले दिन किया था। दुपहर से सुलगते पेटों को ठंढा करने के लिये आधी रात को हमने आपस में काम बांट कर खाना पकाया, यानी बेटे ने दौड़-दौड़ कर सामान जुटाया, श्रीमतीजी ने काटा, गूंथा, बेला और पकाया और मैंने दोनों को निर्देश दिये। खाने की टेबल पर गर्म खाने को हाथ लगाने से पहले हमने ईश्वर को धन्यवाद दिया और शपथ ली कि पार्टियों के मामले में कभी बदले जैसी बुरी भावना मन में नहीं लायेंगे।

कमलेश पाण्डेय - 9868380502

व्यंग्य पेड़ों से जुड़े उद्योग- एक ताज़ा रिपोर्ट - कमलेश पाण्डेय

पेड़ या वृक्ष देश के विशेष संसाधन हैं. इनका तना, इनकी छाल, शाखा और जड़ें सब देश की ही  संपत्ति हैं. पेड़ इतने उपयोगी पदार्थ हैं कि देश का इनके बिना चल ही नहीं सकता, हालांकि ये खुद बेचारे अपनी जड़ें थामे एक ही जगह तब तक खड़े रहते हैं जबतक कोई इन्हें काट कर आरा मशीन तक के सफ़र पर न ले जाए.

मनुष्य जाति के विकास में पेड़ सदियों से वरदान साबित हुए हैं. इन्हें काटने और उगाने दोनों क्रियाओं में विकास छुपा होता है. पेड़ आदमी के लिए प्रकृति और पर्यावरण से प्यार जताने का सबसे आसान जरिया हैं क्योंकि ये उनके आस-पास ही खड़े मिल जाते हैं. भारत में तो पेट-पूजा के बाद एक आम क्रिया है पेड़-पूजा. धर्म-ग्रंथों के अनुसार नन्हें-से तुलसी के झाड से लेकर विराट आकार के बरगद तक सब पूजनीय हैं. उधर आधुनिक विकास-ग्रंथों में भी लिखा है कि दो-चार पेड़ लगा देने से पर्यावरण के खिलाफ किये गए सारे पाप धुल जाते हैं. पेड़ ही आदमी के लिए गुलिस्तान रचते हैं, और पेड़ की ही किसी शाख पर बैठ कर एक उल्लू कभी-कभी उस गुलिस्तान को बर्बाद कर देता है. पेड़ शायरों के भी काम आते हैं जिनकी जुबान में इन्हें दरख़्त या शज़र वगैरह कहा जाता है. ज़ाहिर है पेड़ इश्क़-मुहब्बत को भी छाँव देते हैं. पेड़ों की छाल पर अपना नाम गोदने के अलावा प्रेमी लोग इसके गिर्द लिपटना या गाना भी पसंद करते हैं. 

पेड़ बड़े प्रेरणा-दायी होते हैं. इनके विशाल, धीर और मज़बूती से जमे रहने की प्रकृति से लोग श्रद्धानुसार प्रेरित होते रहते हैं. एक नेता को अपनी जड़ें जमा कर बैठने और भीतर ही भीतर उन्हें फैलाते जाने का आईडिया पेड़ों से ही मिलता है. उधर गरीब जनता को भी पेड़ों की डालियों पर कब्ज़ा जमाये बैठे पशु-पक्षियों के घोंसले देख कहीं भी छप्पर डाल कर झोंपड़-पट्टी बना लेने की प्रेरणा मिलती है.

