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याँ से वाँ तक पूरी की पूरी ज़मीन - नवीन

याँ से वाँ तक पूरी की पूरी ज़मीन
ग़म-गजाले की है कस्तूरी ज़मीन
आदमीयत के हरिक बाज़ार में
वक़्त है दूकान दस्तूरी ज़मीन
हर बरस जिस की उजड़ जाती है माँग
ऐसी दुलहन की है मज़बूरी ज़मीन
ताकि बच्चे बोझ मत समझें उसे
माफ़ कर देती है मज़दूरी ज़मीन
आरती का ध्यान धर कर देखिये
क्या महक उठती है कर्पूरी ज़मीन
जैसे ही अम्बर उड़ाता है गुलाल
बाँटने लगती है अड़्गूरी ज़मीन
पाँव तक रखने न दे यम को ‘नवीन’
जिद पे आ जाये जो सिन्दूरी ज़मीन

बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलुन ,
2122 2122 212
नवीन सी चतुर्वेदी


वो भली थी, या बुरी, अच्छी लगी - दानिश भारती

वो भली थी, या बुरी, अच्छी लगी
ज़िन्दगी, जैसी मिली, अच्छी लगी

बोझ दिल का, घुल के सारा, बह गया 
आंसुओं की वो नदी अच्छी लगी

चांदनी का लुत्फ़ भी तब मिल सका
जब चमकती धूप भी अच्छी लगी

जाग उट्ठी ख़ुद से मिलने की लगन
आज अपनी बेखुदी अच्छी लगी

सबको, सब कुछ तो कभी मिलता नहीं 
इसलिए थोड़ी कमी अच्छी लगी 

दोस्तों की बेनियाज़ी देख कर
दुश्मनों की बेरुखी अच्छी लगी

आ गया अब जूझना हालात से
वक़्त की पेचीदगी अच्छी लगी

ज़हन में 'दानिश' उजाला छा गया
इल्मो-फ़न की रोशनी अच्छी लगी


:- दानिश भारती

बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 212

बह रही है इस सलीक़े से हवा - नवीन

बह रही है इस सलीक़े से हवा
एक भी पत्ता नहीं अलसा रहा

शेर की कुर्सी बिल-आख़िर छिन गयी
पेड़ पे चढ़ना ही सब कुछ हो गया

फ़िक्र करते ही नहीं उड़ते परिन्द
चोंच से कुछ गिर गया तो गिर गया

धान की नस्लें उठा कर देख लो
फ़स्ल ने हर बूँद को लौटा दिया

परबतों को थोड़े ही मालूम है
कौन झरना किस नदी में जा मिला

जब दरख़्तों की जड़ें तक जल गईं
घास का मैदान क्या बचता भला

कल ही पिंजड़े से छुड़ाया था जिसे
वो कबूतर भी ज़मीं पर आ गिरा 


बहरे रमल मुसद्दस महजूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलुन 
2122 2122 212

रोज़ ही करती हैं एलानेसहर - नवीन

रोज़ ही करती हैं ऐलाने-सहर
ओस की बूँदें मुलायम घास पर

रात भर टूटे थे इतने कण्ठ-हार
सुब्ह तक पत्तों से झरते हैं गुहर

बस ज़रा अलसाई थीं कोमल कली
बाग़ में घुस आये बौराये-भ्रमर

भोर की शीतल-पवन अलसा चुकी
धूप से चमकेगा अब सारा नगर

इस का इस्तेमाल कर लीजे हुजूर
धूप को तो होना ही है दर-ब-दर

वाह री सीली दुपहरी की हवा
जैसे मिलने आ रहे हों हिम-शिखर 

इक सितारा आसमाँ से गिर पड़ा
चाँद को ये भी नहीं आया नज़र

बाग़ तो ढेरों हैं मेरे शह्र में
बस वहाँ पञ्छी नहीं आते नज़र


सोचता हूँ देख कर ऊँचा गगन
एक दिन जाना है वाँ सब छोड़ कर

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे रमल मुसद्दस महजूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलुन 
2122 2122 212

