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प्राकृतिक एवं कृत्रिम रंग - आदित्य चौधरी

गुलाल होली के सूखे रंगों को कहा जाता है, जो रंगीन सूखा चूर्ण होता है, जिसे होली के त्योहार में गालों पर या माथे पर टीका लगाने के काम आता है। इसके अलावा इसका प्रयोग रंगोली बनाने में भी किया जाता है। बिना गुलाल के होली के रंग फीके ही रह जाते हैं। यह कहना उचित ही होगा कि जहां गीली होली के लिये पानी के रंग होते हैं, वहीं सूखी होली भी गुलालों के संग कुछ कम नहीं जमती है। यह रसायनों द्वारा व हर्बल, दोनों ही प्रकार से बनाया जाता है। कई वर्ष पूर्व तक मूल रूप से यह रंग वनस्पतियों से प्राप्त रंगों या उत्पादों, फूलों और अन्य प्राकृतिक पदार्थों से ही इसका निर्माण हुआ करता था, जिनमें रंगने की प्रवृत्ति होती थी। किन्तु समय के साथ इसमें बदलाव आया और होली के ये रंग अब रसायनिक भी होते हैं और कुछ तेज़ रासायनिक पदार्थों से तैयार किए जाते हैं व उन्हें अरारोट में मिलाकर तीखे व चटक रंग के गुलाल बनाये जाने लगे। ये रासायनिक रंग हमारे शरीर के लिए हानिकारक होते हैं, विशेष तौर पर आँखों और त्वचा के लिए। इन्हीं सब समस्याओं ने फिर से हमें इधर कुछ वर्षों से दोबारा प्राकृतिक रंगों / हर्बल गुलाल की ओर रुख़ करने को मजबूर कर दिया है। कई तरह के हर्बल व जैविक गुलाल बाज़ारों में उपलब्ध होने लगे हैं। हर्बल गुलाल के कई लाभ होते हैं। इनमें रसायनों का प्रयोग नहीं होने से न तो एलर्जी होती है न आंखों में जलन होती है। ये पर्यावरण के अनुकूल होते हैं।

रासायनिक गुलाल

रंगों के पर्व होली में लोग उत्साह से एक दूसरे को रंग लगाते हुए शुभकामनाएं देते हैं लेकिन कुछ रंग ऐसे होते हैं जो सेहत को नुकसान पहुंचा कर शुभकामनाओं को अर्थहीन तथा रंग पर्व को बदरंग बना देते हैं। मिलावटी रंगों के कारण होने वाला नुकसान कई बार घातक भी हो सकता है।

गुलाल बनाने के लिए कई रसायनों का प्रयोग होता है। इनमें से कुछ रंग, उनमें प्रयुक्त रसायन व उनका स्वास्थ्य पर प्रभाव इस प्रकार से है।

काला रंग 'लेड ऑक्साइड' से बनता है, जिससे गुर्दे को हानि व 'लर्निंग डिसेबिलिटी' हो सकती है।हरा रंग 'कॉपर सल्फेट' से बनता है, जिससे आंखों में एलर्जी, जलन व अस्थायी अंधता हो सकती है।बैंगनी रंग क्रोमियम आयोडाइड से बनता है जिससे ब्रोंकियल दमा व एलर्जी हो सकते हैं। चमकीले / रूपहला रंग एल्युमिनियम ब्रोमाइड से बनता है, जो कैंसर का कारक बन सकता है। नीला रंग प्रशियन ब्लू नामक रसायन से बनता है जिससे त्वचा की एलर्जी और संक्रमण पैदा कर सकता है।लाल रंग मर्करी सल्फेट से बनता है, इतना ज़हरीला होता है कि जिससे त्वचा का कैंसर व मेंटल रिटार्डेशन संभव है।

रंगों की गुणवत्ता

सूखे गुलाल में एस्बेस्टस या सिलिका मिलाई जाती है जिससे अस्थमा, त्वचा में सक्रंमण और आंखों में जलन की शिकायत हो सकती है। गीले रंगों में आम तौर पर जेनशियन वायोलेट मिलाया जाता है जिससे त्वचा का रंग प्रभावित हो सकता है और डर्मेटाइटिस की शिकायत हो सकती है। इनके अलावा मिलावटी व रासायनिक घटिया रंगों में डीजल, क्रोमियम, आयोडिन, इंजन ऑयल, और सीसे का पाउडर भी हो सकता है जिनसे सेहत को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। इससे लोगों को चक्कर आता है, सिरदर्द और सांस की तकलीफ होने लगती है। जानकारी या जागरूकता के अभाव में अक्सर दुकानदार, ख़ास कर छोटे दुकानदार इस बारे में ध्यान नहीं देते कि रंगों की गुणवत्ता कैसी है। कभी तो ये रंग उन डिब्बों में आते हैं जिन पर लिखा होता है केवल औद्योगिक उपयोग के लिए। ज़ाहिर है कि ख़तरा इसमें भी है। होली के रंग लघु उद्योग के तहत आते हैं और लघु उद्योग के लिए निर्धारित रैग्युलेशन और क्वालिटी चेक नहीं है।

