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व्यंग्य दऊआ पहलवान गली - आलोक पुराणिक

व्यंग्य

दऊआ पहलवान गली - आलोक पुराणिक

भद्र नाम था उस सड़क का -विद्यानिधि सर्वनाथ चंद्रालंकार मार्ग। पर सब उसे दऊआ पहलवान गली के नाम से ही जानते थे। दऊआ पहलवान स्थानीय गुंडे थे एक जमाने में, उनका नाम लेकर उस गली के शरीफ बाशिंदे पुलिस को डराते थे और नवोदित गुंडे दूसरे मुहल्ले के गुंडों को डराते थे। गली का आधिकारिक नाम यद्यपि चंद्रालंकारजी के नाम पर था, पर जन-जन में प्रसिद्धि दऊआ पहलवान की थी। गली उनके नाम पर चल रही थी। चंद्रालंकारजी के बहुत पढ़े-लिखे परिजन दऊआ पहलवान के खिलाफ भुनभुनाते हुए पाये जाते थे। पर भुनभुनाने से कुछ होता तो, तो बहुत कुछ गली में क्या, इस देश में ही हो गया होता।

मुझे समय़ में आया कि आधिकारिक तौर पर चाहे जो कर दो, होता वही है, जो दऊआ पहलवान की मर्जी होती है। गली की बात करो, तो बात देश तक पहुंच जाती है। क्षमा करें,  गली-चौराहों के नाम पर लौटें। मेरे शहर में एक चौराहे का आधिकारिक नाम कारगिल में शहीद हुए कैप्टन के नाम पर रखा गया है। जौली नामक बंदा इस चौराहे पर छोले बेचा करता है। जन-जन में यह चौराहा जौली छोले चौराहे के नाम से प्रसिद्ध है। कारगिल का शहीद क्या करे। पब्लिक छोले में ही जौली हुए जा रही है। मैंने उस इलाके के विधायक से शिकायत की। मैंने कहा कि एक अभियान चलाकर पब्लिक को जौली छोले के बजाय शहीद का नाम लेने को प्रेरित किया जाये। इस इलाके में आने-जाने वाले पत्रों में चौराहे का शहीद आधारित आधिकारिक नाम ही लिखा जाये।

विधायक महोदय अपने असर का इस्तेमाल करें इस मामले में, तो छोलों की जगह शहीद का सम्मान कायदे से हो जायेगा। विधायकजी ने आफ दि रिकार्ड मुझे बताया कि शहीद कैप्टन उनकी जाति के नहीं हैं। शहीद की जाति के वोट उन विधायक को कभी नहीं मिलते, तो वह क्यों इस मसले पर रुचि लें। जैसा नाम चल रहा है, चलने दें-जौली छोले चौराहा।

मुझे समझ में आया कि शहीद भले ही किसी जाति के मान लिये जायें, पर छोले को जातियों से ऊपर माना जाता है। भारतवर्ष में छोलों की अपील शहीद की अपील से ज्यादा है।  ये भी समझ आया कि जाति  के हितैषी विधायक ही स्वजातीय बंधु की रक्षा कर सकते हैं। वरना तो शहादत भी छोलों में घुलकर गायब हो जाती है।

एक और शहर में शहर की मुख्य सड़क का नाम रखा गया-गैंदामल घी वाला मार्ग।

गैंदामलजी कुख्यात थे मिलावट के लिए। पर इससे क्या होता है। स्वजातीय बंधुओं का नगरपालिका में बहुमत था, मार्ग गैंदामल का हुआ। बाद में एक भ्रष्ट ठेकेदार ने इस नाम की मर्यादा रखी। गैंदामल मार्ग के निर्माण में सीमेंट में रेत की विकट मिलावट की। गैंदामलजी की आत्मा को शांति मिली होगी।

मार्गों, गलियों के नामों में विकट घोटाले हैं। पर उससे क्या होता है। देश चलाने में कित्ते घोटाले हैं, पर देश चल रहा है ना। मेरा सुझाव ये है कि जाति, धर्म वगैरह के विवादों में सड़कों, गलियों के नाम ना फंसाये जायें। सीधे सिंपल नाम रखे जायें, जैसे आयुर्वेद से नाम उधार ले लिये जायें। किसी सड़क का नाम रखा जाये-आंवला मार्ग। किसी सड़क का नाम रख दिया जाये-त्रिफला रोड। किसी गली का नाम रख दिया जाये-हर्र-बहेड़ा गली। पर नहीं, नहीं, विवाद प्रिय इस देश में कोई आयुर्वैदाचार्य उठकर कहेंगे कि नहीं आंवला गली के ठीक साथ वाली गली  का नाम त्रिफला गली नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि मेरी सम्मति में आंवला के साथ त्रिफला का सेवन वर्जित है। कोई आयुर्वैदाचार्य यूं भी कह सकते हैं कि इस गली का नाम सुबह आंवला गली रखा जाये पर संध्या के बाद इस गली का नाम त्रिफला गली रहे, क्योंकि आंवले का सेवन सुबह ठीक रहता है और त्रिफला का सेवन संध्याकाल के बाद उचित परिणाम देता है। हाय हाय ।

