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निरूप घनाक्षरी छन्द - अनीता सिंह तोमर 'अनी

 

रास हो मन भावन, प्यारी है ऋतु सावन
कृष्ण संग नाच रहीं, प्यारी राधा रानी।

छवि लगती है न्यारी, रास रचते बिहारी
मोहित हैं गोपी सारी, कान्हा की दीवानी।

राम जी की पहली पसन्द हनुमान हैं - नवीन

भगतों के लिये यदि राम जी कँवल हैं तो, 
राम जी के लिये मकरन्द हनुमान हैं। 

भगतों के लिये यदि राम जी समुद्र हैं तो, 
राम जी के लिये तटबन्ध हनुमान हैं। 

अखिल जगत जो कि राम जी की बगिया है, 
उस की सुहावनी सुगन्ध हनुमान हैं। 

भगतों की पहली पसन्द भले राम जी हों, 
राम जी की पहली पसन्द हनुमान हैं॥ 

*

संग-दिल सुरसा का हृदय बदल डाला  
सचमुच में हुनरमंद हनुमान हैं। 

राम जी का नाम जन-जन तक पहुँचाया,
सूरज हैं राम जी तो चंद हनुमान हैं। 

राम जी की आन हेतु जान पर खेल गये,
नयनों के तारे फरजंद हनुमान हैं। 

सिर्फ़ राम जी की नहीं सिर्फ़ जानकी की नहीं,
दौनों की ही पहली पसन्द हनुमान हैं॥ 

*

राम-राम-राम   बस   राम-राम, राम-राम,
जिस में लिखा है वो निबन्ध हनुमान हैं। 

भगतों के लिये यदि राम जी प्रबन्ध हैं तो, 
राम जी के लिये अनुबन्ध हनुमान हैं। 

सुर लय ताल संग अंग-अंग में समाये,
शब्द-शब्द राम छन्द-छन्द हनुमान हैं। 

यों तो राम जी को सारा जग है पसन्द किन्तु,
उस में भी पहली-पसन्द हनुमान हैं॥

नवीन सी• चतुर्वेदी


घनाक्षरी छन्द

छन्द - मोहनान्शु रचित

मोहनान्शु रचित

बूझ-बूझ उत्तर जो हुआ मैं निरुत्तर तो
देख मेरे हाल को पहेली हँसने लगी

झुमका पहिन कान, सुरमा लगा के नैन
जैसे कोई दुल्हन नवेली हँसने लगी

भाग्य की रेखा में तुझे ढूँढ-ढूँढ थक गया
व्यंग्य कर मुझ पे हथेली हँसने लगी

बम-बम भोले सङ्ग जैसे ही गूँजी अजान
ऐसा लगा जैसे कि बरेली हँसने लगी

छन्द – सागर त्रिपाठी

छन्द – सागर त्रिपाठी


चाह नहीं दधि-माखन की
तट-तीर कदम्ब की डार न चाहूँ

स्वाति की बूँद से तुष्टि मुझे
शिव-भाल से गङ्ग की धार न चाहूँ

पेट की भूख को अन्न मिले
धन का मैं अपार बखार न चाहूँ

पाँव पखारि सकूँ हरि के
बड़ दूजो कोऊ उपकार न चाहूँ
मत्त-गयन्द सवैया
सात भगण + दो गुरू 



सखियों से खेल हारी कर अठखेल हारी
दिल से कन्हाई की मिताई नहीं जायेगी

मन है अधीर ऐसे मीन बिनु नीर जैसे
बात, बैरी-जग को बताई नहीं जायेगी

कहने को लाख कहे, साँवरा जो हाथ गहे
राधा से कलाई तो छुड़ाई नहीं जायेगी

अधरों की लाली राधा तुम ने छुपा ली माना
रङ्गत कपोलों की छिपाई नहीं जायेगी
घनाक्षरी छन्द 
8, 8, 8, 7 वर्ण