दर्द के हाथों में परचम आ गया - नवीन

दर्द के हाथों में परचम आ गया
बात में लहजा मुलायम आ गया

क्या करिश्मे हो रहे हैं आज कल
आप को आवाज़ दी, ग़म आ गया

हम ने समझा प्यार बरसायेगा प्यार
अश्क़ बरसाने का मौसम आ गया

चार दिन तक ही रही दिल में बहार
फिर उजड़ जाने का मौसम आ गया

आज नज़राने की थी उस से उमीद
भर के वो आँखों में शबनम आ गया

चल, नई धुन छेड़ कर आलाप लें
ज़िन्दगी की ताल में सम आ गया

शाम को तो तैश मत खाएँ 'नवीन'
सूर्य भी पूरब से पच्छम आ गया

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

सोचता रहता हूँ उसको देखकर - आलम खुर्शीद

आलम खुर्शीद
ज़िन्दगी में अब तक न जाने कितने सारे 'अच्छे' रचनाधर्मी मिले हैं पर याद करने बैठूँ तो सहसा याद नहीं आते। इसीलिए अपने ब्लॉग पर वातायन के अंतर्गत ऐसे ख़ास रचनाधर्मियों को सहेजना शुरू किया है ताकि आप सभी के साथ मैं भी जब चाहूँ अलबम की तरह समय-समय पर गुजरे लमहात का आनंद ले सकूँ। आइये एक मतला पढ़ते हैं :-

देख रहा है दरिया भी हैरानी से।
हमने पार किया कितनी आसानी से।।

ये मतला पढ़ते ही मैं मुरीद हो गया था इस दौर के एक अज़ीम शायर मुहतरम आलम खुर्शीद साहब का। देश-विदेश में छपने वाले इस शायर की

अजनबी हरगिज़ न थे हम शहर में - नवीन

अजनबी हरगिज़ न थे हम शहर में। 
वक़्त ने कुछ देर से जाना हमें।। 

उलझनों से वासता तक था नहीं। 
क्या मज़े थे माँ तुम्हारी गोद में।। 

चाशनी हो जिस की बातों में हुज़ूर। 
वो ही पाता है जगह बाज़ार में।। 

अब हिफ़ाज़त का हुनर सिखलाएँगी। 
मछलियाँ जो फँस न पायीं जाल में।।

मैं ने ही धक्का दिया होगा मुझे। 
तीसरा था ही न कोई रेस  में।। 

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे रमल मुसद्दस महजूफ
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलुन

2122 2122 212

पहले तो इज़हार टाला जायेगा - नवीन

पहले तो इज़हार  टाला जायेगा 
फिर बहानों को खँगाला जायेगा।१।

चैन लूटा, दिल भी घायल कर दिया।
और क्या अब दम निकाला जायेगा।२।

रो रहे हो क्यों, तुम्हें बोला तो था।
आँख से काजल निकाला जायेगा।३।

हम भला इन मुश्किलों से क्यों डरें।
जैसे भी होगा सँभाला जायेगा।४। 

मूँद कर आँखें करो रब दा ख़याल।
नाभि तक उस का उजाला जायेगा।५।

काश अगली बार कुछ इंसाफ़ हो।
अब के बस मुद्दा उछाला जायेगा।६।

कर्ज़ के बिन कुछ भी हो पाता नहीं ।
क्या वतन ऐसे सँभाला जायेगा।७।

तुमसे गर सँभले नहीं तो छोड़ दो ।
जैसे भी होगा सँभाला जायेगा  ।८।

बहरे रमल मुसद्दस महजूफ
फ़ाएलातुन  फ़ाएलातुन  फ़ाएलुन  

२१२२ २१२२ २१२

चार ग़ज़लें - नरहरि अमरोहवी

[१]

क़ब्र के सिरहाने आशिक टूट कर रोया कोई
ढूँढिये मोती वहाँ मिल जाएगा यक़ता कोई

अब नहीं मुमकिन यहाँ ठंडी हवा के वास्ते
साँस लेने को खुले खिड़की या दरवाज़ा कोई

क्यूँ हुई बच्चों से नादानी न पूछ - नवीन

मुश्किलें मत पूछ, आसानी न पूछ।
है बड़ा, तो बात बचकानी न पूछ ।१।

याद कर अपने लड़कपन के भी दिन।
  क्यूँ हुई बच्चों से नादानी न पूछ।२।


भेड़िया क्या जाने इंसानी रिवाज़|
धूर्त से तहज़ीब के मानी न पूछ।३।

जो मुक़द्दर ने दिया कर ले कुबूल।
कर्ण! कुंती की परेशानी न पूछ ।४।

था फ़िदा जिस पर गुलाबों का मुरीद।
कौन थी वो श़क्ल नूरानी न पूछ।५।

बोलना आता तो क्यूँ होता हलाल।
बेज़ुबाँ से वज़्हेक़ुरबानी न पूछ।६।

रोशनी से गर तुझे परहेज़ है|
फिर सरंजामेनिगहबानी न पूछ।७।

मछलियों के हक़ में बगुलों की जमात।
किस कदर है सबको हैरानी न पूछ।८।

हाथ कंगन आरसी मौज़ूद है।
अब तो कोई बात बेमानी न पूछ।९।


बहरे रमल मुसद्दस महजूफ
फाएलातुन फाएलातुन फाएलुन
२१२२ २१२२ २१२