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मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख - शकेब जलाली

मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख
सूरज हूँ मेरा रंग मगर दिन ढले भी देख.

हरचन्द राख़ हो के बिखरना है राह में
जलते हुये परों से उड़ा हूँ मुझे भी देख
हरचन्द - हालाँकि

आलम में जिस की धूम थी उस शाहकार पर
दीमक ने जो लिखे वो कभी तब्सिरे भी देख

कागज़ की कतरनों को भी कहते हैं लोग फूल
रंगों का एतबार ही क्या सूँघ के भी देख.

तूने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूँ
आँखों को अब न ढाँप मुझे डूबते भी देख.

बिछती थीं जिस की राह में फूलों की चादरें
अब उस की ख़ाक घास के पैरों तले भी देख

इन्सान नाचता है यहाँ पुतलियों के रंग
दुनिया में आ गया है तो इसके मज़े भी देख.

क्या शाख़ेबासमर है? जो ताकता है फ़र्श को!!!
नज़रें उठा 'शकेब' - ज़रा सामने भी देख


मफ़ऊलु फाएलातु मुफ़ाईलु फाएलुन
221 2121 1221 212
बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ़ महजूफ


शकेब साहब की इस ग़ज़ल को अलग अलग जगहों पर अलग अलग रूप में पढ़ा, इस लिये सब को इकट्ठा करते हुये पोस्ट किया है

ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ-कहाँ बरसे - शकेब जलाली

जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है
मेरी तरह से अकेला दिखाई देता है
सहरा - रेगिस्तान

न इतनी तेज़ चले, सरफिरी हवा से कहो
शजर पे एक ही पत्ता दिखाई देता है
शजर - पेड़ 

ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ-कहाँ बरसे
तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है
अब्र - बादल, दश्त - जंगल / कानन

वहीं पहुँच के गिराएँगे बादबाँ अपने
वो दूर कोई जज़ीरा दिखाई देता है
 बादबाँ - पाल, जज़ीरा - टापू

वो अलविदाअ का मंज़र, वो भीगती आँखें
पसेगुबार भी क्या-क्या दिखाई देता है
 अलविदाअ - विदाई, मंज़र - दृश्य, पसेगुबार - धूल के पीछे 

मेरी निगाह से छुप कर कहाँ रहेगा कोई
कि अब तो संग भी शीशा दिखाई देता है
संग - पत्थर

:- शकेब जलाली 
बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
मुफ़ाएलुन फ़एलातुन मुफ़ाएलुन फालुन
1212 1122 1212 22

चन्द अशआर - शकेब जलाली

Shakeb Jalali
शकेब जलाली [Oct'1, 1934 - Nov'12, 1966] नाम है उस शायर का जिस ने धारणाओं को बदला, अपनी पहिचान कायम की और अल्पायु में ही ज़ियादा शोरशराबा किये बिना अपने असली घर लौट गया। लफ़्ज़ के पाँचवें अंक से चुने हैं उन के चन्द अशआर। शकेब की शायरी में अधिकांश जगह पर श्रीमदभगवद्गीता की छाप दिखती है। गत का गहन चिंतन और आगत को ध्यान में रखते हुये उत्कृष्ट मूल्यांकन, विवेचनयक़ीन न आये तो इस पोस्ट में 'जलवारेज़ - निगाहेशौक़' वाले शेर को पढ़ लीजिये। हालाँकि उन का हर एक मिसरा बार-बार अपनी तरफ़ लौटने को मज़बूर करता है, मगर आज़ जब सब कुछ माइक्रो होता जा रहा है, इतने अशआर भी काफ़ी हैं, अगर पढ़ लिये जायें तो ......

ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ-कहाँ बरसे
तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है 
अब्र - बादल
दश्त - जंगल

तूने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूँ
आँखों को अब न ढाँप, मुझे डूबते भी देख

क्या शाखेबासमर है, जो तकता है फ़र्श को