चार घनाक्षरी छन्द - नवीन

तन की दूकान देखी, धन की दूकान देखी
वस्त्र और आभूषण शामिल व्यापार में

फल–फूल, दही–दूध, मेवा, तरकारी, तेल
राग-रङ्ग हाज़िर हैं विविध आकार में

रक्त बिके, बीज बिके, मानव के अङ्ग बिकें
माटी – पानी – हवा बिके सील पैक ज़ार में

सिर्फ़ एक चीज़ यह मानव न बेच पाया
अम्मा की दुआएँ नहीं मिलतीं बाज़ार में



दादा-दादी सङ्ग खूब खेलते थे खेल और
नानी-नाना सङ्ग हम गप्पें भी लड़ाते थे

पास के ही नहीं दूर दूर के भी रिश्तेदार
हर तहवार पर बोहनी कराते थे

सच जानिये हमारी छोटी-छोटी ख़ुशियों पे
पास औ पड़ौस वाले फूले न समाते थे

हाँ मगर एक और बात है कि यही लोग
भूल करने पे हमें डाँट भी लगाते थे



डाँटने के बाद वाला प्यार मिलता हो जिसे
वही जानता है प्यार कैसे किया जाता है

सूई में धागा पिरो के फूलों को बनाते हुये
प्यार का रूमाल हौले-हौले सिया जाता है

हृदय की बावड़ी से थोड़ा-थोड़ा खींच कर
प्यार का अमृत हौले-हौले पिया जाता है

सौ बातों की एक बात यूँ समझ लें 'नवीन'
प्यार पाना हो तो विष-पान किया जाता है



विष का वमन कभी कीजिये नहीं जनाब
कीजिये तो अमृत की धार भी बहाइये

अमृत बहाना यदि सम्भव न हो सके तो
प्यार के दो मीठे-मीठे बोल ही सुनाइये

प्यार के दो मीठे बोल भी न बोल पाओ यदि
मुस्कुराते हुये दिलों में जगह पाइये

ये भी जो न हो सके तो ऐसा कीजिये ‘नवीन
जा के किसी दरपन से लिपट जाइये 


नवीन सी. चतुर्वेदी

आज सपने में सेज साँवरौ मिल्यौ री मोहि - बिहारी [बिहारी सतसई वाले नहीं]

बिहारी [बिहारी सतसई वाले नहीं]

आज सपने में सेज साँवरौ मिल्यौ री मोहि
लीन्ही अङ्क आनि, सबै कानि-कुल गई री

मोहन मुदित मो सों मन की करन लाग्यौ
मदन-मनोरथ पै मैं हू तुल गई री

क़हत बिहारी जो थी होनी, सो न होन पाई
का कहों कैसें कहों री बुद्धि डुल गई री

अङ्ग खुल गये, रति-रङ्ग खुल गये, नीबी –
बन्ध खुल गये, तौ लौं आँख खुल गई री 

हवा चिरचिरावै है, ब्योम आग बरसावै - नवीन

हवा चिरचिरावै है, ब्योम आग बरसावै,
जल हू जरावै - जान - इन सों बचाय दै

केवड़ा, गुलाब और चन्दन की लाग दै कें
खिरकी झरोखन में खस लगवाय दै

आगरे कौ पेठौ लाय ल्होरे टुकड़ा कराय
बर्फ सङ्ग ताहि कोरे कुल्ला में धराय दै

एक उपकार और कर दै 'नवीन' प्यारे
अपनी बगल नेंक परें सरकाय दै

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

जन्म के समय से ही नाजुक व नर्म-जान - नवीन

बड़ी मस्ती से जीता है, दिलों पे राज करता है
मसर्रत बाँटने वाले के दिल में ग़म नहीं होता
बुजुर्गों की नसीहत आज़ भी सौ फ़ीसदी सच है
मुहब्बत का ख़ज़ाना बाँटने से कम नहीं होता

सभा में शोर था - तहज़ीब को आख़िर हुआ है क्या
जहाँ भी जाओ बेशर्मी हमारा मुँह चिढाती है
तभी सब लड़कियों ने एक सुर में उठ के यूँ बोला
कि जो इनसान होते हैं उन्हीं को शर्म आती है

सादगी होती है मङ्गलसूत्र में
बन्दगी होती है मंगलसूत्र में
हर सुहागिन का यही कहना है बस
ज़िन्दगी होती है मङ्गलसूत्र में