हर्बल गुलाल

अन्य परंपरागत रासायनिक रंगों की तुलना में हर्बल गुलाल ने सबसे ज़्यादा अपना रंग जमा रखा है। बाज़ार में हर्बल सामग्रियों से बनाए गए सूखे रंग उपलब्ध हैं। त्वचा पर रासायनिक रंगों के दुष्प्रभाव को देखते हुए आठ वर्ष पूर्व लखनऊ स्थित 'राष्ट्रीय वानस्पतिक अनुसंधान केन्द्र' ने ऐसे हर्बल गुलाल की जरूरत महसूस की थी। डा. वीरेन्द्र लाल कपूर ने होली के लिए विशेष रूप से हर्बल गुलाल तैयार किया था। इस गुलाल की ख़ासियत है कि इसे न केवल त्वचा से आसानी से छुड़ाया जा सकता है बल्कि यह दुष्प्रभावों से भी कोसो दूर रखता है। 'एन.बी.आर.आई. के वैज्ञानिक बताते है यह गुलाल, इमली के बीज, बेल, अनार के छिलके, यूकेलिप्टस की छाल, अमलतास की फली का गूदा, प्याज का ऊपरी छिल्का, चुकंदर और हल्दी आदि वानस्पतिक पदार्थों से रंग तैयार करके उनको एक निश्चित अनुपात में गंधकों और पाउडर के साथ मिलाकर लाल, पीला, गुलाबी, हरा, भूरा, नीला इत्यादि रंगों में हर्बल गुलाल तैयार किया जाता है।

तिहाड़ जेल की महिला कैदियों ने भी गुलाब के फूल जैसी हर्बल सामग्रियों की मदद से रंग गुलाल बनाए हैं। तिहाड़ की महिला कैदियों के साथ पिछले पंद्रह सालों से कार्यरत्त दिव्य ज्योति जागृति संस्थान (डीजेजेएस) के प्रवक्ता विशालनंद ने बताया कि इस रंग में अरारोट पाउडर, खाने वाले रंग और प्राकृतिक सुगंध आदि का इस्तेमाल किया गया है और इनसे त्वचा को कोई नुकसान नहीं होता।

मध्य प्रदेश के वन विभाग का ‘संजीवनी’ वनौषधि केंद्र ने होली के त्योहार के लिये इको फ्रेन्डली रंग तैयार किये हैं। इसे विभिन्न किस्म के फूलों, वनस्पतियों और अरारोट से तैयार किया जाता है। टेसू के फूलों तथा प्राकृतिक रंग और सुगंध के अद्भुत मेल से बने विशेष हर्बल गुलाल लाल, गुलाबी, पीले, केशरिया और क्रीम रंग में उपलब्ध है।

'पर्यावरण मित्र' हर्बल गुलाल की यह रंगबिरंगी सौगात भोपाल स्थित लघु वनोपज प्रसंस्करण एवं अनुसंधान केन्द्र बरखेड़ा पठानी ने तैयार की है। यह केन्द्र मध्य प्रदेश राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ द्वारा संचालित है।

गुलाल

विंध्य हर्बल्स शृंखला के अंतर्गत तैयार हर्बल गुलाल प्राचीन परंपरागत वैदिक पद्यतियों से बनाया गया है जिन्हें तत्कालीन राजपरिवारों द्वारा उपयोग किया जाता था। हर्बल गुलाल के ज़रिये पारम्परिक राजसी तरीके से होली खेलने का आनंद अब आम लोग भी उठा सकेंगे। यह रंग प्रदूषण रहित है साथ ही आर्सेनिक, जस्ता, सीसा, कैडमियम, निकल तथा अभ्रक जैसे हानिकारक तत्वों से मुक्त है। इन रंगों को छुड़ाने में पानी का अपव्यय भी नहीं होगा जिससे पानी की बचत भी होगी। हर्बल गुलाल की यह ख़ासियत है कि शरीर पर इनके उपयोग से कोई विपरीत प्रभाव नहीं होता है।

प्राकृतिक रंग / हर्बल गुलाल बनाने की विधि

होली रंगों का त्योहार है और इस मौके पर एक-दूसरे को रंग-गुलाल से सराबोर करना सबको अच्छा लगता है, लेकिन कई बार जाने-अनजाने में इस्तेमाल किए गए केमिकल युक्त रंग त्वचा पर विपरीत प्रभाव छोड़ जाते हैं। ऐसे में होली को सुरक्षित बनाने के लिए फूल-पत्तियों और घरेलू चीज़ों के इस्तेमाल से बनाए हर्बल रंगों व गुलाल से त्योहार मनाएं। हम घर पर बिल्कुल प्राकृतिक तौर पर गुलाल के रंग तैयार कर सकते हैं। जो ख़ूबसूरत लाल-हरा, नीला-पीला, केसरिया-गुलाबी रंग का हो सकते हैं। होली के ये प्राकृतिक रंग पूरी तरह सिर्फ़ सुरक्षित ही नहीं बल्कि चेहरे और त्वचा के लिए भी लाभदायक माने जाते हैं। तभी तो यदि होली खेलते हुए गुलाल आँखों में भी चला भी जाए तो आप आराम से होली खेलते रहिए और जब त्योहार का मज़ा पूरा हो जाए, तब आराम से घर जाकर आँखें धो लीजिए।

लाल गुलाल तैयार करने की विधि

पिसा हुआ लाल चंदन जिसे रक्तचंदन या लाल चंदन भी कहा जाता है, ख़ूबसूरत लाल रंग का स्रोत है। साथ ही यह त्वचा के लिए काफ़ी फ़ायदेमंद होता है और आमतौर पर फेस पैक आदि में भी इस्तेमाल किया जाता है। यह सूखा रंग गुलाल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है तथा इनमें सूखे लाल गुड़हल के फूल को पीस कर मिला सकते हैं। इसके अलावा गीला लाल रंग बनाने के लिये चार चम्मच लाल चंदन पाउडर को पांच लीटर पानी में डालकर उबालें। इसे 20 लीटर पानी में मिलाकर तैयार किया जा सकता है।


