થોડું મોં પર હાસ્ય ધરો તો સારું લાગે,
અમને એ તો બિરયાની પર કાજુ લાગે.
અંગત બાબતના ઉત્તર સાચા ના આપ્યાં,
એનું જીવન અઘરું એક પલાખું લાગે.
થોડું મોં પર હાસ્ય ધરો તો સારું લાગે,
અમને એ તો બિરયાની પર કાજુ લાગે.
અંગત બાબતના ઉત્તર સાચા ના આપ્યાં,
એનું જીવન અઘરું એક પલાખું લાગે.
नमस्कार,
हिन्दी माह, हिन्दी पखवाड़े, हिन्दी सप्ताह और हिन्दी दिवसों को मनाने वाले इस कालखण्ड में हमने हिन्दी गजलों के साथ उर्दू, संस्कृत, अवधी, ब्रजभाषा और राजस्थानी गजलों का भी समावेश किया है. शंका न हो इसलिए स्पष्ट कर दें कि हम केवल देवनागरी में लिखे होने के कारण किसी गजल को हिन्दी गजल नहीं मानते. अनेक आकर्षणों से सुसज्जित इस नवीनाद्यतन के साथ हम पुनः उपस्थित हैं. विभिन्न भाषाओं की स्वीकार्य, सम्भाव्य एवं रुचिकर विविध विधाओं के प्रकाशन के लिए समर्पित वेबपोर्टल साहित्यम के सद्याद्यतन में निम्नलिखित कृतियों का समावेश किया गया है.
फोटो एलबम के पन्ने पलटते-पलटते एक पुरानी, धुँधली सी तस्वीर उभर आई। देखते ही आवाज़ आई, “नाना जी, ये घर हमारा ही है न? बँटवारे से पहले वाला?”
महाभारत का युद्ध जीतने के बाद एकदिन कृष्ण ने अर्जुन से कहा, ‘हे पार्थ! तुम अच्छे योद्धा हो. अब मुझसे गीता सुनने के बाद, विद्वान भी हो गये हो. मेरा मन है कि तुम आचार्य अतरंगी के पास जाओ और उन्हें शास्त्रार्थ में हरा कर आओ!’
(संस्कृत गज्जलिका भावानुवाद सहिता)
वञ्चनारीतेःकृतं केन कदा
सम्पादनम्
नीयते हृदयं समोदं दीयते
सन्तापनम्
रीति यह किसने चलाई और कबसे
बोल तो
मुस्कुराते दिल को लेकर भेंट करना पीर को
अविश्वास का कोई कारण नहीं,
कभी बोलता झूठ दर्पण नहीं।
जो शंकालु है ही स्वभाव आपका,
तो इस रोग का है निवारण नहीं
इस बात को लेकर दुखी है इन दिनों अन्तःकरण
उसकी बहुत अवहेलना करने लगा है आचरण
गम्भीरता संलग्नता प्रतिबद्धता जिनमें नहीं
वे आजकल आदर्श हैं, वे आजकल हैं उद्धरण
दो पाटन के बीच...
वो औरतें जो जबरदस्ती
घर में घुस आयीं घुसपैठियों
की तरह
" मैं तुलसी तेरे आंगन
की तर्ज पर "
उन औरतों को सबसे मिली
उपेक्षा
उनका दावा था इस उपेक्षा की चादर को
कौनसी बातन पै इतरायौ भयौ ऐ
बाबरौ इनसान भरमायौ भयौ ऐ
हाऊँ-फाऊँ कर रह्यौ ऐ चार
लँग कूँ
झूठ की दुनिया पै बौरायौ भयौ ऐ
बदला बहुत जबाना, अबहीं कहब त कहब्या
केउ का न कुछ ठेकाना, अबहीं कहब त कहब्या
एतनी उमिर क बाटीं अब्बउ ठसक उहइ बा
बूढ़ा चलइँ उताना,अबहीं कहब त कहब्या
खूपच हलके वाटत आहे आता आयुष्या
(काढलास
तू नक्की कुठला काटा आयुष्या?)
बघतो आहे नवीन घर आता
माझ्यासाठी
तुला किती लागणार आहे जागा आयुष्या ?