छोड़िये, कई गली-मार्गों के नामों को दऊआ पहलवानों और छोलों के हवाले ही रखा जाये।


आलोक पुराणिक
मोबाइल-9810018799

व्यंग्य - कुछ फेयर और हैंडसम प्रश्नोत्तर - आलोक पुराणिक

सवाल-महिलाओं के लिए फेयर एंड लवली क्रीम थी पर पुरुषों के लिए फेयर एंड हैंडसम क्रीम आयी है। क्या पुरुषों को लवली नहीं होना चाहिए। उनका काम सिर्फ हैंडसम होने से चल जाता है क्यों।

जवाब- हैंडसम का मतलब है हैंड में सम यानी रकम, तब ही पुरुष का मामला जमता है। उनका काम सिर्फ लवली होने से नहीं चलता। वैसे अब तो महिलाओं का भी हैंडसम होना जरुरी है। सिर्फ लवली के बाजार भाव बहुत डाऊन हैं। हैंड में सम हो बंदे के तो कुछ और होने की जरुरत ही नहीं है। 

सवाल-जो पुरुष फेयर एंड हैंडसम नहीं लगाते, वे क्या हैंडसम नहीं होते।

जवाब-नहीं चुपके से लगाते होंगे। बताते नहीं है, क्या पता बाद में बतायें। जैसे बरसों तक अमिताभ बच्चन की शानदार एक्टिंग देख कर सब समझते रहे कि अमिताभजी की मेहनत-समर्पण इसके पीछे है। पर उन्होने अब जाकर बताया कि वो वाला तेल, ये वाली क्रीम, ये वाला कोल्ड ड्रिंक, वो वाला च्यवनप्राश इसके लिए जिम्मेदार हैं। असली बात लोग बाद में बताते हैं जी। चुपके-चुपके कई आइटम इस्तेमाल करके महान बन जाते हैं, बाद में जैसा मौका आता है, उस हिसाब से बताते रहते हैं कि वो वाली क्रीम, वो वाला पाऊडर उनके उत्थान के लिेए जिम्मेदार है। 

सवाल-पुरुष हैंडसम हो जाये, तो क्या होता है।

जवाब-बेटा क्लियर है, ज्यादा कन्याएं उसकी ओर आकर्षित होती हैं।
सवाल-क्या पुरुष के जीवन का एकमात्र लक्ष्य यही है कि कन्याएं उसकी ओर आकर्षित हों।

जवाब-नहीं इमरान हाशमी की तमाम फिल्में देखकर पता लगता है कि पुरुषों का लक्ष्य दूसरों की पत्नियों, विवाहिताओं को आकर्षित करना भी होता है।

सवाल-मैं अगर फेयर एंड हैंडसम लगाऊं और फिर भी सुंदरियां आकर्षित न हों, तो क्या मैं कंपनी पर दावा ठोंक सकता हूं।

जवाब-नहीं, तमाम इश्तिहारों के विश्लेषण से साफ होता है कि सुंदरियां सिर्फ क्रीम लगाने भर से आकर्षित नहीं होतीं। इसके लिए वह वाला टायर भी लगाना पड़ता है। इसके लिए वो वाली बीड़ी भी पीनी पड़ती है। इसके लिए वो वाली सिगरेट भी पीने पड़ती है। इसके लिए वो वाली खैनी भी खानी पड़ती है। इसके लिए वो वाला टूथपेस्ट भी यूज करना पड़ता है। इसके वो वाला कोल्ड ड्रिंक भी पीना पड़ता है। सुंदरियों को क्या इतना बेवकूफ समझा है कि सिर्फ क्रीम लगाने भर से आकर्षित हो जायेंगी।

सवाल-बंदा सुबह से शाम तक कोल्ड ड्रिंक, क्रीम, खैनी, बीड़ी में बिजी हो जायेगा, तो फिर वह और दूसरा काम क्या करेगा।