गुलाल

इसके अलावा लाल गुलाब को सुखाकर पाउडर बना लें। इसकी मात्रा बढ़ाने के लिए आटा मिलाकर गुलाल के रूप में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। 

छाया में सुखाए गए गुड़हल या जवाकुसुम के फूलों के पाउडर से लाल रंग तैयार किया जा सकता है। 

सिंदूरिया के ईंट से लाल बीजों को भी बतौर रंग या गुलाल इस्तेमाल किया जा सकता है। 

लाल अनार के छिलकों / दानों को पानी में उबाल कर भी सुर्ख लाल रंग बनाया जा सकता है। 

आधे कप पानी में दो चम्मच हल्दी पाउडर के साथ चुटकी भर चूना मिलाइए। फिर 10 लीटर पानी के घोल में इसे अच्छी तरह मिलाइए और आपका होली का रंग तैयार। 

टमाटर और गाजर के रस को भी पानी में मिला कर रंग तैयार किया जा सकता है। 

प्राकृतिक रूप से तैयार हरा गुलाल हरा सूखा रंग बनाने के लिए मेहँदी या हिना पाउडर, बिना आंवला व रीठा मिलाए, प्रयोग कर सकते हैं तथा इसमें बेसन या आटा भी मिला सकते हैं। 

सूखी मेहंदी चेहरे पर रंग नहीं छोड़ती है और इसे ब्रश से आसानी से झाड़ कर साफ़ किया जा सकता है। अगर मेहंदी पाउडर लगाने के बाद चेहरा गीला भी हो जाए, तो भी बहुत हल्का रंग चढ़ेगा। 

गीला हरा रंग बनाने के लिए दो लीटर पानी में दो चम्मच मेहंदी पाउडर डालकर अच्छी तरह से घोल लें, इसमें धनिया, पालक, पुदीना आदि की पत्तियों का पाउडर मिलाकर हरा रंग तैयार कर सकते हैं, पर इस रंग के दाग़ आसानी से नहीं छुटते। यह दीगर बात है कि यह रंग बालों के लिए बहुत लाभदायक (हर्बल कंडिशनर का काम) होता है।

गुलमोहर के पत्तियों को अच्छी तरह सुखा कर पीस लें और चमकदार प्राकृतिक हरा गुलाल तैयार किया जा सकता है।

गेहूँ की हरी बालियों को अच्छी तरह पीसकर गुलाल तैयार करें।

पालक, धनिया या पुदीने के पत्तियों को सुखाकर पीस लें और हरे गुलाल की तरह इस्तेमाल सकते हैं तथा पानी में मिलाकर गीला रंग तैयार किया जा सकता है।


गुलाल
गुलाबी / जामुनी रंग
एक किलो ग्राम चुकंदर को कद्दूकस करके एक लीटर पानी में डालकर रात भर छोड़ दें। इससे गाढ़ा जामुनी रंग तैयार हो जाएगा। फिर रंगीन पानी बनाने के लिए इस घोल में पानी मिलाकर होली का लुत्फ़ उठाइए।

पीला / नारंगी रंग
पीला सूखा रंग बनाने के लिये दो चम्मच हल्दी पाउडर को पांच चम्मच बेसन में मिलाएं। हल्दी और बेसन वैसे भी त्वचा के लिए काफ़ी गुणकारी होता है और आमतौर पर नहाने से पहले इसे उबटन की तरह इस्तेमाल किया जाता है।

इसके अलावा गेंदे के फूल को सुखाकर उसके पाउडर से भी पीला रंग तैयार कर सकते हैं।

इसके अलावा, एक चम्मच हल्दी पाउडर को दो लीटर पानी में मिलाकर थोड़ी देर उबालें या पचास गेंदे के फूल दो लीटर पानी में मसलकर उबाल लें और रात भर छोड़ दें। संतरी रंग तैयार हो जाएगा।

चटक केसरिया गुलाल

पारंपरिक तौर पर भारत में यह चटक केसरिया गुलाल टेसू के फूलों से बनता है, जिसे पलाश भी कहा जाता है, होली के ख़ूबसूरत रंगों के परंपरागत स्रोत हैं। टेसू के फूलों को पानी में उबालकर रात भर के लिए पानी में भीगने के लिए छोड़ दीजिए, इससे संतरी रंग तैयार हो जाएगा और सुबह रंग का आनंद उठाइए। इस पानी में औषधिय गुण होते हैं। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण भी गोपियों के साथ टेसू के फूल से होली खेलते थे और इसका इस्तेमाल कई औषधियां बनाने में भी होता है।

चुटकी भर चंदन पाउडर 1 लीटर पानी में मिलाने पर 'केसरिया रंग' तैयार हो जाता है।

केसर की पत्तियों को कुछ समय के लिए 2 चम्मच पानी में भीगने के लिए छोड़ दें। फिर उन्हें पीस लें। अपने इच्छानुसार गाढ़ा रंग पाने के लिए धीरे-धीरे पानी मिलाएँ, ताकि ज़्यादा पानी से रंग फीका या हल्का न हो जाए। यह त्वचा के लिए अच्छा तो होता ही है साथ ही साथ बहुत महँगा भी होता है।

नीला रंग

नीले रंग का गुलाल तैयार करने के लिए 'जकरांदा के फूल' को सुखाकर पाउडर बना लें।

काला रंग
काले अंगूर के जूस को पानी में मिलाएं या हल्दी पाउडर को थोड़े से बेकिंग सोडा के साथ मिलाकर कत्थई रंग तैयार किया जा सकता है।

पर्यावरण के प्रति संवेदनशील कुछ संस्थाओं ने प्राकृतिक रंगों को पैकेटबंद कर के भी बेचना शुरू कर दिया है। इन्हीं में से एक संस्था है कल्पवृक्ष जिसके विषय में जानना और इनसे रंग ख़रीदना एक रोचक अनुभव हो सकता है।

