Mohnanshu Rachit लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Mohnanshu Rachit लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

छन्द - मोहनान्शु रचित

मोहनान्शु रचित

बूझ-बूझ उत्तर जो हुआ मैं निरुत्तर तो
देख मेरे हाल को पहेली हँसने लगी

झुमका पहिन कान, सुरमा लगा के नैन
जैसे कोई दुल्हन नवेली हँसने लगी

भाग्य की रेखा में तुझे ढूँढ-ढूँढ थक गया
व्यंग्य कर मुझ पे हथेली हँसने लगी

बम-बम भोले सङ्ग जैसे ही गूँजी अजान
ऐसा लगा जैसे कि बरेली हँसने लगी

आज मन अतुकान्त है - मोहनांशु रचित

आज मन अतुकान्त है
दोहा और रोला की खीञ्चतान में
कुण्डली मार के बैठी हैं उमीदें

तुम्हारी यादों का मौसमी कुहासा
नज़्म की तरह
धीरे-धीरे
मुझे अपने आगोश मेँ ले रहा है

और मैं 

अमृत-ध्वनि छन्द की तरह
अपने ही तानेबाने में फँसा हुआ सा

जीवन के नवगीत में
पिङ्गल के नियमों की
व्यर्थ तलाश करता हुआ सा

तुम्हारे जूडे के लिये
दोहों के चार फूल चुनता हुआ सा
हूँ

ठीक उसी वक्त
तुम न जाने कहाँ से ले आती हो
तीन वल्लरियाँ
हाइकु की
अपने जूड़े मे गुँथवाने के लिए हमेशा की तरह

और अपने हाथों से
तुम्हारे जूड़े में
अपने लाये हुये फूल टाँकने की मेरी इच्छा
किसी क्लिष्ट गूढ पद के अर्थ की तरह
मुझे उलझा जाती है
फिर से

कभी-कभी लगता है
ज़िन्दगी की ग़ज़ल में
तुम मतला हो 
और 
मैं मक्ता
हमेशा एकसाथ
मगर मिलाप कभी नहीं

एकदूजे की ख़ैरियत के लिये भी
हम निर्भर हैं
कभी दल-बदलू काफ़ियों पर
तो कभी अडियल रदीफ़ पर

मैं भी चाहता हूँ
जीवन चौपाई छन्द जैसा मधुर 
और
मनहर कवित्त सा मनोरम हो
लेकिन शायद
हमदोनों देवनागरी के ऐसे गुरु-वर्ण हैं
जो कि प्रतिबध्द हैं 
पञ्चचामर छन्द में क्रमिक आवृत्ति के लिये
यानि हर बार 
हम दौनों के बीच में 
एक लघु का होना अपरिहार्य है

ऐसा लगता है 
शायद विधना ने
हमारा मिलन
उस दिन के लिये फ़िक्स कर दिया है
जिस दिन
छन्दों के फूल
हाइकु की वल्लरियाँ
शेरों की सुगन्ध
और
नज़्मों की नज़ाकत

दूर न होगी कविता और कहानी के कथानक से