जवाब-हां,यह सब इश्तिहारों में नहीं बताया जाता कि सुंदरियों को आकर्षित करना पार्ट-टाइम नहीं फुल टाइम एक्टिविटी है। तमाम आइटमों के इश्तिहारवालों की इच्छा यह है कि बंदा  सिर्फ एक ही काम में लगा रहे,सुंदरियों को आकर्षित करने में।

सवाल-तमाम इश्तिहार पुरुषों से आह्वान करते हैं कि वे ये खरीद कर या वो खऱीद कर सुंदरियों को आकर्षित करें, पर सुंदरियों से यह आह्वान नहीं किया जाता कि वे ये वाला टायर खरीदकर या वो वाली सिगरेट पीकर या बीड़ी पीकर या टूथपेस्ट यूज करके पुरुषों को आकर्षित करें। इसका क्या मतलब है।

जवाब –इसका यह मतलब है कि इस देश की महिलाएं बहुत बिजी रहती हैं। सुबह परिवार के लिए खाना बनाकर नौकरी करने जाती हैं। फिर नौकरी से लौटकर बच्चों का होमवर्क कराकर खाना बनाती हैं। उन्हे फुरसत नहीं है कि फोकटी में फालतू में पुरुषों को आकर्षित करती बैठें। इस देश के पुरुष निहायत ठलुए हैं, सुबह से रात तक सिर्फ सुंदरियों को आकर्षित करने के काम में लगने में उन्हे कोई गुरेज नहीं होता।

इस लेख से हमें यह शिक्षा मिलती है कि इस देश की महिलाएं बहुत ही इंटेलीजेंट और कर्मठ हैं और पुरुष निहायत ही निठल्ले और बेवकूफ हैं।
      
आलोक पुराणिक

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व्यंग्य - अकबर का लिप-लाक – आलोक पुराणिक


इतिहास के पुनर्लेखन की जरुरत पड़नेवाली है। नयी पीढ़ी इतिहास को अपने तरीके से  गढ़ रही है, टीवी देखकर, टीवी सीरियलों के बारे में पढ़कर। दो टीन-एजर बालिकाओं की बात कुछ यूं सुनी-

वाऊ, अकबर, यू नो, जोधा से लिप-लाक करनेवाला है। सुपर्ब किस देखने को मिलेंगे।
रीयली, अकबर इस सो कूल ना।

अकबर, दि ग्रेट, ऐसा पुरानी पीढ़ी ने पढ़ा है । अकबर, दि कूल, यह नयी पीढ़ी समझ रही है। ग्रेट से बन्दा कूल हो जाता है, एक जनरेशन के फासले में। टीवी भी इस दौरान ग्रेट से कूल हो गया है। मेरी चिन्ताएँ दूसरी हैं, लिप-लाकवाले अकबर अगर हिट हो गये,  तो कोई सीरियल निर्माता सन्नी लियोनी को ला सकते हैं अकबर की किसी रानी के रुप में। सन्नीजी सिर्फ लिप पे ना रुकेंगी!!!!!!!!!!!!! अकबर के साथ ये क्या हो रहा है।

औरङ्गज़ेब पर कोई टीवी सीरियल बनाने में किसी की दिलचस्पी ना होगी, क्योंकि औरङ्गज़ेब को अपने पिता शाहजहाँ को आगरा के लाल किले में लाक करते हुए दिखाया जा सकता है। पर औरङ्गज़ेब का कैरेक्टर लिप-लाक दिखाने के लिए उपयुक्त नहीं है। लिप-लाक ना हो, सिंपल लाक हो, तो सीरियल के प्रमोशन में दिक्कत आती है। सीरियल का प्रमोशन ना हो पाये, तो फिर सीरियल बनाने का फायदा क्या। 

सीरियल क्या फिल्म बनाने का भी क्या फायदा।  के. आसिफ की शाहकार फिल्म मुगले आजम अगर आज बनी होती, तो सुपर-पर्सनल्टी के धनी अकबर पृथ्वीराज कपूर कामेडी नाइट्स विद कपिल के साथ मुगले आजम का प्रमोशन कर रहे होते। कपिल कहते -महाबली अकबर जरा वो वाला डायलाग तो बोलकर सुनाओ, पब्लिक को। और मधुबाला-प्यार किया तो डरना क्या-ये डांस गुत्थी या  चुटकी  के साथ करके दिखाइये ना। महाबली अकबर महाराणा प्रताप से जीतकर आते, पर कपिल की डिमांड के आगे हार जाते।

