फ़रार / साहिर लुधियानवी

अपने माज़ी के[1] तसव्वुर से[2] हिरासां[3]हूँ मैं 
अपने गुज़रे हुए ऐयाम से[4] नफरत है मुझे

अपनी बेकार तमन्नाओं पे शर्मिंदा हूँ 

अपनी बेसूद[5] उम्मीदों पे नदामत है मुझे 

मेरे माज़ी को अँधेरे में दबा रहने दो 

मेरा माज़ी मेरी ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं
मेरी उम्मीदों का हासिल, मिरी काविश[6] का सिला 
एक बेनाम अज़ीयत के[7] सिवा कुछ भी नहीं

कितनी बेकार उम्मीदों का सहारा लेकर
मैंने ऐवान[8] सजाए थे किसी की खातिर

कितनी बेरब्त[9] तमन्नाओं के मुबहम ख़ाके[10]
अपने ख़्वाबों में बसाए थे किसी की ख़ातिर 


मुझसे अब मेरी मोहब्बत के फ़साने[11] न कहो 

मुझको कहने दो कि मैंने उन्हें चाहा ही नहीं

और वो मस्त निगाहें जो मुझे भूल गईं 
मैंने उन मस्त निगाहों को सराहा ही नहीं 


मुझको कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूँ 

इश्क़ नाकाम सही – ज़िन्दगी नाकाम नहीं 

उन्हें अपनाने की ख्वाहिश, उन्हें पाने की तलब
शौक़े-बेकार[12] सही, सअइ-ए-ग़म-अंजाम[13] नहीं 


वही गेसू[14], वही नज़रें, वही आरिज़[15], वही जिस्म 

मैं जो चाहूं तो मुझे और भी मिल सकते हैं 

वो कंवल जिनको कभी उनके लिए खिलना था 
उनकी नज़रों से बहुत दूर भी खिल सकते हैं


शब्दार्थ:
1.      भूतकाल के
2.      कल्पना से
3.      भयभीत
4.      दिनों से
5.      व्यर्थ
6.      प्रयत्न का
7.      कष्ट के
8.      महल
9.      असंगत
10.  अस्पष्ट चित्र
11.  कहानियां
12.  बेकार शौक़
13.  दुखांत चेष्टा
14.  केश
15.  कपोल


कविता कोश से साभार 

हाइकु - शशि पाधा

पङ्किल झील
नील-श्वेत पङ्कज
गुणी सन्तान

http://hindihaiku.wordpress.com/ से साभार 

हिवड़ो रंगियो प्रीत सूं - राजेन्द्र स्वर्णकार

मदन हिलोरा लेंवतो , सज’ सोळै सिणगार !
आयो म्हारै देश में , होळी रौ त्यौंहार !!

मेरे देश में प्रणय-हिचकोलों से तरंगित , सोलह शृंगार से सुसज्जित  होली का त्यौंहार आया है ।

तनड़ो तरसै परस नैं , प्रीत करै मनवार !
आवो प्यारा पीवजी , सांवरिया सिरदार !!

देह स्पर्श को तरस रही है , प्रीत मनुहार कर रही है । हे सांवरे सरताज , प्रिय प्रियतम !
आपका स्वागत है… आइए !

होळी खेलण’ मिस गयो , कान्हो राधा-द्वार !
धरती सूं आभो मिळ्यो , स्रिष्टी सूं करतार !!

होली खेलने के बहाने कन्हैया राधा के द्वार पर पहुंचे …
मानो धरा से गगन का और सृष्टि से विधाता का मिलन हुआ … ।

बाथां में कान्हो भर्’यो ; राधा हुई निहाल !
झिरमिर बरसी प्रीतड़ी , आभै रची गुलाल !!

कृष्ण कन्हैया ने बाहों में भरा तो राधिका निहाल हो गई ।
रिमझिम प्रीत बरसने लगी , आकाश में गुलाल रच गई ।

भींजी राधा प्रीत में , कान्है रै अंग लाग’ !
रूं-रूं गावण लागग्यो , सरस बसंती राग !!

कन्हैया के अंग से लग कर राधा प्रीत में भीग गई ।
रोम रोम से सुमधुर बसंती राग की स्वर लहरियां प्रस्फुटित हो उठीं ।

मन भींज्यो , तन भींजग्यो , गई आतमा भींज !
नैण मिळ्या जद नैण सूं , मुळक’ हरख’ अर रींझ’ !!

मुस्कुरा कर , हर्षित नयन जब नयन से मिलन में रींझ गए, …तो
मन भीग गया , देह भीग गई , प्राण कैसे अछूते रहते … आत्मा भी भीग गई ।

फूलगुलाबी सांवरो अर राधाजी श्याम !
मोवै युगल सुहावणा , सुंदर ललित ललाम !!