जन्म के समय से ही नाजुक व नर्म-जान
सख़्त-जान दुनिया में ख़ामुशी के साथ है
दादा, नाना, पापा, भैया, अंकलों की लाड़ली ये
अगम अनादि काल से सभी के साथ है
सुनिये ‘नवीन’ मित्र प्रीत-रीत सहचरी
ख़ुशियों की धारा, ग़म की नदी के साथ है
अपनी हथेलियों में दुनिया समेटे हुये
आसमान वाली परी धरती के साथ है

नारी नर से यूँ बोली सुनें मेरे हमजोली
तन को नहीं तनिक मन को झुकाइये
हमने हमेशा आप की ख़ुशी को मान दिया
आप भी हमारे सङ्ग-सङ्ग मुस्कुराइये
नारी का हृदय तो है लबालब भरा हुआ -
अमृत कलश जब चाहे छलकाइये
यानि कि ‘नवीन’ शुद्ध-शास्वत सनेह-रस
बूँद भर डाल कर घूँट भर पाइये

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तन की मटुकिया में मन की मथनिया से
प्रीत नवनीत हेतु बतियाँ बिलो गया
प्यारी प्यारी बातें बोल ऐसा किया डाँवाडोल
पता ही नहीं चला कि दिल कब खो गया
रङ्ग नहीं पानी नहीं हाथ भी लगाया नहीं
फिर भी ‘नवीन’ अङ्ग-अङ्ग को भिगो गया
मेरी स्नेह सरिता में मुझी को ढकेल कर
ख़ुद तो उबर गया मुझ को डुबो गया

नवीन सी. चतुर्वेदी

होली का ये लाल रंग - ब्रजेन्द्र अकिंचन

होली का ये लाल रंग लहू है किसी का याकि
द्वेष-सूर्य का ही उग्र बिखरा उजाला है

सूर्ख-पीत छाया हुआ नेह-शौर्य ही है याकि
क्रोध रश्मि-पुंज शिव नेत्र ने निकाला है

प्यार का ही बिखरा है रंग दिशा-विदिशा या
मंत्र- मोहिनी का जादू विधना ने डाला है

जाने अनजाने याकि प्रेम का प्रभूत पात्र
प्रेम रंग सराबोर विधि ने उछाला है ।

होली के छंद, ग़ज़ल, नज़्म - नवीन

सभी साहित्य रसिकों का पुन: सादर अभिवादन और होली की शुभकामनाएँ

मन मलङ्ग, हुलसै हिया, दूर होंय दुख-दर्द|
सावन तिरिया झूमती, फागुन फडकै मर्द|

कहे सुने का बुरा न मानो ये होली का महीना है

पर्वों के गुलिस्तान "हिन्दुस्तान" में हर दिन कोई न कोई पर्व मनता ही रहता है| फिलहाल होली के पर्व ने माहौल को रंगीन बनाया हुआ है| पिछली बार की तरह इस बार भी होली के कुछ नये-पुराने रंगों [दोहे, कवित्त, सवैया, ग़ज़ल, नज़्म] के साथ आपके सामने उपस्थित हूँ|

नोक-झोङ्क भरी बातचीत – 1 [दोहे]

नायक:-
नीले, पीले, बेञ्जनी; हरे, गुलाबी लाल|
इन्द्र-धनुष के बाप हैं, गोरी तेरे गाल||

नायिका:-
रङ्गों की परवा न कर, देख दिलों दे हाल|
मैं भी लालम लाल हूँ, तू भी लालम लाल||

नायक:-
होली का त्यौहार है, कर न इसे बेरङ्ग|
साफ़ी को कस के पकड़, आ छनवा ले भङ्ग||

नायिका:-
होली के त्यौहार का, जमा हुआ है रङ्ग|
छन आएगी बाद में, घुट तो जाए भङ्ग||


नोक झोंक भरी बातचीत - २

नायक:-
गोरे गोरे गालन पे मलिहों गुलाल लाल,
कोरन में सजनी अबीर भर डारिहों|

सारी रँग दैहों सारी, मार पिचकारी, प्यारी,
अङ्ग-अङ्ग रँग जाय, ऐसें पिचकारिहों|

अँगिया, चुनर, नीबी, सुपरि भिगोय डारों,
जो तू रूठ जैहै, हौलें-हौलें पुचकारिहों|

अब कें फगुनवा में कहें दैहों छाती ठोक,
राज़ी सों नहीं तौ जोरदारी कर डारिहों||
[घनाक्षरी]