शाम ए हिज्र, पुरवाई, और फिर ये तन्हाई
जान ओ दिल पे बन आई और फिर ये तन्हाई
वक़्त ने ली अँगड़ाई, और फिर ये तन्हाई
हो न जाये रुस्वाई, और फिर ये तन्हाई
सुनो ऐ हमनवा मेरी
तिजारत का ज़माना है
यहाँ हर ख़ास दिन ब्यौपार का
इक आम हिस्सा है
वगरना इस ज़माने में
मोहब्बत कौन करता है
मम्मी…. मम्मी... पापा कहां है। बैठे होंगे अपने पियक्कड़ दोस्तों के बीच। क्या हुआ? कमला ने पूछा।मम्मी तुम्हारा लाडला राकेश हरिद्वार के अस्पताल में भर्ती है उसके दोस्त का फोन आया है। यह कब गया? कौन से पाप धोने गया है? कमला धीरे से बोली बेटा,
गणपति महोत्सव की ढेर सारी बधाइयाँ. विगताद्यतन को आप सभी से मिले उत्साहवर्धक प्रतिसाद से प्रेरित हो कर हम नवीनाद्यतन के साथ पुनः उपस्थित हैं. विभिन्न भाषाओं की स्वीकार्य, सम्भाव्य एवं रुचिकर विविध विधाओं के प्रकाशन के लिए समर्पित वेबपोर्टल साहित्यम के सद्याद्यतन में निम्नलिखित कृतियों का समावेश किया गया है.
तेरे होते हुए तेरी कमी में
कहूँ क्या लुत्फ़ क्या था तिश्नगी में
करेंगे याद साअत हिज्र की हम
बजेगा एक अब जब भी घड़ी में
डाग कुणाला लागत नाही कुठल्याही बेमानीचा
आजकालचे जगणे म्हणजे धंदा
हातचलाखीचा
काही प्रेषित
शांतीसाठी चर्चा करायला गेले
येउ घातला आहे म्हणजे भीषण काळ लढाईचा
પથ્થર ને દેવ માની, બહુધા નમી ગયો છું .
લઈ રામ નામ દિલથી, સાચે તરી ગયો છું
એવું નથી ઓ ઈશ્વર આજે ડરી ગયો છું
વ્યથાઓ વ્યક્ત કરતાં, હા! કરગરી ગયો છું
रहे रेडियो के हम श्रोता, बड़े प्रेम से सुनते थे
फिल्मी गीतों को सुन-सुन कर, स्वर्णिम सपने बुनते थे
रहे रेडियो के हम श्रोता, बड़े प्रेम से सुनते थे
इक दिन तुम पर गीत लिखूंगा
तुमको मन का मीत
लिखूंगा
सांसें बंसी
की पुरवाई
तन में मुरकी की
अंगड़ाई
पग-पग में ज्यों बजे पखावज
स्वर खां साहब की शहनाई
शादी की मौसम गर्माया हुआ है. बैंड-बाजा-बारात के धंधे के आगे अन्य हर धंधा मंदा पड़ गया है. शहर की सडकों पर बारातियों के झुंड के झुंड टिड्डी दल की तरह उमड़ पड़े हैं. गलियों के ऊपर शामियाने तने हुए हैं. बारातों से अवरुद्ध सड़कें ज़ुकाम के प्रकोप से बंद नाक की तरह न अनुलोम के लायक रह गई हैं ना विलोम के. घंटों पहले घर से निकली गृहस्वामिनी
मेरे फ़र्दा में बड़ी दूर तलक बनती है
मेरी बीनाई से कोहरे की सड़क
बनती है
पहले मिट्टी से बनाती है
पसीना मेहनत
फिर पसीने से ही मिट्टी में महक बनती है
हुनर किसीको जीने का सिखा रही है ज़िन्दगी
कहीं किसी को ख़ाक में मिला
रही है ज़िन्दगी
मसर्रतों से भी
कभी तो रू -ब -रू करे हमें
फक़त हसीन ख़्वाब क्यों दिखा रही है ज़िन्दगी
ख़ुशबू है सहमी सहमी सी, गुल भी उदास है
गुम है किसी ख़याल में लड़की
उदास है
दो चार पल ठहर के जो बादल
चले गए
बारिश के इंतज़ार में मिट्टी उदास है