जैविक गुलाल

बहुराष्ट्रीय कंपनी आर्गेनिक इंडिया ने हर्बल गुलाल से एक क़दम आगे बढ़ते हुए बाज़ार में इस जैविक गुलाल को उतारा है। यह गुलाल तुलसी और हल्दी के वृक्षों से बनाया गया है। आदिकाल से भारत में तुलसी और हल्दी का औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। होली पर बाज़ार में रासायनिक रंगों की भरमार रहती है। ये रंग हमारी त्वचा के लिए हानिकारक होते हैं। ऐसे में जैविक गुलाल रासायनिक रंगों से बचने के बेहतर विकल्प हैं। जैविक गुलाल बनाने के लिए जिन औषधीय पौधों का इस्तेमाल किया गया है, उन्हें जैविक उर्वरकों के जरिए उगाया गया है। इस वजह से त्वचा पर इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। आर्गेनिक इंडिया के एक विशेषज्ञ ने बताया कि जैविक गुलाल हरे और पीले, दो रंगों में बनाए गए हैं। हरा गुलाल तुलसी की पत्तियों से और पीला गुलाल हल्दी से बनाया बनाया गया है। जैविक गुलाल न सिर्फ़ त्वचा के लिए कंडीशनर का काम करता है, बल्कि इसके प्रयोग से त्वचा पर दाने भी नहीं निकलते। महत्त्वपूर्ण है कि लखनऊ स्थित भारतीय विष विज्ञान संस्थान ने एक अध्ययन में पाया कि बाज़ार में मिलने वाले गुलाल में हानिकारक क्रोमियम, निकिल और लेड जैसे तत्व मौजूद हैं।

[भारतकोष से साभार]

बरसाने की लठामार होली - आदित्य चौधरी

लट्ठमार होली ब्रज क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध त्योहार है। होली शुरू होते ही सबसे पहले ब्रज रंगों में डूबता है। यहाँ भी सबसे ज्यादा मशहूर है बरसाना की लट्ठमार होली। बरसाना राधा का जन्मस्थान है। मथुरा (उत्तर प्रदेश) के पास बरसाना में होली कुछ दिनों पहले ही शुरू हो जाती है।

मान्यता

इस दिन लट्ठ महिलाओं के हाथ में रहता है और नन्दगाँव के पुरुषों (गोप) जो राधा के मन्दिर ‘लाडलीजी’ पर झंडा फहराने की कोशिश करते हैं, उन्हें महिलाओं के लट्ठ से बचना होता है। कहते हैं इस दिन सभी महिलाओं में राधा की आत्मा बसती है और पुरुष भी हँस-हँस कर लाठियाँ खाते हैं। आपसी वार्तालाप के लिए ‘होरी’ गाई जाती है, जो श्रीकृष्ण और राधा के बीच वार्तालाप पर आधारित होती है। महिलाएँ पुरुषों को लट्ठ मारती हैं, लेकिन गोपों को किसी भी तरह का प्रतिरोध करने की इजाजत नहीं होती है। उन्हें सिर्फ गुलाल छिड़क कर इन महिलाओं को चकमा देना होता है। अगर वे पकड़े जाते हैं तो उनकी जमकर पिटाई होती है या महिलाओं के कपड़े पहनाकर, शृंगार इत्यादि करके उन्‍हें नचाया जाता है। माना जाता है कि पौराणिक काल में श्रीकृष्ण को बरसाना की गोपियों ने नचाया था। दो सप्ताह तक चलने वाली इस होली का माहौल बहुत मस्ती भरा होता है। एक बात और यहाँ पर जिस रंग-गुलाल का प्रयोग किया जाता है वो प्राकृतिक होता है, जिससे माहौल बहुत ही सुगन्धित रहता है। अगले दिन यही प्रक्रिया दोहराई जाती है, लेकिन इस बार नन्दगाँव में, वहाँ की गोपियाँ, बरसाना के गोपों की जमकर धुलाई करती है।

परंपरा एवं महत्त्व

लट्ठमार होली, कृष्ण जन्मभूमि, मथुरा

उत्तर प्रदेश में वृन्दावन और मथुरा की होली का अपना ही महत्त्व है। इस त्योहार को किसानों द्वारा फसल काटने के उत्सव एक रूप में भी मनाया जाता है। गेहूँ की बालियों को आग में रख कर भूना जाता है और फिर उसे खाते है। होली की अग्नि जलने के पश्चात बची राख को रोग प्रतिरोधक भी माना जाता है। इन सब के अलावा उत्तर प्रदेश के मथुरा, वृन्दावन क्षेत्रों की होली तो विश्वप्रसिद्ध है। मथुरा में बरसाने की होली प्रसिद्ध है। बरसाना राधा जी का गाँव है जो मथुरा शहर से क़रीब 42 किमी अन्दर है। यहाँ एक अनोखी होली खेली जाती है जिसका नाम है लट्ठमार होली। बरसाने में ऐसी परंपरा हैं कि श्री कृष्ण के गाँव नंदगाँव के पुरुष बरसाने में घुसने और राधा जी के मंदिर में ध्वज फहराने की कोशिश करते है और बरसाने की महिलाएं उन्हें ऐसा करने से रोकती हैं और डंडों से पीटती हैं और अगर कोई मर्द पकड़ जाये तो उसे महिलाओं की तरह शृंगार करना होता है और सब के सम्मुख नृत्य करना पड़ता है, फिर इसके अगले दिन बरसाने के पुरुष नंदगाँव जा कर वहाँ की महिलाओं पर रंग डालने की कोशिश करते हैं। यह होली उत्सव क़रीब सात दिनों तक चलता है। इसके अलावा एक और उल्लास भरी होली होती है, वो है वृन्दावन की होली यहाँ बाँके बिहारी मंदिर की होली और 'गुलाल कुंद की होली' बहुत महत्त्वपूर्ण है। वृन्दावन की होली में पूरा समां प्यार की ख़ुशी से सुगन्धित हो उठता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि होली पर रंग खेलने की परंपरा राधाजी व कृष्ण जी द्वारा ही शुरू की गई थी।