पेड़ का ढांचा लकड़ी का होता है, जिसकी डालियाँ अक्सर झूला झूलने जैसे दीगर किस्म के काम आती रही हैं. पर हमारे देश का कुटीर उद्योग तो मानों पेड़ों के हर अंग का मोहताज है. हमारे मकान के चौखट-दरवाज़े से लेकर कुर्सी-टेबल-पलंग सबमें ये लकड़ी ही काम आती है. फल-फूल, पत्ते, तिनके, छालें सब आदमी किसी न किसी काम के लिए समेट लेता है. इधर पेड़ सम्बन्धी उद्योग में एक जड़ता-सी आ रही थी कि अपने देश के एक प्रदेश में पेड़ की डाल का एक नया उपयोग देखने में आया. कुछ उद्यमियों ने इन डालियों पर लड़कियां लटकाने का व्यापक स्तर पर प्रयोग कर उद्योग को नई दिशा दी. इससे वहां समाज में काफी उत्साह का माहौल पैदा हुआ है. हालांकि इस उद्यम को कानूनी मान्यता नहीं है, पर उत्साही जन इसे चोरी-छुपे उसी तरह संपन्न कर रहे हैं जैसे हमारे देश में आम तौर पर लघु-उद्योग किये जाते हैं. आखिर एक उद्योग जमाने के लिए चाहिए क्या, ज़रा सी हिम्मत और थोडा पुलिस-प्रशासन का सहयोग. सूत्रों के अनुसार प्रदेश सरकार इस नई गतिविधि में विकास की नई संभावनाएँ देख रही है. उसका मानना है कि इस उद्योग को कानूनी तौर पर प्रोत्साहन तो नहीं दिया जा सकता पर अगर कोई इसे करना ही चाहे तो कुछ विनियमन-नियंत्रण के अधीन कर ले. विकास के लिए प्रतिबद्ध और युवाओं को इसके लिए उकसाने को प्राथमिकता देने वाली सरकार मानती है कि युवाओं में काफी ऊर्जा होती है और उनकी गलतियों तक में विकास की संभावनायें छुपी होती है.

जैसा कि स्पष्ट है जिस पेड़ की डाली पर ये उद्यम किया जाता है उस पेड़ और आस-पास के इलाके के सार्वजनिक महत्त्व में ढेर सारी वृद्धि हो जाती है. इस पेड़ को उसे देखने वालों की भीड़ समेत टीवी और अखबारों पर लगातार दिखाया जाता है जिससे एक अन्यथा पिछड़े इलाके में वह एक अल्प-कालिक पर्यटन-स्थल की हैसियत पा लेता है. ये सरकार के संज्ञान में है कि कई ऐसे पेड़ों के आस-पास का स्थल मेले या पर्यटन के लिहाज से विकास के उपयुक्त नहीं होता है. इसलिए जहां-तहां इस उद्यम को संपन्न करने की बजाय यदि प्रशासन द्वारा प्राधिकृत पेड़ों को ही चुना जाय तो बेहतर होगा. इस काम के लिए हरेक जनपद में थानेदार की अध्यक्षता में एक अनौपचारिक प्राधिकरण बनाया जा सकता है. पेड़ चुनने का आधार सरल होगा- जैसे पेड़ किसी झुरमुट में न हो और उसके इर्द-गिर्द इतनी जगह हो कि बीस-तीस न्यूज़-चैनलों की गाड़ियां, दो-चार हज़ार लोगों का धरना और अफसोस जताने आये नेताओं और उनके समर्थक सब समा जाएँ. पास से कोई पक्की सड़क गुजरती हो तो ऐसे पेड़ को प्राथमिकता मिले. हमारे यहाँ सब प्रकार के उद्यमी मौजूद हैं. जैसे एक बड़ी फैक्टरी के गिर्द ढेरों छोटी फैक्टरियां उग आती हैं, यहाँ भी संभावना दिखते ही लोग काम-चलाऊ पर्यटन इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर लेंगे. अपने देश में जगह हो तो मेले और मजमें का समाँ कहीं भी बंध जाता है.

प्रदेश के शासकीय गलियारों में आशा व्यक्त की जा रही है कि वहां के युवा उद्यमी पुरुष अपने नेताओं से प्रेरणा लेकर नियमित रूप से निर्धारित पेड़ों पर लड़कियां लटकाने का उद्योग जारी रखेंगे, ताकि प्रदेश के विकास को नई दिशा और युवा की ऊर्जा को नया निकास मिल सके.

कमलेश पाण्डेय - 9868380502

व्यंग्य - आम आदमी और मसीहा - कमलेश पाण्डेय

वो भी एक आम आदमी ही हैइसमें संदेह की कोई गुंजाईश नहीं दिखती. इस वजह के अलावा कि सीजन के सबसे आम फल आम को वो खूब पसंद करता हैऔर भी कुछ तथ्य उसे आम सिद्ध करते हैं. थोड़ा क्या ठीक-ठाक सा पढ़ जाने के बादउसने एक अदद सरकारी नौकरी भी जुटा ली है और गरीबी रेखा को फलांग कर बड़ी ही मद्धम चाल से मध्यम वर्ग के प्रवेश द्वार की ओर बढ़ रहा है. अपने तमाम आम भाई लोगों के साथ वो रेल-बस और फुटपाथ पर चलता है और शाम को अपने दो कमरों के घर में बत्तीस इंच के टीवी पर देश-दुनिया के हाल सुनकर उत्तेजित हो जाता है. फिर रोटी खाकर अपने घर-खर्चों और किश्तों-विस्तों की चिंताएं ओढ़ कर सो जाता है. गाहे-बगाहे चाय सुड़कते हुए वो अपने दिमाग में संचित पुराने और टीवी अखबार से अर्जित नए-ताज़े ज्ञान का कॉकटेल अपने सहयोगियों के साथ बहसों में बाँटता है. दुनिया अपनी चाल से चलती रहती है और वो अपनी.