टीवी के आगे बड़े-बड़े महाबली लिप-लाक करने लगते हैं।

खैर मसला यह है कि अकबर के खाते में सुलहकुल, भाईचारा, फतेहपुर सीकरी भी है, पर ना ना ना ना सारा अकबर सिर्फ लिप-लाक पर फोकस हो रहा है। बल्कि जोधा अकबर सीरियल देखकर इतिहास समझने वाले बच्चों के मन में सवाल उठेगा, भई रानियों की पालिटिक्स में इतना टाइम खर्च करनेवाले अकबर को बाकी के काम के लिए टाइम कब मिलता होगा। कब तो उन्होने फतेहपुरसीकरी बनवायी होगी। कब उन्होने गुजरात फतह किया होगा। अकबर इस कदर बेगमों में बिजी रहते हैं, कैसे और क्या किया होगा। बच्चे कहीं ये ना समझें कि इतिहास जो लिखा गया है, वह सारा का सारा झूठ है। असल में तो अकबर बेगमों में ही बिजी रहते थे।

जोधा अकबर देखकर अकबर को कूल कहनेवाली बालिकाएं इतिहास की छात्राएं नहीं थीं, अकबर के पूरे योगदान को वह कैसे समझ पायेंगी, यह चिंता मुझे रहती है। पर चिंता करने से क्या होता है। टीवी जो दिखायेगा, उसके पार कुछ समझाना बहुतै मुश्किल हो  गया है।

इधर कई टीन-एजर समझने लगे हैं कि देश की हर समस्या का हल आमिर खान के पास है। आमिर खानजी बहुत मेहनत से सहज भाषा में तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने रख रहे हैं। पर आमिर खान समाजशास्त्री नहीं हैं। आमिर खान कूड़े के ढेर के संभावित प्रयोगों के विशेषज्ञ भी नहीं हैं। बच्चे उनसे ऐसी अपेक्षाएं पाल सकते हैं। हर समस्या का हल आमिर खान के पास नहीं है, ऐसा समझाना इन दिनों बहुत मुश्किल है। आमिर खान हर समस्या हल कर सकते हैं, ऐसी उम्मीद ठीक नहीं है। पर मेरे ठीक मानने या ना मानने से क्या होता है। टीवी को लगता है, तो ठीक ही है। एक टीवी चैनल में मैंने देखा कि भारत की रक्षात्मक तैयारियों पर एक पेनल-डिस्कशन में आमिर खान को  बुलाये जाने की बात चल रही थी। मैंने निवेदन किया-आमिर खान डिफेंस के एक्सपर्ट नहीं हैं। एक बंदे ने कहा-एक्सपर्ट तो वो कूड़े के भी नहीं थे, पर उस पर एक कार्यक्रम कर गये ना। कूड़ा कौन देखता है, आमिर खान को देखा जाता है।

उफ्फ अकबर को कौन देखता है, साहब, अकबर का लिप-लाक देखा जाता है। देखिये, देखिये और अकबर को उसके किस के लिए याद कीजिये।

आलोक पुराणिक
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माइक्रो सटायर - आलोक पुराणिक

पीएम मनमोहन सिंह ने दावा किया है कि एक हजार बार से ज्यादा वह पिछले दस सालों में बोले हैं।
उनके बोलने की रिकार्डिंग्स चेक की गयी हैं- 1100 बार वह कुल बोले। 
1000 बार तो वह यह बोल पाये-ओये कोई तो मेरी गल्ल सुण लो , ओय। 
बाकी 100 बार वह बोले-ओय मेरी बात समझ नीं आयी, कोई गल्ल नी, राहुलजी से पुछ्छ लेणा।

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गङ्गा साफ करने की परियोजनाओं में खरबों खाये गये। 
जमुना साफ करने की परियोजनाओं में अरबों खाये गये। 
कुछ-कुछ समझ में आता है कि गङ्गा-जमुनी कल्चर तमाम पालिटिकल पार्टियों को बहुतै प्रिय क्यों है।

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प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का विरोध करनेवालों को लोकसभा चुनाव के बाद पाकिस्तान जाना पड़ेगा, इस बयान से राबर्ट वाड्रा भी दहशत में आये, क्योकि वाड्रा के पूर्वज पाकिस्तान स्यालकोट से आये थे। 



राहुल गाँधी ने समझाया -जीजाजी ऐसा नहीं, जिसकी पास थोड़ी सी जमीन भी है इण्डिया में उसे इण्डियन माना जायेगा। 



राबर्ट वाड्रा के चेहरे पर मुस्कान लौट आयी है-जमीन तो जहाँ कहोगे, वहाँ दिखा दूँगा-कन्याकुमारी के समन्दर से लेकर एवरेस्ट तक की रजिस्ट्री अपने नाम है, द्वारिका गुजरात समन्दर की रजिस्ट्री से लेकर पूरे अरुणाचल की जमीन अपने कब्जे में दिखा सकता हूँ।