[भारतकोष से साभार]

तेरा हो या न हो, मेरा है वास्ता - आदित्य चौधरी

तेरा हो या न हो, मेरा है वास्ता
जाना पहचाना लगता है ये रास्ता

उसके खेतों से और उसके खलिहान से
छोटे जुम्मन की फूफी की दूकान से
उसके कमज़ोर काँधों के सामान से

है मेरा वास्ता, मेरा है वास्ता

माँगते भीख इंसान इंसान से
सर्द रातों से लड़ती हुई जान से
और हर गाँव में बनते वीरान से

है मेरा वास्ता, मेरा है वास्ता

आँख से जो न टपकी हो उस बूँद से
कसमसाते हुए दिल की हर गूँज से
बिन लिखे उन ख़तों के मज़मून से

है मेरा वास्ता, मेरा है वास्ता

करवटों से परेशान फ़ुटपाथ से
उस मुहल्ले के बिछड़े हुए साथ से
और हँसिए को थामे हुए हाथ से

मेरा है वास्ता, है मेरा वास्ता

उसके अल्लाह से और भगवान से
उसके भजनों से भी, उसकी अज़ान से
और दंगों में जाती हुई जान से

है मेरा वास्ता, मेरा है वास्ता

उसके चूल्हे की बुझती हुई आग से
उस हवेली की जूठन, बचे साग से
टूटी चूड़ी के फूटे हुए भाग से

है मेरा वास्ता, मेरा है वास्ता

कम्मो दादी की धोती के पैबंद से
और पसीने की आती हुई गंध से
उसके जूआ छुड़ाने की सौगंध से

है मेरा वास्ता, मेरा है वास्ता

उसकी छत से टपकती हुई बूँद से
सरहदों पर बहाए हुए ख़ून से
ज़ुल्म ढाते हुए स्याह क़ानून से

तेरा हो या न हो, तेरा हो या न हो, मेरा है वास्ता
जाना पहचाना लगता है ये रास्ता
कितना अपना सा लगता है ये रास्ता

मेरा है वास्ता, मेरा है वास्ता
मेरा है वास्ता, मेरा है वास्ता

: आदित्य चौधरी 
[संस्थापक - भारत कोष व ब्रज डिस्कवरी]

वरना हमें ग़रीब कौन मानेगा - आदित्य चौधरी

भारत कोश वाले आदित्य चौधरी जी को पहले भी पढ़ा, मगर उन का यह आलेख बहुत ही मार्मिक और प्रासंगिक भी है, अपनी यादों में सँजोये रखने की ख़ातिर इसे वातायन का हिस्सा बना रहा हूँ।