नायिका [अ]:-
फूले फूले गाल मेरे पिचकाय डारे और
अङ्गन में रङ्गन की जङ्ग सी लगाय दई

अँगिया कों छोड़ तू तौ सारी हू न रँग पायौ
अच्छे-खासे जोबन की कुगत बनाय दई

बड़ी-बड़ी बातें करीं, सपने दिखाये ढेर
शेर जहाँ बिठानौ हो बकरी बिठाय दई

नेङ्क हाथ लगते ही फूट गयी पिचकारी
ख़ैर ही मनाय तेरी इज्ज़त बचाय दई
[घनाक्षरी]

नायिका [ब]:-
पिय गाल बजाबन बन्द करौ, अरु ढीली करौ हठधर्म की डोरी
ढप-ढ़ोल-मृदङ्ग बजाए घने, झनकाउ अबै हिय-झाँझर मोरी
अधरामृत रङ्गन सों लबरेज़ तकौ तौ कबू यै निगाह निगोरी
इक फाग की राह कहा तकनी, तुमें बारहों मास खिलावहुं होरी
[सुन्दरी सवैया]


साँवरे ने होरी में बावरी सी कर डारी

नैनन सों बात कही चितचोर छलिया नें,
मुसकाय, उकसाय - बोल कें - सुकुमारी|
कमल-गुलाबन सी उपमा दईं तमाम,
माखन-मिसरी-मीठी-मादक-मनोहारी|
होरी कौ निमंत्रण पठायौ ललिता के संग,
खोर साँकरी गई इकल्ली, मो मती मारी|
देख कें अकेली मोय, प्रेम रंग में डुबोय,
साँवरे ने होरी में बावरी सी कर डारी||
[कवित्त]

साँची ही सुनी है बीर महिमा महन्तन की

इत कूँ बसन्त बीत्यौ, उत कूँ बौरायौ कन्त
सन्त भूल्यौ सन्तई कूँ मन्तर पढ्यौ भारी

पाय कें इकन्त मो सूँ बोल्यौ रति-कन्त कीट
खूब है गढ़न्त तेरे अङ्गन की हो प्यारी

तदनन्तर ह्वै गयौ मतिवन्त – रति वन्त
करि कें अनन्त यत्न बावरी कर डारी

साँची ही सुनी है बीर महिमा महन्तन की
साल भर ब्रह्मचारी, फागुन में लाचारी
[कवित्त]

लट्ठ खाय गोरिन सों घर लौट आमें हैं

महीना पच्चीस दिन दूध-घी उड़ामें और  
जाय कें अखाडें दण्ड-बैठक लगामें हैं|
 
मूछन पे ताव दै कें जङ्घन पे ताल दै कें
नुक्कड़-अथाँइन पे गाल हू बजामें हैं|
 
पिछले बरस बारौ बदलौ चुकामनौ है,
पूछ मत कैसी-कैसी योजना बनामें हैं|
 
लेकिन बिचारे बीर बरसाने पौंचते ही,
लट्ठ खाय गोरिन सों घर लौट आमें हैं||
[घनाक्षरी]

ग़ज़ल

सुस्त है कानून, कारिन्दे शरारत कर रहे हैं
सो रहा है आदमी बच्चे शरारत कर रहे हैं

कल अचानक नींद जो टूटी तो मैं क्या देखता हूँ
चाँद की शह पर कई तारे शरारत कर रहे हैं

वासता है आप को उस रात का अब आ भी जाओ
आज़ फिर उस रात के लमहे शरारत कर रहे हैं

ख़ुद ही बुलवाते हैं, और फिर पूछते हैं आये क्यूँ
आप को हम ही मिले? हमसे शरारत कर रहे हैं !!!