रंग रंग कर नीलवर्ण कन्हैया गुलाबी और गौरवर्ण राधाजी सांवले रंग के दृष्टिगत हो रहे हैं ।
यह सुंदर , लावण्यमयी , सुहावनी  युगल छवि मोहित कर रही है ।

हिवड़ो रंगियो प्रीत सूं , छिब सूं रंगिया नैण !
होठ होठ सूं रंग दिया , कर’ चतराई सैण !!

चतुराई के साथ प्राणप्रिय साजन कान्हा ने हृदय को प्रीत से , नेत्रों को निज छवि से
और अधरों को स्वअधरों से रंग डाला ।

ओळ्यूं रंगदी काळजो , नैण रंग्या चितराम !
स्रिष्टी नैं विधना रंगी , अर राधा नैं श्याम !!

इधर वृषभान लली राधिका को  नंदनंदन कृष्ण ने रंगा कि
मधुर स्मृतियों-सुधियों से अंतःस्थल रंग गया । विविध लीला रूपों से चक्षु रंग गए ।
सृष्टि को साक्षात् विधाता ने रंग डाला …

चोवै राधा नांव रस , पीवै गोकुळ गांव !
बरसाणो छाकै अमी , सिंवर सलोणो श्याम !!

पूरे ब्रह्माण्ड में हो रही राधा राधा नाम की रस वर्षा का रसपान कर’
गोकुल गांव तृ्प्त हो रहा है ।
सलोने श्याम के सुमिरन से बरसाना गांव जी भर कर अमृत छक रहा है ।

भगती रंग जमुना बहै , रंग्या बाल-नर-नार !
रसभीनी राधा रट्यां , तूठै क्रिषण मुरार !!

भक्ति-रंग की बहती यमुना में बाल वृंद नर नारी रंग गए हैं ।
रसभीनी राधा राधा रटन से कृष्ण मुरारी की सहज कृपा अनुकंपा मिल जाती है 

जन्म के समय से ही नाजुक व नर्म-जान - नवीन

बड़ी मस्ती से जीता है, दिलों पे राज करता है
मसर्रत बाँटने वाले के दिल में ग़म नहीं होता
बुजुर्गों की नसीहत आज़ भी सौ फ़ीसदी सच है
मुहब्बत का ख़ज़ाना बाँटने से कम नहीं होता

सभा में शोर था - तहज़ीब को आख़िर हुआ है क्या
जहाँ भी जाओ बेशर्मी हमारा मुँह चिढाती है
तभी सब लड़कियों ने एक सुर में उठ के यूँ बोला
कि जो इनसान होते हैं उन्हीं को शर्म आती है

सादगी होती है मङ्गलसूत्र में
बन्दगी होती है मंगलसूत्र में
हर सुहागिन का यही कहना है बस
ज़िन्दगी होती है मङ्गलसूत्र में


जन्म के समय से ही नाजुक व नर्म-जान
सख़्त-जान दुनिया में ख़ामुशी के साथ है
दादा, नाना, पापा, भैया, अंकलों की लाड़ली ये
अगम अनादि काल से सभी के साथ है
सुनिये ‘नवीन’ मित्र प्रीत-रीत सहचरी
ख़ुशियों की धारा, ग़म की नदी के साथ है
अपनी हथेलियों में दुनिया समेटे हुये
आसमान वाली परी धरती के साथ है

नारी नर से यूँ बोली सुनें मेरे हमजोली
तन को नहीं तनिक मन को झुकाइये
हमने हमेशा आप की ख़ुशी को मान दिया
आप भी हमारे सङ्ग-सङ्ग मुस्कुराइये
नारी का हृदय तो है लबालब भरा हुआ -
अमृत कलश जब चाहे छलकाइये
यानि कि ‘नवीन’ शुद्ध-शास्वत सनेह-रस
बूँद भर डाल कर घूँट भर पाइये

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तन की मटुकिया में मन की मथनिया से
प्रीत नवनीत हेतु बतियाँ बिलो गया
प्यारी प्यारी बातें बोल ऐसा किया डाँवाडोल
पता ही नहीं चला कि दिल कब खो गया
रङ्ग नहीं पानी नहीं हाथ भी लगाया नहीं
फिर भी ‘नवीन’ अङ्ग-अङ्ग को भिगो गया
मेरी स्नेह सरिता में मुझी को ढकेल कर
ख़ुद तो उबर गया मुझ को डुबो गया

नवीन सी. चतुर्वेदी

आज वारिद रो रहे हैं - ज्ञानवती सक्सेना 'किरण'

आज वारिद रो रहे हैं !
कुटिल जग की कालिमा निज अश्रुजल से धो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !

देख कर संतप्त भू को पाप ज्वाला में सुलगते,
ह्रदय की सद्भावनाएँ वासनाओं में बदलते,
विकल होकर आज अपने धैर्य से च्युत हो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !

