13 August 2016

सोरठा - दोहा गीत - संजीव वर्मा 'सलिल'

Sanjiv Verma Salil's profile photo
संजीव वर्मा 'सलिल'


सोरठा - दोहा गीत 
संबंधों की नाव 
*
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही। 
अनचाहा अलगाव,
नदी-नाव-पतवार में।। 
*
स्नेह-सरोवर सूखते,
बाकी गन्दी कीच। 
राजहंस परित्यक्त हैं,
पूजते कौए नीच।।
नहीं झील का चाव,
सिसक रहे पोखर दुखी।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
कुएँ - बावली में नहीं,
शेष रहा विश्वास। 
निर्झर आवारा हुआ,
भटके ले निश्वास।।
घाट घात कर मौन,
दादुर - पीड़ा अनकही। 
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
ताल - तलैया से जुदा,
देकर तीन तलाक। 
जलप्लावन ने कर दिया,
चैनो - अमन हलाक।।
गिरि खोदे, वन काट 
मानव ने आफत गही। 
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।। 
***



आदरणीय संजीव वर्मा सलिल जी पिंगलीय छंदों पर बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उपरोक्त गीत उन की श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। प्रायोगिक तौर पर सलिल जी ने दोहा और सोरठा के शिल्प को इस्तेमाल करते हुये दोहा-सोरठा गीत रचा है।

No comments:

Post a Comment

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।

My Bread and Butter