6 August 2016

अँधेरा शब-ढले आराम फ़रमाता नहीं है क्यों - नवीन

अँधेरा शब-ढले आराम फ़रमाता नहीं है क्यों।
मेरी दुनिया में तेरा आफ़ताब आता नहीं है क्यों॥
न जाने कब से तेरी गोद में रक्खा है मेरा सर।
पिता बन कर तू मेरे सर को सहलाता नहीं है क्यों॥
मैं बच्चा हूँ तो जाहिर है बिनटना काम है मेरा।
ये तुझ पर फ़र्ज़ है तू मुझ को बहलाता नहीं है क्यों॥
अरे उलझाने वाले और अब उलझायेगा कितना।
तू अपनी जुल्फों की गुरगाँठ सुलझाता नहीं है क्यों॥
कुसूर उस का है लेकिन आज ये मैं तुझ से पूछूँगा।
वो मेरा भाई मेरे जैसा बन पाता नहीं है क्यों॥
हम आँसू हैं तो आँखों से टपकते क्यों नहीं आख़िर।
हमारा जन्म लेना काम कुछ आता नहीं है क्यों॥
नवीन’ उस आसमाँ से इस ज़मीं तक तू ही तू है तो।
मेरे मौला ग़रीबों पर तरस खाता नहीं है क्यों॥
नवीन सी. चतुर्वेदी
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222


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प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

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