पर एक मायने में उसका आम होना खासा ख़ास है. आम आदमी होने के नाते उसके ख़ास हक है. देश के हुक्मरान उस पर नज़रे-करम रखते हैं और उसी को ध्यान में रख कर देश चलाने की नीतियाँ बनाते हैं. उसे सब साथ लेकर चलना चाहते हैं. कोई अपना हाथ पकडाता है तो कोई खुद ही उस जैसा होने का दावा करता है. नारों-पोस्टरों में सिर्फ उसी के कल्याण की बात होती है और उनपर जो चेहरा आम-आदमी बता कर चिपका होता हैहू-ब-हू उसी का होता है. वोट की अपील उसी से की जाती है जो वो दे भी देता है. उसके हाथों बनाई गई सरकारें जो भी काम करती है- भला उसी का हुआ माना जाता है. पर जाने क्योंपांच साल बीत जाने के बाद वह आम का आम ही रह जाता हैहाँमुहावरे वाली गुठलियों के दाम कोई और ही ले जाता है.

साल-दर-सालदशक-दर-दशक ये आम आदमी अपनी खोल में बैठा रहता हैजो एक ब्लैक-होल सरीखा शून्य है जिसमें आख़िर उसकी ऊर्जाप्रतिभाआशाएं-आकांक्षाएं आपस में पिस-घुल कर हताशा का घोल बन जाती हैं. वह उदास-सा होकर मुत्यु-सी एक सुषुप्तावस्था में उतर जाता है. उस नीद में वह बार-बार “कुछ भी नहीं हो सकता- कुछ भी नहीं!” बडबडाता रहता है. फिर एक दिन ये आम आदमी अंगडाई लेता उठ खड़ा होता है. आँखे मलकर पहले इधर-उधर देखता है कि आखिर उसे किस आवाज़ ने चौंका दिया. प्रायः चौंकाने वाला कोई आन्दोलन होता हैजिसका एक अगुआ होता है और पांच-दस पिछ्लग्गुये होते हैं. 

उसे अगुआ के पीछे एक आभा-मंडल का आभास होता है. कोई अवतारमसीहा या तारणहार है ये तो! उसके आगे-पीछे हज़ारों उस जैसे आम जन मुट्ठियाँ बांधे नारे लगा रहे होते हैं- उम्मीदों से भीगे और उस मसीहे की वाणी को पीते. ये मंजर देख वो पूरी तरह जाग उठता है और “शायद कुछ हो सकता है” बुदबुदाता उस भीड़ का हिस्सा बन कर अगुआ के पीछे चल पड़ता है. वो शिद्दत से यकीन करने लगता है कि यही अगुआ वो शख्स है जो उसे उसके ब्लैक-होल से बाहर ला सकता है. ये यकीन उसे अपनी दिनचर्या और चिंताओं को भूलने और लाठियां तक खाने की शक्ति देता है. वह चलता जाता हैमगर पीछे ही बना रहता हैबढ़कर उस अगुआ से कदम नहीं मिलाताउसके मुंह में अपनी बातें डालने की हिमाक़त नहीं करता. उसे मसीहा अपनी अंतरात्मा में घुसा हुआ और सब कुछ जानता प्रतीत होता है.

फिर मसीहा उसके भरोसे को सीढ़ी बना कर ऊपर चढ़ जाता हैचुनाव जीतता है और उसे लक्ष्य बना कर कल्याण के काम में लग जाता है. परजाने क्यों कुछ रोज़ मसीहे को निहारने के बाद वो फिर हताश होने लगता है. आखिर वो अवसाद के अपने पुराने खोल में घुस कर बैठ जाता है- फिर से लम्बी नींद सोने और किसी अगले मसीहे की पुकार पर जागने को. क्या आम आदमी और मसीहे के इस अंतर्संबंध को ही लोकतंत्र कहते हैं?