ग़रीबी का दिमाग़ -आदित्य चौधरी


Ghareebee.jpg
       शास्त्रों में तीन हठ गिनाए गए हैं। बाल हठ, त्रिया हठ और राज हठ।
एक राजपुत्र ने राज हठ किया-
"मिश्रा जी! पंद्रह अगस्त आने वाला है। कुछ नया होना चाहिए..."
"यस सर! आप पोलो मॅच के लिए कह रहे थे... उसका अरेंजमेन्ट करवा दें..."
"नहीं!... हमें देश के लिए कुछ करना है... हमको अपने देश से, उसके सिटीज़न से, बहुत इंटीमेसी है... हम हमारे देश के ग़रीब देखना चाहते हैं, हमें ग़रीब दिखाइये।"
"यस सर! मैं अभी आपको गूगल इमेज में और नेशनल ज्योग्राफ़िक मैगज़ीन में ग़रीब दिखाता हूँ।"
"ओ... नो! हमें रीयल ग़रीब देखने हैं, ये वाले ग़रीब तो हम रोज़ाना देखते हैं।... एकदम नॅचुरल ग़रीब।"
"सॉरी सर! मैं समझा नहीं?"
"इसमें समझने की कौन सी बात है... हमको सचमुच के ग़रीब देखने हैं... उनको टच करना है... उनसे बात करनी है... आई वान्ट टू नो द रीयल फ़ील ऑफ़ पूअर... गॉट इट? आया समझ में?"
"ओके सर! मैं समझ गया... अभी दो-चार ग़रीब बुलवाता हूँ... एक तो हमारा चपरासी ही काफ़ी ग़रीब है..."
"नो नो नो हमको उनके पास जाना है। हमें गावों में जाना है।" यू फ़िक्स द टूर। हम जाएँगे।"
        एक गाँव तुरंत छांटा गया लेकिन ये गाँव राजपुत्र ने नकार दिया, कारण था कि ये गाँव काफ़ी विकसित था। राजपुत्र को एक बेहद पिछड़ा गाँव देखना था। आख़िर झक मार कर अधिकारियों ने एक पिछड़ा गाँव छांट लिया। यात्रा शुरू हो गई। पहले चार्टर प्लेन फिर हॅलीकॉप्टर और उसके बाद कारों का क़ाफ़िला उस 'पिछड़े' गाँव में जा पहुँचा जहाँ 'ग़रीब' रहते थे। राजपुत्र के स्वागत के लिए दूर-दूर से लोग आए हुए थे। अफ़रातफ़री का माहौल था। भीड़-भाड़ देखकर राजपुत्र का 'मूड' ख़राब हो गया।
"इनमें से जो ग़रीब हैं उन्हें मेरे कॅम्प में बुलवाइए।" राजपुत्र ने सचिव को आदेश दिया। चार ग़रीब कॅम्प में बुलाए गए जिनमें दो पुरुष ग़रीब और दो महिला ग़रीब हैं। कॅम्प में ग़रीबों को ज़मीन पर बिछी दरी पर बिठाकर बातचीत शुरू हो गई। राजपुत्र भी कुर्सी छोड़कर नीचे ही बैठ गया।
Blockquote-open.gif "इनको मालूम है सरकार कि हम कितने ग़रीब हैं... एकदम प्योर ग़रीब हैं सरकार!... क्यों सरकार हैं ना हम ग़रीब?" Blockquote-close.gif
        एक ग़रीब ने दूसरे से फ़ुसफ़ुसा कर कहा-
"देख ले बेटा! मैंने कहा था चुनाव आ रहे हैं, इसीलिए तो ये नीचे बैठ गए..."
"सब चुप हो जाओ! जो पूछें उसका जवाब दो!" अधिकारी ने डांटा।
राजपुत्र- "तोऽऽऽ... आप लोग ग़रीब हैं?" राजपुत्र ने अपने चेहरे से मंदबुद्धि दर्शाने वाली मासूमियत को छुपाने के प्रयास में, अपने चेहरे पर गम्भीरता ओढ़ते हुए सवाल किया। ये सवाल ऐसा ही होता है जैसा कि अदालत में गवाह या अपराधी का नाम पता अच्छी तरह जानते हुए भी वकील उस व्यक्ति का नाम वग़ैरा पूछते हैं।
पहला ग़रीब- "हाँ सरकार! बहुत ग़रीब हैं।" इस ग़रीब ने अति उत्साह में काफ़ी तेज़ आवाज़ में 'हाँ सरकार' कहा लेकिन जब पास खड़े अधिकारी ने उसे अर्थ सहित घूरा तो फिर 'बहुत ग़रीब हैं' को बहुत धीमी आवाज़ में कहा जो कि लगभग फुसफुसाहट में बदल गई।
राजपुत्र- "अच्छाऽऽऽ! लेकिन कितने ग़रीब?" राजपुत्र ने जैसे कोई रहस्य जानने की कोशिश की।
दूसरा ग़रीब- "बहुत ज़्यादा सरकार!... मतलब कि एकदम से पूरे के पूरे ग़रीब।" दूसरे ग़रीब ने पास खड़े अधिकारी की तरफ़ इशारा किया और ज़रा रुककर कहा-
"इनको मालूम है सरकार कि हम कितने ग़रीब हैं... एकदम प्योर ग़रीब हैं सरकार!... क्यों सरकार हैं ना हम ग़रीब?" इस पर अधिकारी ने खिसाहट भरे आश्चर्य से राजपुत्र की तरफ़ देखकर अपने अनुभवी अधिकारी होने का फ़र्ज अदा किया।
राजपुत्र- "क्या खाते हैं आप लोग? मतलब कि ब्रेकफ़ास्ट... लंच... डिनर में क्या लेते हैं?" राजपुत्र ने बड़े घरेलू अंदाज़ में पूछताछ आगे बढ़ाई।
अधिकारी- "सर पूछ रहे हैं कि सुबह, दोपहर और रात के खाने में क्या खाते हो?"
पहला ग़रीब- "आप जो खिलाएँगे खा लेंगे सरकार!..." बेचारे ने सोचा कि शायद कुछ खिलाने-पिलाने की बात चल रही है तो फ़ौरन मेहमान वाले अंदाज़ में शरमा कर कहा।
राजपुत्र- "वो तो ठीक है... आप लोगों के खाने का इंतज़ाम भी है... लेकिन मैं ये जानना चाहता हूँ कि आप खाते क्या हैं मतलब कि आपका रोज़ाना का खाना क्या होता है?"
दूसरा ग़रीब- "जो मिल जाय सो खा लेते हैं सरकार... वैसे रोटी-चटनी ज़्यादा खाते हैं सरकार!... अब तीन टाइम तो नहीं खाते हैं... कभी दो बार तो कभी एक बार... खेत में से भी कुछ साग-सब्ज़ी मिल जाती है तो पका लेते हैं।"