रस्सियाँ बल खा रही हैं उस का चर्चा तक नहीं है
शह्र भर में है ख़बर, खूँटे शरारत कर रहे हैं

रङ्गो-ख़ुशबू के लिये ही आदमी सहता है काँटे
जानते हैं ये, तभी, साले - शरारत कर रहे हैं

नर्क वाले भी इन्हें घुसने नहिन देंगे नरक में
बच्चियों के साथ जो बुड्ढे शरारत कर रहे हैं

सारा जन-जीवन शरारत की इबादत कर रहा है
डालियाँ-भँवरे, हवा-पत्ते शरारत कर रहे हैं

कम नहीं हैं आप भी, पल में बदल देते हैं सब कुछ
आप भी इन्सान से डट के शरारत कर रहे हैं

हमने हर मुश्किल को जब नज़दीक से देखा तो पाया
पायजामे चुस्त हैं, नाड़े शरारत कर रहे हैं



कविता / नज़्म
[लाला लला ललाला X 2]

चूनर पे तक चकत्ता, इत्ता बड़ा गुलाबी
कहने लगीं सहेली, वो कौन था? गुलाबी

कैसे बताए सब को, थी सोच में गुलब्बो
नज़रें चुरा के बोली, कुछ लोच में गुलब्बो

होली का पर्व है सो, पुतवा रही थी घर को
मिस्टर ने थामी कूची, मैंने गहा कलर को

दीवार पुत चुकी थी, दरवाज़ा रँग रहे थे
ठीक उस के पीछे सखियो, कुछ वस्त्र टँग रहे थे

मिस्टर तपाक बोले, इन को हटा दो खानम
मैंने कहा सुनो जी, तुम ही हटा दो जानम

कुछ और तुम न समझो, मैं ही तुम्हें बता दूँ
मैं समझी वो हटा दें, वो समझे मैं हटा दूँ

दौनों खड़े रहे थे, जिद पे अड़े रहे थे
दौनों की जिद के चलते, कपड़े पड़े रहे थे

आगे की बात भी अब, तुम सब को मैं बता दूँ
दौनों ने फिर ये सोचा, चल मैं ही अब हटा दूँ

वाँ हाथ उठाया उन ने, इत मैं भी मुड़ चुकी थी
कब जाने सरकी चुनरी, शानों पे जो रुकी थी

फिर जो बना है बानक, कैसे बताऊँ तुमको
शब्दों से सीन सारा, कैसे दिखाऊँ तुमको

हेमन्त ने अचानक, बहका दिया था हमको
कुछ ग्रीष्म ने भी सखियो, दहका दिया था हमको

बरसात की घटा ने, दिखलाया रङ्ग ऐसा
कुछ था वसन्त जैसा, और कुछ शरद के जैसा

कर याद फिर शिशिर को, दौनों हुए शराबी
इस वास्ते चकत्ता - चूनर पे है गुलाबी
इस वास्ते चकत्ता - चूनर पे है गुलाबी
इस वास्ते चकत्ता - चूनर पे है गुलाबी


हजल [रेख़ती टच के साथ]

घड़ी में याँ ठुमकता है घड़ी में वाँ मटकता है
मेरा महबूब है या कोई बे-पैंदे का लोटा है  

वो हाथी है तो है, पर उस का चेहरा चाँद जैसा है
वो जब साहिल पे चलता है, समन्दर भी उछलता है 

बहुत सम्मान देता है उसूलों को मेरा बलमा
मुहूरत शोध कर ही वो मेरे नज़दीक आता है  

बहुत ही ध्यान रखता है सफ़ाई का मेरा चिरकुट 
मुझे मिलने से पहले वो पसीने से नहाता है  

उसे लगता है बस उल्लू पे ही आती हैं लक्ष्मी-माँ
बस इस कारन से ही वो बावला 'उल्लू का पट्ठा' है


मत्तगयन्द सवैया छन्द

छुट्टन से छमिया ने कहा छिटके मत छोकरे नैन लड़ा ले
फूल सजा गजरे में गुलाब का इत्र लगा कर मूड बना ले
नौकरिया ने शरीर में जङ्ग लगा दई है तो उपाय करा ले
चङ्ग बजाय के रङ्ग उड़ाय के भङ्ग चढाय के जङ्ग छुड़ा ले


खुशियों का स्वागत करे, हर आँगन हर द्वार|

कुछ ऐसा हो इस बरस, होली का त्यौहार||