कमलेश पाण्डेय- 9868380502

रचना वही जो फालोवर मन भाये - कमलेश पाण्डेय

वो अब एक बड़े लेखक हैं। हालाँकि अब तक तय नहीं कर पाये या तय करने के पचड़े में नहीं पड़े कि उन्होंने अब तक जो लिखा है वो है क्या। उनके शब्द जैसे व्योम से उतर कर किसी भी क्रम में जगह बनाते एक रचना का आकार ले लेते हैं। वे शब्दों को आतिशबाज़ी की चिङ्गारियों की तरह छिटकने देते हैं, गद्यनुमा पद्य या पद्यनुमा गद्य के साँचे में पानी की चाल से उतरने देते हैं। उनकी रचनाओं का वज़न दो ग्राम(अर्थात दो शब्द) से लेकर दो टन (यानि महाकाव्यात्मक) तक हो सकता है पर उनके ‘फैन’ और ‘फ़ालोवर’ उन्हें अपने दिल पर लपक लेते हैं। वे आज के दौर में फेसबुक के साहित्यकार हैं।

ये सिलसिला कहाँ से शुरू हुआ, मुझे नहीं पता। अब तो वो फेसबुक तक सीमित भी नहीं। अपने फेस्बुकिया अवतार में वे बाहर भी पहचाने जाते हैं। बाहर वाले अक्सर अन्दर झाँक कर ये जायज़ा लेते हैं कि कौन कितने पानी में तैर रहा है।  ज़ाहिर है वो अब समन्दर की हैसियत रखते हैं। उनके पाँच हज़ार से ज्यादा चाहने वाले, न केवल एक-एक लफ़्ज़  ‘वाह-वा’ का घन-नाद करते हैं बल्कि उनकी एक आह पर चीत्कार भी कर उठते हैं। इस अनोखी दुनिया के बाहर दम-तोड़ती लघु-मझोली पत्रिकाएँ, अपनी हैसियत पर शर्मिन्दा होती हुई उन्हें अपनी पत्रिकाओं को पवित्र करने का न्योता भेजती रहती हैं। फेसबुक के इतर भी वे विभिन्न ब्लॉग के गलियारों में टहलते पाये जाते हैं।

प्रयोगधर्मी तो खैर वे हैं ही, अब तो साहित्यिक वादों से भी बहुत आगे निकाल आए हैं। किसी वाद में शामिल करने की जिद हो ही तो उन्हें ‘खुल्लमखुल्ला-वाद’, ‘निर्बाध-वाद’ या सबसे सटीक ‘फ़ालोवर-वाद’ का प्रणेता कहा जाना चाहिए। ऐसा कहने के पीछे इतना सा तर्क है कि उनके एक-एक शब्द के पीछे उन्हें ‘फॉलो’ करते पाठक होते हैं जो न सिर्फ उन्हें जज़्ब कर लेते हैं बल्कि तुरन्त उनका असर भी बताते हैं। कई बार वो यूँ ही पाठकों का मूड जानने के लिए चारे की तरह कुछ शब्द तैरा देते है और उसमें फँसी प्रतिक्रिया की मछलियों को टटोल कर अगली रचना की रेसिपी तय कर लेते हैं।

एक दिन उन्होने फेसबुक की दीवार पे लिखा “ऊँ... ऊँ...”।´दो सौ लोगो ने तत्क्षण इसे पसन्द किया। कुछ क्षण और प्रतीक्षा के बाद एक प्रतिक्रिया आई – ‘उफ़्फ़! अकेलेपन की उदासी का कितना मार्मिक बयान..” उन्हें प्रेरणा मिल गई। दो चार सौ शब्दों, कुछ विरामों- अर्धविरामों और चन्द रिक्त स्थानों की मदद से उन्होने अमूर्त-चित्राङ्कन जैसा एक महान शाहकार रच डाला। बताना जरूरी नहीं कि पाठकों ने किस तरह उसे सराहा।

जैसा कि पहले से स्पष्ट है कि वे शैली, वाद, कथ्य, सरोकार आदि के बन्धनों से परे हैं। सीधे हृदय से लिखते हैं। ये हृदय जो है उससे हजारों तार निकल कर पाठकों के हृदयों में घुसे हुये हैं। फेसबुक तन्त्र का जाल रोज़-ब-रोज़ उनके प्रशन्सकों की तादाद में इजाफ़ा करता जा रहा है।  इन प्रशन्सकों को उन पर इस हद तक भरोसा है कि वे अपनी दीवार पर दो ‘डॉट’ भी भेज दें तो उनकी अर्थवत्ता सिद्ध करने की होड़ लग जाती है।