Blockquote-open.gif "ठीक कह रहे हैं बाबू जी, ग़रीबी हमारे दिमाग़ में है... आप लोगों के दिमाग़ में नहीं... अगर हमारी ग़रीबी आपके दिमाग़ में भी होती तो हम ग़रीब नहीं होते..." Blockquote-close.gif
राजपुत्र- "डाइरेक्ट खेत से तो ऑरगेनिक फ़ूड मिलता होगा आपको?"
दूसरा ग़रीब- "सरकार बथुआ, चौलाई, कुल्फा मिल जाता है, या फिर कभी मूली... और जब आलू की खुदाई चलती है तो आलू ख़ूब मिलते हैं वो भी बिल्कुल फिरी में..."
राजपुत्र, अधिकारी से- "आप सब कुछ नोट कर रहे हैं ना? मुझे पूरा डेटाबेस चाहिए..."
अधिकारी- "यस सर! मैं नोट कर रहा हूँ।"
राजपुत्र- "फल कौन-कौन से खाते हैं आप लोग?"
पहला ग़रीब- "बेर खा लेते हैं सरकार!... और भी बहुत सी चीज़ें हैं सरकार आप नहीं जानते होंगे"
राजपुत्र- "जैसे?"
पहला ग़रीब- "जैसे सेंद, फूट, ककड़ी..."
राजपुत्र- "ये क्या हैं?"
अधिकारी "सर वाइल्ड फ़्रूट हैं, एक तरह से स्वीट मिलोन और ककुम्बर की तरह..."
राजपुत्र- "ओ.के. ... ये आपके साथ जो लेडीज़ हैं...?"
पहला ग़रीब- "ये हमारी घरवाली है सरकार और ये इसकी घरवाली है। वाइफ़ है सरकार वाइफ़। मेरी घरवाली पढ़ी लिक्खी है सरकार हाईस्कूल पास..."
राजपुत्र- "अच्छा! वॅरी गुड! आप लोगों का ख़र्चा कितना होता है खाने के ऊपर?"
दोनों 'ग़रीबों' ने एक दूसरे की तरफ़ देखा... अधिकारी की तरफ़ देखा... अपनी बीवियों से कानाफूसी की और फिर बड़े सोच-समझ कर पहले ग़रीब ने जवाब दिया-
पहला ग़रीब- "सरकार एक बार का खाना पौने पाँच रुपये में हो जाता है और दिन भर का पूरा ख़र्चा आता है छब्बीस रुपये!..."
राजपुत्र- "बस इतना ही...? इससे ज़्यादा नहीं?
दूसरा ग़रीब- "हाँ सरकार! इतने में ही खाना पड़ता है वरना हमको ग़रीब कौन मानेगा... अगर पाँच रुपये से ज़्यादा का खाएँगे तो ग़रीबी की रेखा से ऊपर चले जाएँगे... फिर तो राशन भी नहीं मिलेगा... मिट्टी का तेल वगैरा कुछ भी नहीं मिलेगा... बीपीऐल कार्ड भी छिन जाएगा सरकार! ..."
राजपुत्र ने अधिकारी से पूछा-
राजपुत्र- "क्या बस स्टॅन्ड पर खाना पाँच रुपए में मिल जाता है?"
अधिकारी- "नो सर!, नहीं मिलता।"
राजपुत्र- "रेलवे स्टेशन पर मिलता होगा?"
अधिकारी- "नो सर!, नहीं मिलता।"
Blockquote-open.gif सभी राजनीतिक दल, सार्वजनिक समस्याओं को हाशिए पर रखकर, जनता की व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पूरा करने की सोचते रहते हैं। Blockquote-close.gif
राजपुत्र- "पाँच रुपए में खाना तो बांग्ला देश और श्रीलंका में भी नहीं मिलता फिर ये चक्कर क्या है?"
पहला ग़रीब- "नहीं सरकार! दिल्ली और बम्बई में पाँच-दस रुपये में खाना मिल जाता है, बड़े-बड़े नेता यही बता रहे हैं, वहाँ इतना सस्ता खाना है तो हमको भी वहीं ले चलिए सरकार..."
राजपुत्र- "देखिए आपके दिल्ली या बॉम्बे जाने से कुछ नहीं होगा... ग़रीबी आपके दिमाग़ में है... इट्स इन योर माइंड... जस्ट अ स्टेट ऑफ़ माइंड... आप सोचते हैं कि आप ग़रीब हैं तो आप ग़रीब हो जाते हैं... आप सोचो मत कि आप ग़रीब हैं... यही सीक्रेट है... मैंने आपको सबसे अच्छा तरीक़ा बता दिया है... कुछ आया समझ में?"
तम्बू में सन्नाटा हो गया, सब एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे। जब कोई कुछ नहीं बोला तो पहले ग़रीब की हाईस्कूल पास पत्नी अचानक बोल पड़ी-
"ठीक कह रहे हैं बाबू जी, ग़रीबी हमारे दिमाग़ में है... आप लोगों के दिमाग़ में नहीं... अगर हमारी ग़रीबी आपके दिमाग़ में भी होती तो हम ग़रीब नहीं होते..."
ये तो पता नहीं कि राजपुत्र पर इन बातों का कितना प्रभाव पड़ा और उसने क्या किया... तो आइए भारतकोश पर वापस चलते हैं।-
        देश में, बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दे राजनीतिक मुद्दे हुआ करते थे। इन्हीं मुद्दों का बोलबाला चुनावों में भी होता था। धीरे-धीरे नेता (और शायद जनता भी) इन मुद्दों से 'बोर' हो गयी। मुद्दे बदलते चले गए और जनता भी अपनी मुख्य ज़रूरत को भूल कर टीवी, लॅपटॉप, इंटरनेट जैसे आकर्षक मुद्दों के प्रति अधिक गंभीर हो गई। कारण था कि ये सार्वजनिक न होकर व्यक्तिगत मुद्दे थे। राजनीतिक दल भी मनुष्य की इस कमज़ोरी का फ़ायदा उठाना सीख गए। नेताओं को समझ में आने लगा कि भाषणों में, सड़क बनवाने की बात करने से ज़्यादा लाभकारी है कर्ज़ा माफ़ करने की बात करना। जनता को भी लगने लगा कि सड़क तो 'सबके' लिए बनेगी लेकिन कर्ज़ा तो 'मेरा' माफ़ होगा। यहीं से व्यक्तिगत लाभ देने की राजनीति शुरू हो गई और सार्वजनिक समस्याएँ पिछड़ती चली गईं।