ध्वंस लीला नीतियों की बढ़ रही जो आज भू पर,
देख ताण्डव नृत्य अत्याचार का सब लोक ऊपर,
स्वयं होकर दुखित अपना आज आपा खो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !

बिलखते सुकुमार बालक कर रहे उनको विकल अति,
पीड़ितों की अश्रुधारा रुद्ध करती प्राण की गति,
सांत्वना के हेतु करूणा जल निरंतर ढो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !

आहत अनुबन्धों में उलझे - मदन मोहन 'अरविन्द'

आहत   अनुबन्धों   में  उलझे
कल  का  उपसंहार   मुबारक।
एक   बार  फिर  मेरे  प्रियतम
रंगों   का   त्यौहार   मुबारक।

चलो  बढ़ाओ   हाथउठालो
दुहरा  कर  लिखने का  बीड़ा।
किसी  द्रौपदी  के  आँचल पर
नये   महाभारत   की   पीड़ा।
कर्म  बोध  की शर शैया  पर
हम  तो  मर कर भी जी लेंगे।
दुःशासन    दे   अगर   तुम्हें
नवजीवन का  उपहार मुबारक।

धरती के सच को झुठला  कर
सपने   सजा  लिये  अम्बर में।
हो   बैठे  अपनों  की  खातिर
परदेसी   अपने  ही  घर   में।
थके-थके  से इस चौखट तक
जब आये  तुम लगे अतिथि से।
सहज   हुए  तो  आज  यहीं
गृहस्वामी सा  व्यवहार मुबारक।

अभी   और  इतिहास   बनेंगे
यह  अन्तिम   विस्तार नहीं है।
यही  आखिरी  जीत  नहीं  है
यही   आखिरी  हार  नहीं  है।
सोचो  कौन  जीत  कर  हारा
कौन  हार  कर  जीता  बाजी।
तुम्हें   तुम्हारी  जीत   मुबारक
हमें   हमारी   हार    मुबारक।

हाकिम आज निवाले देंगे - बृजेश नीरज

गाँव-नगर में हुई मुनादी
हाकिम आज निवाले देंगे

सूख गयी आशा की खेती
घर-आँगन अँधियारा बोती
छप्पर से भी फूस झर रहा
द्वार खड़ी कुतिया है रोती

जिन आँखों की ज्योति गई है
उनको आज दियाले देंगे

सर्द हवाएँ देह खँगालें
तपन सूर्य की माँस जारती
गुदड़ी में लिपटी रातें भी
इस मन को बस आह बाँटती

आस-भरे पसरे हाथों को 
मस्जिद और शिवाले देंगे

चूल्हे हैं अब राख झाड़ते
बासन भी सब चमक रहे हैं
हरियाई सी एक लता है
फूल कहीं पर महक रहे हैं

मासूमों को पता नहीं है
वादे और हवाले देंगे 

मैं वहम हूँ कि हक़ीक़त ये हाल देखने को - कृष्ण कुमार 'तूर'

मैं वहम हूँ कि हक़ीक़त ये हाल देखने को
गिरफ़्त होता हूँ अपना विसाल देखने को

चराग़ करता हूँ अपना हर एक अज़्वे-बदन
तरस गया हूँ ग़मे-ला-ज़वाल देखने को
अज़्वे-बदन - शरीर का भाग,  ग़मे-ला-ज़वाल - अमर दुख 

मैं आदमी हूँ कि पत्थर जवाब देते नहीं
चले हैं कोहे-निदा से सवाल देखने को
कोहे-निदा - आवाज़ का पहाड़

न शेर हैं न सताइश अजब ज़माना है
कहीं पे मिलता नहीं अब कमाल देखने को
सताइश - प्रशंसा

मैं ‘तूर‘ आख़िरी साअत का एक मंज़र हूँ
वो आ रहा है मुझे बे मिसाल देखने को
साअत - घड़ी, मंज़र - दृश्य

:- कृष्ण कुमार 'तूर'

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22

दिल में रहता है मगर ख़्वाब हुआ जाता है - आलम खुर्शीद

दिल में रहता है मगर ख़्वाब हुआ जाता है
वो भी अब सूरते-महताब हुआ जाता है

खाक उड़ती है हमेशा मिरे गुलज़ारों में
और सहरा कहीं शादाब हुआ जाता है

बे-सबब हम ने जलाई नहीं कश्ती अपनी
ये समुन्दर भी तो पायाब हुआ जाता है

एक हो जाएंगे शाहाने- ज़माना सारे
इक प्यादा जो ज़फ़रयाब हुआ जाता है

यह किसी आँख से टपका हुआ आँसू तो नहीं
कैसा क़तरा है कि सैलाब हुआ जाता है

कुछ दिए हम ने जलाए थे अँधेरे घर में
कोई तारा कोई महताब हुआ जाता है

चढ़ते दरिया में निकलता नहीं रस्ता आलम !
मेरा लश्कर है कि ग़र्काब हुआ जाता है 

बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
2122 1122 1122 22

आलम खुर्शीद

जिस को अपने बस में करना था उस से ही लड़ बैठा - नवीन

जिस को अपने बस में करना था उस से ही लड़ बैठा
सीधा मन्तर पढ़ते-पढ़ते उल्टा मन्तर पढ़ बैठा