इस मुकाम को हासिल करने के लिए शुरू में उन्होने एक ही रचनात्मक काम किया था कि फेसबुक पर अपनी तस्वीर की जगह एक सुन्दर कन्या का चेहरा डाला और आगे समय-समय पर उसी कन्या की विभिन्न मुद्राओं को अपनी साहित्येतर गतिविधियों के रूप में पाठकों के आगे रखते गए।

कमलेश पाण्डेय
9868380502 

ईमानदारी - कमलेश पाण्डेय

कबीरा कहे....
ईमान से, ईमानदारी की खटिया अभी नब्बे डिग्री तक नहीं खड़ी हुई.

साधो! कुछ दिन हुए ईमानदारी कुछ इस तरह् चर्चा में आई कि लगा ये चर्चा तो पूरी ईमानदारी से हो रही है. पूरे देश में ईमान का डोलता पेंडुलम रुक नहीं गया तो कुछ सहमा-सहमा डोलता नज़र आया. ईमान का एक स्तूप सा उभर आया बेईमानी के जंगल में और उसकी एक अदद प्रतिकृति हर गली कूचे में चमकने लगी. ईमान के भिक्षु ‘हा हंते-हा हंते’ चिल्लाते घूमने लगे. उनके चहरे के तेज़ के आगे हर शै काली दिखने लगी.

उधर खुद ईमान पर इतनी उंगलियाँ उठीं कि बगलें शरीर में जहां भी थीं झाँक-झाँक कर देखी जाने लगीं. ईमान का सिक्का खरा-खरा सा चमकने लगा. खोटे सिक्के सेफों में छुपा दिए गए. सारी बिल्लियाँ हज की दिशा में हसरत से यूं देखने लगीं मानों वीज़ा-पासपोर्ट की व्यवस्था होते ही निकल पड़ेंगी क्योंकि सत्तर चूहे तो हर बिल्ली अपने पूरे करियर में खा ही लेती है. अपना-अपना ईमान अंटी में दबाये हर खासो-आम खुले में आ गया और उसे मैडल की तरह प्रदर्शित करने लगा. ईमानदारी का एक मजमा- सा लग गया. देखते-देखते ईमानदारी आम हो चली.

ईमानदारी सर चढ़ कर बोलने लगी. ज़ुबानों पर थिरकने लगी. स्क्रीनों पर चमकने लगी. सडकों पर लेट गई. धरने पर बैठ गयी. तीन का तेरह वसूलने वाले ऑटो-रिक्शा की पीठ पर चिपक गयी. ईमानदारी बिजली के तारों में करंट-सी दौड़ी, पानी की  पाईपों से बूँद-बूंद रिसी. वह ट्रैफिक हवलदार के चालान-बुक पर स्याही की बूँद-सी टपकी, दंगा-पुलिस के जिरह-बख्तर के अन्दर पसीने-सी चुह्चुहाई. वो बाबुओं की लपलपाती उँगलियों पर नन्हे-नन्हें कैमरों का डंक मारने लगी. वो निराश लोमड़ी के खट्टे अंगूरों में मिठास का भ्रम भरती नज़र आई. उम्मीद की लहरों पर बैठ वो राजधानी में खूब लहराई.

फिर ईमानदारी एक रोज़ गद्दी पर जा बैठी. वो राजमहल में टहली. जनपथ और राजपथ पर भी सुगबुगाई. फिर एक आबंटित सरकारी बंगले के गेट पर रास्ता रोके नज़र आई. आगे वो घर-घर में घुसी, झोंपड़- पट्टियों में रुकी, देर रात छापे मारती मिली. सेक्रेटेरियेट की फाइलों से जूझी, जांचों में उलझी. कभी घबराई और भीड़ से बचकर भागती नज़र आई. बयान-दर बयान दिए, बहसों में अझुराई, कभी अड़ गई तो कभी कतरा के निकल आई. इलज़ाम उठाये, इलज़ाम लगाए, बेईमानी के पैतरें खुद भी आजमाए.

कुछ दिन हुए ईमानदारी ज़मीन छोड़ कर वृहतर आसमानों की ओर निकल भागी.

कबीरा कहे- ईमान सेईमानदारी तो दिलों में होती है- टोपी या गद्दी में नहीं. सच मानों तो सच, नहीं तो ठिठोली है.


बुरा न मानो होली है.