        अनेक योजनाओं के चलते गांवों में पानी की टंकियां बनीं लेकिन जनता का सारा ध्यान अपने घर के दरवाज़े पर हैण्ड पम्प लगवाने में रहा। टंकियों की हालत ख़राब होने लगी और ज़्यादातर टंकियां अब बेकार पड़ी हैं। ग्राम पंचायत, ज़िला पंचायत और विधायकों को मिलने वाले वोटों के पीछे जनता की व्यक्तिगत मांगों का दवाब बना रहता है।
        जन प्रतिनिधि होने का अर्थ, काफ़ी हद तक यह हो चुका है कि प्रतिनिधि हर समय, जनता की व्यक्तिगत आवश्यकता के लिए भागदौड़ करे। थाने, तहसील, डी.ऍम., ऍस.पी. के पास सच्चे झूठे मुद्दे और मुक़दमों की सिफ़ारिश करे। इस प्रक्रिया में जन प्रतिनिधि में अपना-पराया की भावना बहुत प्रबल हो जाती है। किसने वोट दिया और किसने नहीं, इस बात को लेकर जनता के कार्यों की वरीयता निश्चित की जाती है।
        हमको यह सोचना और जानना ही होगा कि इन सारी असमानता बढ़ाने वाली नीतियों के पीछे कौन सी सोच काम कर रही है। क्यों सभी राजनीतिक दल, सार्वजनिक समस्याओं को हाशिए पर रखकर, जनता की व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पूरा करने की सोचते रहते हैं।
        इसके लिए केवल एक ही कारण है। हमारे देश में राजनीतिक दलों की संख्या का अनियंत्रित होना। किसी भी देश के प्रजातांत्रिक ढांचे में देश के समग्र विकास के लिए विचारधाराओं के आधार पर ही राजनीतिक दलों का गठन होना चाहिए। ये विचारधाराएं दो या अधिकतम तीन ही हो सकती हैं, इससे अधिक होने का सीधा अर्थ है कि नए राजनीतिक दल के गठन के पीछे कोई न कोई धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र का मुद्दा है।
        सामान्यत: जनता के मन में तीन प्रकार की सोच ही समायी रहती हैं; दक्षिणपंथी, वामपंथी और मध्यमार्गी। इन तीन विचारधाराओं से दीगर कोई और सोच कभी भी समग्र समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करती। दक्षिणपंथी विचारधारा में; परम्परा, धर्म, पूंजीवाद आदि समाहित रहते हैं। वामपंथी विचारधारा में प्रगति, धर्म निरपेक्षता और समाजवाद समाहित होते हैं। मध्यमार्गी विचारधारा इन दोनों के बीच की सोच है जिसमें विकास, सर्व धर्म समभाव और पूंजीवाद-समाजवाद का सम्मिश्रण समाहित होते हैं।
        भारत में राजनीतिक दल बनाना कोई फ़र्म या कम्पनी बनाने जितना आसान है। 2-4 विधायक या सांसदों को लेकर किसी सरकार में शामिल हो जाना एक खेल बन गया है। जब किसी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो अनेक राजनीतिक दल मिलकर एक गुट बनाते हैं। ज़ाहिर है कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री किसी ऐसे व्यक्ति को चुना जाता है जो अपेक्षाकृत कम प्रभावशाली हो क्योंकि राजनीतिक प्रभाव वाले व्यक्ति से सभी दल डरते हैं कि 'कहीं ये हमारे विधायकों या सांसदों को अपनी ओर 'तोड़' न ले'।
        इस प्रक्रिया के चलते भारत ने कई कठपुतली प्रधानमंत्रियों को झेला है। इसी तरह परिवारवाद भी राजनीति का अभिन्न अंग बन गया है और अनेक बार हमारे देश और राज्यों का शासन ऐसे ही अयोग्य उत्तराधिकारियों के हाथों में रहा है। इस प्रक्रिया के बचाव में एक सामान्य सा उदाहरण दिया जाता है कि व्यापारी का वंशज व्यापारी, अभिनेता का वंशज अभिनेता, खिलाड़ी का वंशज खिलाड़ी तो फिर नेता का वंशज नेता क्यों नहीं? सीधी-साधी जनता इस मूर्खतापूर्ण तर्क को सहज ही मान लेती है। जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। व्यापार, खेल और फ़िल्मी दुनिया की उपलब्धियाँ, व्यक्तिगत हितों को आधार बना कर ही की जातीं हैं, जिसमें जनता का कोई लेना-देना या भागीदारी सामान्यत: नहीं होती। राजनीति की सीढ़ियाँ तो स्पष्ट रूप से जनता की भागीदारी से ही निर्मित होती हैं, जिन पर किसी का व्यक्तिगत अधिकार जमाना पूर्णत: अनैतिक है। यह तो ठीक वैसे ही हुआ जैसे कि कोई सेनाधिकारी अपने वंशज को अपना पद बिना किसी प्रतियोगिता के देना चाहे। जिस प्रकार देश की सेना देश के लिए जवाबदेह है उसी प्रकार राजनीतिक नेता भी। ज़रा सोचिए जिन गुणों, संघर्षों, बलिदानों को ध्यान में रखते हुए जनता ने किसी को नेता माना हो और वह नेता अपने वंशज को अपना पद देना चाहे तो क्या समझदार जनता को इसे स्वीकारना चाहिए?
        भारत में यही होता आया है। इस वंशवाद के कारण राजनीति में सबसे अधिक ठेस गुरु-शिष्य परंपरा को लगी है। आज के समय में राजनीति में कर्तव्यनिष्ठ शिष्य होना असंभव जैसा हो गया है। यदि हमारे देश में दो या तीन राजनीतिक दलों का नियम लागू नहीं किया गया और वंशवाद पर लगाम न कसी गई तो देश का विकास होना असंभव ही है।

इस बार इतना ही... अगली बार कुछ और...
-आदित्य चौधरी
संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक