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अँगुरीन लों पोर झुकें उझकें मनु खञ्जन मीन के जाले परे - गोविन्द कवि

अँगुरीन लों पोर झुकें उझकें मनु खञ्जन मीन के जाले परे
दिन औधि के कैसें गिनों सजनी अँगुरीन की पोरन छाले परे
कवि गोविन्द का कहियै किहिं सों हमें प्रीत करे के कसाले परे
जिन लालन चाँह करे इतनी उनें देखन के अब लाले परे 

औधि - अवधि 

गोविन्द कवि


दुर्मिल सवैया
कुल चार चरण, आठ सगण प्रति चरण