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लोकतंत्र उर्फ़ ढीठ तंत्र - अनिल गौड़

राजनीति में कितना बल है

वह हर चीज़ बदल सकती है

अपने हित में जो संभव है

उस कुमार्ग पर चल सकती है

आज़ादी का गीत - रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

रूप चन्द्र शास्त्री मयंक

दशकों से गणतन्त्र पर्व पर, राग यही दुहराया है।
होगा भ्रष्टाचार दूर, बस मन में यही समाया है।।

सिसक रहा जनतन्त्र हमारा, चलन घूस का जिन्दा है,
देख दशा आजादी की, बलिदानी भी शर्मिन्दा हैं,
रामराज के सपने देखे, रक्षराज ही पाया है।
होगा भ्रष्टाचार दूर, बस मन में यही समाया है।१।

ये कैसा जनतन्त्र? जहाँ पर जन-जन में बेकारी है,
जनसेवक तो मजा लूटता, पर जनता दुखियारी है,
आज दलाली की दलदल में, सबने पाँव फँसाया है।
होगा भ्रष्टाचार दूर, बस मन में यही समाया है।२।

आज तस्करों के कब्ज़े में, नदियों की भी रेती है,
हरियाली की जगह, खेत में कंकरीट की खेती है,
अन्न उगाने वाले, दाता को अब दास बनाया है।
होगा भ्रष्टाचार दूर, बस मन में यही समाया है।३।

गाँवों की खाली धरती पर, चरागाह अब नहीं रहे,
बोलो कैसे अब स्वदेश में, दूध-दही की धार बहे,
अपनी पावन वसुन्धरा पर, काली-काली छाया है।
होगा भ्रष्टाचार दूर, बस मन में यही समाया है।४।

मुख में राम बगल में चाकू, हत्या और हताशा है,
आशा की अब किरण नहीं है, चारों ओर निराशा है,
सुमन नोच कर काँटों से, क्यों अपना चमन सजाया है।
होगा भ्रष्टाचार दूर, बस मन में यही समाया है।५।

आयेगा वो दिवस कभी तो, जब सुख का सूरज होगा,
पंक सलामत रहे ताल में, पैदा भी नीरज होगा,
आशाओं से अभिलाषाओं का, संसार सजाया है।
दशकों से गणतन्त्र पर्व पर, राग यही दुहराया है।
होगा भ्रष्टाचार दूर, बस मन में यही समाया है।६।


रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

सोरठा - दोहा गीत - संजीव वर्मा 'सलिल'

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संजीव वर्मा 'सलिल'


सोरठा - दोहा गीत 
संबंधों की नाव 
*
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही। 
अनचाहा अलगाव,
नदी-नाव-पतवार में।। 
*
स्नेह-सरोवर सूखते,
बाकी गन्दी कीच। 
राजहंस परित्यक्त हैं,
पूजते कौए नीच।।
नहीं झील का चाव,
सिसक रहे पोखर दुखी।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
कुएँ - बावली में नहीं,
शेष रहा विश्वास। 
निर्झर आवारा हुआ,
भटके ले निश्वास।।
घाट घात कर मौन,
दादुर - पीड़ा अनकही। 
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
ताल - तलैया से जुदा,
देकर तीन तलाक। 
जलप्लावन ने कर दिया,
चैनो - अमन हलाक।।
गिरि खोदे, वन काट 
मानव ने आफत गही। 
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।। 
***



आदरणीय संजीव वर्मा सलिल जी पिंगलीय छंदों पर बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उपरोक्त गीत उन की श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। प्रायोगिक तौर पर सलिल जी ने दोहा और सोरठा के शिल्प को इस्तेमाल करते हुये दोहा-सोरठा गीत रचा है।

बरवै गीत - प्रमोद वाजपेयी

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प्रमोद वाजपेयी


क्या फागुन की मस्ती, क्या उल्लास।
अपने घर तो सावन – बारह मास॥

बरसे मधु पर कैसे खेलें फाग।
सुलग रही बिरहा की तन में आग।
बुझे न खारे पानी से यह प्यास॥
अपने घर तो सावन बारह मास॥

पिया गये परदेस न देते धीर।
कौन हरे इस व्याकुल मन की पीर।
टूटी सब उम्मीदें हर विश्वास॥

