19 August 2016

दोहे - राजपाल सिंह गुलिया

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नयनों में धनवान के , जब जब उतरा खून !
   नजर मिलाते हो गया , अंधा  ये  कानून !

ठगिनी माया को कहें , कलयुग के अवधूत !
   उनके ही आसन तले , माया मिली अकूत !

भरे पेट को रोज ही , लगते छप्पन भोग !
   लड़कर कितने भूख से , सो जाते हैं लोग !

मतलब जब तक मन बसा , मीठा था वो नीम !
   रोग   कटा  तो   देख    लो , बैरी हुआ हकीम !

ये तो तनिक मजाक था , बुरा गए क्यों मान !
   चतुराई   से   लोग     अब , करते हैं अपमान !

मुकर गए जब बात से , राजा संग वजीर !
   हाल  देख   रोने   लगी , पत्थर पड़ी लकीर !

दर्शक बन करता रहा , लम्बी चौड़ी बात !
   उतरा   जब  मैदान में , पता चली औकात !

सोन चिड़ी को नोचकर , चले बेढ़बी चाल !
  थाती    धरें   विदेश   में , भारत माँ के लाल !

निराधार आरोप पर , बात बढ़ाए कौन !
     सबसे अच्छा झूठ का , उत्तर है बस मौन !

माधव के दरबार में , कैसा ये अंधेर !
         अंधों के हाथों लगे , देखो आज बटेर !

जग में जो सबकी सुने , फिर मन की ले मान !
      उस जन का होता सदा लोगों में गुणगान !

सब के सिर है आ चढ़ा , आज नशे का भूत !
      बाप  अहाते  में  पड़ा , पब में थिरके पूत !

पोरस की बातें सुनी , गया सिकंदर जान !
     नहीं  टूटता  शक्ति से ,  जन का स्वाभिमान !

गंगा मैली देखकर , उभरा यही सवाल !
      आज भगीरथ देखते , होता बहुत मलाल !
     


राजपाल सिंह गुलिया 
9416272973

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