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एक तीर से कर लिये..हमने तीन शिकार - आदिक भारती

दो ही पल के दर्द में..हम हो गये निढाल
तू कैसे हँसता रहा..दुख में सालों-साल

जब विपदा की रैन में..छोड़ गये सब साथ
मुझको सहलाते रहे..जाने किसके हाथ

चादर से बाहर हुए..जब से अपने पाँव
कंधों-कंधों धूप है..घुटनों-घुटनों छाँव

कवि बनकर हासिल हुए..यश दौलत सत्कार
एक तीर से कर लिये..हमने तीन शिकार