वो ऐसा तस्वीर-नवाज़ कि जिस को मैं जँचता ही नहीं
और एक मैं, हर फ्रेम के अन्दर चित्र उसी का जड़ बैठा

ज्ञान लुटाने निकला था और झोली में भर लाया प्यार
मैं ऐसा रँगरेज़ हूँ जिस पे रङ्ग चुनर का चढ़ बैठा

परसों मैं बाज़ार गया था दरपन लेने की ख़ातिर
क्या बोलूँ दूकान पे ही मैं शर्म के मारे गड़ बैठा

बाकी बातें फिर कर लेङ्गे - आज ये गुत्थी सुलझा लें
धरती कङ्कड़ पर बैठी - या फिर - उस पर कङ्कड़ बैठा

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

दालान में कभी-कभी छत पर खड़ा हूँ मैं - सालिम सलीम

दालान में कभी-कभी छत पर खड़ा हूँ मैं
सायों के इंतिज़ार में शब भर खड़ा हूँ मैं

क्या हो गया कि बैठ गयी ख़ाक भी मेरी
क्या बात है कि अपने ही ऊपर खड़ा हूँ मैं

फैला हुआ है सामने सहरा-ए-बेकनार
आँखों में अपनी ले के समुन्दर खड़ा हूँ मैं
सहरा – रेगिस्तान, कनार – [समुद्र का] किनारा

सन्नाटा मेरे चारों तरफ़ है बिछा हुआ
बस दिल की धड़कनों को पकड़ कर खड़ा हूँ मैं

सोया हुआ है मुझ में कोई शख़्स आज रात
लगता है अपने जिस्म से बाहर खड़ा हूँ मैं

इक हाथ में है आईना-ए-ज़ात-ओ-कायनात
इक हाथ में लिये हुये पत्थर खड़ा हूँ मैं 


बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

 221 2121 1221 212

हाथ हमारे सब से ऊँचे, हाथों ही से गिला भी है - रईस फ़रोग़

हाथ हमारे सब से ऊँचे, हाथों ही से गिला भी है
घर ऐसे को सौंप दिया जो आग भी है और हवा भी है

अपनी अना का जाल किसी दिन पागल-पन में तोड़ूँगा
अपनी अना के जाल को मैं ने पागल-पन में बुना भी है

दिये के जलने और बुझने का भेद समझ में आये तो क्या
इसी हवा से जल भी रहा था इसी हवा से बुझा भी है

रौशनियों पर पाँव जमा के चलना हम को आये नहीं
वैसे दर-ए-ख़ुर्शीद तो हम पर गाहे-गाहे खुला भी है

दर्द की झिलमिल रौशनियों से बारह ख़्वाब की दूरी पर
हम ने देखी एक धनक जो शोला भी है सदा भी है

तेज़ हवा के साथ चला है ज़र्द मुसाफ़िर मौसम का
ओस ने दामन थाम लिया तो पल दो पल को रुका भी है

साहिल जैसी उम्र में हम से सागर ने इक बात न की
लहरों ने तो जाने का-क्या कहा भी है और सुना भी है

इश्क़ तो इक इल्ज़ाम है उस का वस्ल को तो बस नाम हुआ
वो आया था क़ातिल बन के क़त्ल ही कर के गया भी है 

रईस फ़रोग़

फिर विचारों पर सियासी रंग गहराने लगे, - अशोक रावत

फिर विचारों पर सियासी रंग गहराने लगे,
फिर छतों पर लाल-पीले ध्व ज नज़र आने लगे.

रंग पिछले इश्तलहारों के अभी उतरे नहीं,
फिर फ़सीलों पर नये नारे लिखे जाने लगे.

अंत में ख़ामोश होकर रह गए अख़बार भी,
साजि़शों में रहबरों के नाम जब आने लगे.

आज अपनी ही गली में से गुज़रते डर लगा,
आज अपने ही शहर के लोग अनजाने लगे.

जान पाए तब ही कोई पास में मारा गया,
जब पुलिसवाले उठाकर लाश ले जाने लगे.

हो गईं वीरान सड़कें और कर्फ़्यू लग गया,
फिर शहर के आसमॉं पर गिद्ध मॅंडराने लगे.

अशोक रावत