निशाँ पाया,.....न कोई छोर निकला - सालिम शुजा अन्सारी
हों लाख बरहम हवाएँ लेकिन चिराग़ दिल का बुझा नहीं है - मुमताज़ नाजाँ
इसी ख़ातिर तो उसकी आरती हमने उतारी है - मयंक अवस्थी
ब्रज-गजल - अबू उभरै तौ है हिय में, गिरा के रूठवे कौ डर - नवीन
ब्रज-गजल - बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर - उर्मिला माधव
कहूँ जो ब्यार चल बाजी, घट'न के रूठबे कौ डर
रहै हर दम करेजे में,वतन के रूठबे कौ डर
ऑ जाऊ पै लगौ रहबै,सब'न के रूठबे कौ डर
कहूँ नैक'उ कमी रह गई,बहन के रूठबे कौ डर,
तनिक भी चूक है गई तौ सजन के रूठबे कौ डर...
उर्मिला माधव...
उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं - नवीन
दिल-नशीं के दिल को कमतर आँकना अच्छा नहीं॥
जिस की आँखों में हमारे ही हमारे ख़ाब हों।
उस की पलकों पर उदासी टाँकना अच्छा नहीं॥
उस की ख़ामोशी को भी सुनना, समझना चाहिये।
हर घड़ी बस अपनी-अपनी हाँकना अच्छा नहीं॥
एक दिन दिल ने कहा जा ढाँक ले अपने गुनाह।
हम ने सोचा आईनों को ढाँकना अच्छा नहीं॥
प्यार तो अमरित है उस के रस का रस लीजै 'नवीन'।
बैद की बूटी समझ कर फाँकना अच्छा नहीं॥
लपेट कर रखे हैं मुख,चढ़ा रखे हैं आवरण - राजकुमार कोरी "राज़"
कमाल कर रहा है लोकतंत्र का वशीकरण
कमाल कर रहा है लोकतंत्र का वशीकरण
लगाव है, न प्रेम है , हृदय में हैं ,समीकरण
रुला रहा है देश को, ये वोट का ध्रुवीकरण
हरेक चाहता है बस, महापुरुष का अवतरण
दशा बड़ी विचित्र है , न सूझता निराकरण
डरे तिमिर जहाँ उठे ये सूर्य की प्रथम किरण
खिले हुए ये पुष्प हैं बहार के उदाहरण।
ये भाव अब निःशब्द हैं कि रो पड़ी है व्याकरण
चार ग़ज़लें - अजीत शर्मा 'आकाश'

भैया अपनी ब्रजभासा की हालत अच्छी नाँय - नवीन
फ़लक है सुर्ख़ मगर आफ़ताब काला है - मयंक अवस्थी
फ़लक है सुर्ख़ मगर आफ़ताब
काला है
अन्धेरा है कि मिरे शहर में
उजाला है
चमन मे आज भी किरदार दो ही
मिलते हैं
है एक साँप,तो
इक साँप का निवाला है
शबे-सफ़र तो इसी आस पर
बितानी है
अजल के मोड़ के आगे बहुत
उजाला है.
जहाँ ख़ुलूस ने खायी शिकस्त
दुनिया से
वहीं जुनून ने उठ कर मुझे
सम्भाला है
उसे यकीन है दरिया पलट के
आयेगा
किनारे बैठ के कंकर जभी
उछाला है
वो डस रहा है ये शिकवा करें
तो किससे करें
हमीं ने साँप अगर आस्तीं में
पाला है
वही ज़ुबान पे लिपटा है और
वही दिल पे
किसी का नाम मिरी ज़िन्दगी पे
छाला है
मै उस जुनून की सरहद पे हूँ
जहाँ शायद
वो फिर से तूर का जलवा
दिखाने वाला है
अज़ल अबद की हदो में सिमट
गया हूँ मैं
मेरे मकान के दोनों दरों पे
ताला है
मैं खो गया हूँ तेरे ख़्वाब
के तअक्कुब में
बस एक जिस्म मेरा आख़िरी
हवाला है
मयंक अवस्थी 08765213905
बहरे मुजतस मुसमन मख़बून
महज़ूफ
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन
मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22