प्रमोद वाजपेयी
9899035885

कवि ने यह बरवै-गीत एक प्रयोग के बतौर रचा है


गीत - बाढ़ का दर्द - सन्तोष कुमार सिंह

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सन्तोष कुमार सिंह 

ले चल प्रियतम अब हमको भी, दूर कहीं अति दूर.
नदी आज बनकर आयी है, क्रूर बहुत ही क्रूर
धीरे-थीरे अँधियारे में, यह घर में घुस आई.
डूबा राशन, बर्तन, खटिया, डूबीं सभी रजाई.
प्राण बचाने कब तक छतपर, बैठेंगे मजबूर......
ले चल............
मील पचासों दीख रहा है, प्रियतम जल ही जल है.
यह तो बाढ़ नहीं लगती है, लगती क्रूर प्रलय है.
चुन्नू-मुन्नू भूखे इस छत, उस छत अल्लानूर.
ले चल प्रियतम.............
बाहर पानी, भीतर पानी, ऊपर बादल बरसे.
भैंस खड़ी पानी में भूखी, चारे को है तरसे.
इस पानी से हार गये हैं, बड़े-बड़े भी सूर.
ले चल प्रियतम.............
इस घर में ही मैंने छेड़े. हिय में हुलस तराने.
जीवन भर ही हमने- तुमने, गाये मंगल गाने.
जान बची तो लाखों पायें, छोड़ो इसे हुजूर.
ले चल प्रियतम.............
डूब गई सब फसल हमारी, अब कैसे उबरेंगे.
जान बची तो किसी शहर में, मजदूरी कर लेंगे.
सुधि लेने सरकार हमारी, कब होगी मजबूर.
ले चल प्रियतम..............


सन्तोष कुमार सिंह

9456882131

दो गीत - अभिलाष



इतनी शक्ति हमें देना दातामन का विश्वास कमज़ोर हो न
हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न..

हर तरफ़ ज़ुल्म हैबेबसी हैसहमा सहमा-सा हर आदमी है
पाप का बोझ बढता ही जायेजाने कैसे ये धरती थमी है
बोझ ममता का तू ये उठा लेतेरी रचना का ये अँत हो न ... हम चलें नेक...

दूर अज्ञान के हों अँधेरेतू हमें ज्ञान की रौशनी दे
हर बुराई से बचते रहें हमजितनी भी दे भली ज़िन्दग़ी दे
बैर हो नकिसी का किसी से. भावना मन में बदले की हो न ... हम चलें नेक...

हम न सोचें हमें क्या मिला हैहम ये सोचें किया क्या है अर्पण
फूल खुशियों के बाँटें सभी को सबका जीवन ही बन जाये मधुबन
अपनी करुणा का जल तू बहाकरकरदे पावन हरेक मन का कोना ... हम चलें नेक...

हम अँधेरे मे हैं रौशनी देखो न दें खुद को ही दुश्मनी से
हम सज़ा पायें अपने किये कीमौत भी हो तो सह लें खुशी से
कल जो गुज़रा है फिर से न गुज़रेआनेवाला वो कल ऐसा हो न ... हम चलें नेक...




संसार है इक नदियादुःख-सुख दो किनारे हैं
न जाने कहाँ जाएँहम बहते धारे हैं

चलते हुए जीवन कीरफ़्तार में इक लय है
इक राग में इक सुर मेंसँसार की हर शय है
इक तार पे गर्दिश मेंये चाँद सितारे हैं

धरती पे अम्बर की आँखों से बरसती है
इक रोज़ यही बूँदेंफिर बादल बनती हैं
इस बनने बिगड़ने के दस्तूर में सारे हैं

कोई भी किसी के लिएअपना न पराया है
रिस्श्ते के उजाले मेंहर आदमी साया है
कुदरत के भी देखो तोये खेल पुराने हैं

है कौन वो दुनिया मेंन पाप किया जिसने
बिन उलझे काँतों सेहैं फूल चुने किसने
बे-दाग नहीं कोईयहाँ पापी सारे हैं


दो गीत - किशन सरोज

0581 541004

कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित
सब तुम्हारे पत्रसारे चित्रतुम निश्चिन्त रहना

धुंध डूबी घाटियों के इंद्रधनु तुम
छू गए नत भाल पर्वत हो गया मन
बूंद भर जल बन गया पूरा समंदर
पा तुम्हारा दुख तथागत हो गया मन
अश्रु जन्मा गीत कमलों से सुवासित
यह नदी होगी नहीं अपवित्रतुम निश्चिन्त रहना

दूर हूँ तुमसे न अब बातें उठें
मैं स्वयं रंगीन दर्पण तोड़ आया
वह नगरवे राजपथवे चौंक-गलियाँ
हाथ अंतिम बार सबको जोड़ आया
थे हमारे प्यार से जो-जो सुपरिचित
छोड़ आया वे पुराने मित्रतुम निश्चिंत रहना

लो विसर्जन आज वासंती छुअन का
साथ बीने सीप-शंखों का विसर्जन
गुँथ न पाए कनुप्रिया के कुंतलों में
उन अभागे मोर पंखों का विसर्जन
उस कथा का जो न हो पाई प्रकाशित
मर चुका है एक-एक चरित्रतुम निश्चिंत रहना




धर गये मेंहदी रचे दो हाथ
जल में दीप
जन्म जन्मों ताल सा हिलता रहा मन

बांचते हम रह गये अन्तर्कथा
स्वर्णकेशा गीतवधुओं की व्यथा
ले गया चुनकर कमल कोई हठी युवराज
देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन

जंगलों का दुखतटों की त्रासदी
भूल, सुख से सो गयी कोई नदी
थक गयी लड़ती हवाओं से अभागी नाव
और झीने पाल सा हिलता रहा मन

तुम गये क्या, जग हुआ अंधा कुँआ
रेल छूटी, रह गया केवल धुँआ
गुनगुनाते हम, भरी आँखों फिरे सब रात
हाथ के रूमाल सा हिलता रहा मन
सौजन्य : मोहनान्शु रचित

गीत - बात की बात में क्या हुआ है हमैं - मोनी गोपाल ‘तपिश

बात की बात में क्या हुआ है हमैं 
शब्द धन चुक गया  - साँस अवरूद्ध है !