राहुल ने समझाया-ना थोड़ी जमीन ही बताना। अरुणाचल की जमीन तुम्हारे पास है, यह बात चीन को अगर पता लग गयी, तो वह भारत सरकार से नहीं तुमसे ही बात करने लगेगा, जमीन विवाद सुलझाने को।

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एक चुटकी सिन्दूर की कीमत तुम क्या जानो, रमेश बाबू। 



जानता हूँ, बहुत सही तरह से जानता हूँ, कोई एक चुटकी सिन्दूर भरकर अब तक 350 करोड़ रुपये कमा चुका है। और पिक्चर अभी बाकी है दोस्त। 



राजेश खन्ना का जमाना गया, अब राबर्ट वाड्रा का आ गया।

***

राबर्ट वाड्रा के घर में धन की देवी लक्ष्मीजी को माँ के तौर पर नहीं पूजा जाता। 
लक्ष्मीजी को सासू-माँ के तौर पर पूजा जाता है।

***

दिग्विजय सिंह ने पूछा
बताओ, बताओ,
राबर्ट वाड्रा ने कौन सा कानून तोड़ा। 
राबर्ट वाड्रा सुनकर हँस रहे हैं-
नानसेन्स, मैं खुद कानून हूँ, मुझे कौन तोड़ेगा।

***

कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि
सीबीआई ने गुजरात फर्जी एनकाउण्टर में मोदी को ढ़ंग से घेरे में नहीं लिया। 



लो, दस साल सरकार काङ्ग्रेस की रही,
सीबीआई से जरा सा काम ना करवा पाये।
राहुल गाँधी ने सिब्बल को डाँटा-
ऐसी ही बातों से तो यह आरोप पक्का होता है कि
काङ्ग्रेस सरकार दस सालों में कतई निकम्मी रही।

***

अखिलेश यादव ने कहा कि
चालू हैं भाजपा के लोग,
समाजवादी पार्टी के लोग चालू नहीं हैं। 
यह सुनकर अमर सिंह ने कहा है-
मेरी याद, मेरी कमी इतने दिनों बाद महसूस की।
चलो ठीक है,
पर अब मैं समाजवादी पार्टी के लिए कुछ ना करूँगा,
हारूँगा भी नही।
इस स्वार्थी दुनिया में किसी के लिए हारने से बेहतर है कि मैं खुद अपने लिए हारूँ।

***

लालू यादव के इस बयान पर कि नितीश कुमार को उन्होने ही पैदा किया है, नारायण दत्त तिवारी ने जोरदार बधाई दी है, लालूजी को यह कहते हुए कि अकेले हम ही नहीं हैं, जो बुढ़ापे में बाप बन रहे हैं।

***  


लालू यादव के इस बयान पर कि नितीश कुमार को उन्होने पैदा किया, सबसे ज्यादा विरोध उनके आठ बच्चों ने जताया है, यह कहते हुए कि पापा आठ बच्चों का ताना झेल-झेलकर ही पक गये, अब एक और जोड़ लिये हैं। राबड़ी देवी ने अलग डाँटा है-लालूजी कईसा बात करते हैं ऊ नितीशवा हमको मम्मी कहेगा, तो हमको कईसा फील होगा।

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मोदी की हवा नहीं चल रही है, यह बात तमाम न्यूज चैनलों पर तरह-तरह के विद्वानों ने दिन भर में करीब 40 बार कही। मोदी की हवा चल रही है, यह बात बीजेपी के प्रवक्ताओं ने न्यूज चैनलों पर कल सात बार कही। 
चालीस बार मोदी का नाम उधर से, सात बार मोदी का नाम इधर से। 
मोदी की हवा असल में बना कौन रहा है बे।

***

चुनाव के आगे बढ़ने पर काङ्ग्रेस ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ मनमोहन सिंह को उतारने की सोची है। नरेन्द्र मोदी के नमो फोन के मुकाबले ममो फोन उतारने का प्लान हुआ। इञ्जीनियरों ने फोन डिजाइन भी कर लिया है, बस एक प्राबलम नहीं निपट पा रही है। 



ममो फोन नार्मल तरीके से काम नहीं करता, इसमें साइलेण्ट मोड एक्टिव करो, तब ही फोन पर बात सम्भव हो पाती है। साइलेण्ट मोड पर ही एक्टिव, ये बात हर कस्टमर को समझाने में तो कई साल लग जायेंगे।



क्या किया जाये, इस सवाल के जवाब में मनमोहन सिंह साइलेण्ट मोड में चले गये हैं।

आलोक पुराणिक
9810018799