शहर सम्बन्ध का - तोड़ता ही रहा 
भाव से भाव मन - जोड़ता ही रहा 
नेह की आस मन - में समोए रहे 
प्रीत का ये नमन - ये चलन शुद्ध है !

कितने क़िस्से कहे - कितनी बातें बनीं 
गान तो थे पुरातन - नई धुन चुनीँ 
चाँदनी की तरह - हम सरसते रहे 
सूर्य हमसे इसी - बात पर क्रुद्ध है !

कितनी टूटन सही - कितने ताने सहे 
नेह की छॉंव से - हम अजाने रहे 
फिर किसी पीर ने हमको समझा दिया 
नेह ही कृष्ण है - नेह हीं बुद्ध है !

हाकिम आज निवाले देंगे - बृजेश नीरज

गाँव-नगर में हुई मुनादी
हाकिम आज निवाले देंगे

सूख गयी आशा की खेती
घर-आँगन अँधियारा बोती
छप्पर से भी फूस झर रहा
द्वार खड़ी कुतिया है रोती

जिन आँखों की ज्योति गई है
उनको आज दियाले देंगे

सर्द हवाएँ देह खँगालें
तपन सूर्य की माँस जारती
गुदड़ी में लिपटी रातें भी
इस मन को बस आह बाँटती

आस-भरे पसरे हाथों को 
मस्जिद और शिवाले देंगे

चूल्हे हैं अब राख झाड़ते
बासन भी सब चमक रहे हैं
हरियाई सी एक लता है
फूल कहीं पर महक रहे हैं

मासूमों को पता नहीं है
वादे और हवाले देंगे 

नये साल की धूप - सौरभ पाण्डेय

नये साल की धूप
===========
आँखों के गमलों में
गेंदे आने को हैं
नये साल की धूप तनिक
तुम लेते आना.. .

ये आये तब
प्रीत पलों में जब करवट है
धुआँ भरा है अहसासों में
गुम आहट है
फिर भी देखो
एक झिझकती कोशिश तो की !
भले अधिक मत खुलना
तुम, पर
कुछ सुन जाना.. .
नये साल की धूप तनिक
तुम लेते आना.. .

संवादों में--
यहाँ-वहाँ की ; मौसम ; नारे..
निभते हैं
टेबुल-मैनर में रिश्ते सारे
रौशनदानी
कहाँ कभी एसी-कमरों में ?
बिजली गुल है,
खिड़की-पल्ले तनिक हटाना.. .
नये साल की धूप तनिक
तुम लेते आना.. .

अच्छा कहना
बुरी तुम्हें क्या बात लगी थी
अपने हिस्से
बोलो फिर क्यों ओस जमी थी ?
आँखों को तुम
और मुखर कर नम कर देना
इसी बहाने होंठ हिलें तो
सब कह जाना..
नये साल की धूप तनिक
तुम लेते आना.. .
*********

-- सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद 

एक नवगीत - सौरभ पाण्डेय

पीपल-बरगद
नीम-कनैले
सबकी अपनी-अपनी छाजन !
कैसे रिश्ते, कैसे बन्धन..

लटके पर्दे से लाचारी
आँगन-चूल्हा
दोनों भारी
कठवत सूखा बिन पानी के
पर उम्मीदें
लेती परथन !
कैसे रिश्ते, कैसे बन्धन..

खिड़की अंधी
साँकल बहरा
दीप बिना ही
तुलसी चौरा
गुमसुम देव शिवाला थामें
आज पराये
कातिक-अगहन !
कैसे रिश्ते, कैसे बन्धन..

कोने-कोने
छाया कुहरा
सूरज रह-रह घबरा-घबरा--
अपने हिस्से के आँगन में
टुक-टुक ताके
औंधे बरतन..
कैसे रिश्ते, कैसे बन्धन..

छागल अलता
कोर सुनहरी
काजल-सेनुर, बातें गहरी
चुभती चूड़ी याद हुई फिर
देख रुआँसा
दरका दरपन !
कैसे रिश्ते, कैसे बन्धन..
*****************************

:- सौरभ पाण्डेय

शब्दार्थ -

छाजन - छप्पर, छाया ; कठवत - कठौता, आटा गूँधने के लिए बरतन ; परथन - रोटी बेलते समय प्रयुक्त सूखा आटा ; थामना - सँभालना, निगरानी करना ; टुक-टुक ताकना - निरुपाय हो अपलक देखना ; कातिक-अगहन - कार्तिक और अग्रहण मास ; छागल - पायल ; सेनुर - सिन्दूर ;