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नज़्म - मेरी माँ - अजय सहाब

 


ये मेरी माँ जो चला करती है लाठी लेकर

चाल में इसकी भी हिरनी सी लचक थी पहले

जिस्म से इसके अब आती है दवाओं की महक

जिस्म में इसके भी सन्दल सी महक थी पहले

नज़्म - सारिफ़ीयत (कंज्यूमरिज्म) – शाहिद लतीफ़

 


चराग़दान था, कन्दील थी, सुराही थी
दुलाईयाँ थीं, रजाई थी, चारपाई थी
एक इत्रदान था, एक पानदान, एक गुलदान
एक आफ़ताबा, नमकदान, एक दस्तर-ख़्वान

एक नज़्म़ पूना शहर के नाम – उद्धव महाजन ‘बिस्मिल’

 


इस जहाँ के सारे शहरों में बडा़ जाँबाज़ है,

तेरी ये तारीख़ सुनकर होता ये दिलसाज़ है,

हर हुनरवाले बशर पे होता  हमको नाज़ है,

सुन के शोहरत के फसाने होता ये दिलसाज़ है!

नज़्म - ख़त लिखा चाहत के साथ - गुलशन मदान

 

ख़त लिखा चाहत के साथ 

लेकिन कुछ शिद्दत के साथ

 

मां की हालत भी पतली है

बापू की हालत के साथ

नज़्म - रिश्वत – जोश मलीहाबादी

लोग हम  से रोज़ कहते हैं ये आदत छोड़िये
ये तिज़ारत है ख़िलाफ़ेआदमीयत – छोड़िये
इस से बदतर लत नहीं है कोई, ये लत छोड़िये
रोज़ अख़बारों में छपता है कि रिश्वत छोड़िये
भूल कर भी जो कोई लेता है रिश्वत – चोर है
आज क़ौमी पागलों में रात-दिन ये शोर है

किस को समझाएँ इसे खो देंगे तो फिर पाएँगे क्या
हम अगर रिश्वत नहीं लेंगे तो फिर खाएँगे क्या
क़ैद भी कर दें तो हम को राह पर लाएँगे क्या
यह जुनूनेइश्क़ के अंदाज़ छुट जाएँगे क्या
मुल्क़ भर को क़ैद कर दें किस के बस की बात है
ख़ैर से सब हैं कोई दो  चार दस की बात है

ये हवस ये चोर-बाज़ारी ये महँगाई ये भाव
राई की कीमत हो जब परबत तो क्यों आये न ताव
अपनी तनख़्वाहों के नालों में है पानी आध पाव
और लाखों टन की भारी अपने जीवन की है नाव
जब तलक रिश्वत न लें हम, दाल गल सकती नहीं
नाव तनख़्वाहों के नालों में तो चल सकती नहीं

ये है मिल वाला, वो बनिया और वो साहूकार है
ये है दूकाँदार वो है वैद्य वो अत्तार है
वो अगर ठग है तो वो डाकू है वो बटमार है
आज हर गर्दन में काली जीत का एक हार है
हैफ़, मुल्क़-ओ-क़ौम की ख़िदमत-गुज़ारी के लिये
रह गए हैं इक हमीं ईमानदारी के लिये

भूख के क़ानून में ईमानदारी ज़ुर्म है
और बे-ईमानियों पर शर्मसारी ज़ुर्म है
डाकुओं के दौर में परहेज़गारी ज़ुर्म है
जब हुकूमत ख़ाम हो तो पुख़्ताकारी ज़ुर्म है
लोग अटकाते हैं क्यों रोड़े हमारे काम में
जिस को देखो ख़ैर से नङ्गा है वो हम्माम में

देखिये जिस को दबाये है बगल में वो छुरा
फ़र्क़ क्या इस में कि मुजरिम सख़्त है या भुरभुरा
ग़म तो इस का है, ज़माना ही है कुछ-कुछ खुरदुरा
एक मुजरिम दूसरे मुजरिम को कहता है बुरा
हम को जो चाहें सो कह लें, हम तो रिश्वत खोर हैं
वाइज़-ओ-नासेह-ओ-मुसफ़िक अल्ला रक्खे चोर हैं

तोंद वालों की तो हो आईनादारी वाह वा
और हम भूखों के सर पे चाँदमारी वाह वा
उन की ख़ातिर सुब्ह होते ही नहारी वाह वा
और हम चाटा करें ईमानदारी वाह वा
सेठ जी तो खूब मोटर में हवा खाते फिरें
और हम सब जूतियाँ गलियों में चटखाते फिरें

इस गिरानी में भला क्या गुंच-ए-ईमाँ खिले
जौ के दाने सख़्त हैं ताँबे के सिक्के पिलपिले
जाएँ कपड़ों के लिये तो दाम सुन कर दिल हिले
जब गिरेबाँ ताबा दे कर आएँ तो कपड़ा मिले
जान भी दे दें तो सस्ते दाम मिल सकता नहीं

आदमीयत का कफ़न है दोस्तो कपड़ा नहीं 

:- जोश मलीहाबादी

नज़्म - ज़ियारत - अब्दुल अहद साज़




बहुत से लोग मुझ में मर चुके हैं------;
किसी की मौत को बारह बरस बीते
कुछ ऐसे हैं के तीस इक साल होने आए हैं
अब जिन की रेहलत को
इधर कुछ सान्हे ताज़ा भी हैं
हफ़्तों महीनों के

किसी की हादेसाती मौत
अचानक बेज़मीरी का नतीजा थी
बहुत से दब गए मलबे में
दीवार-ए-अना के आप ही अपनी
मरे कुछ राबेतों की ख़ुश्क साली में

कुछ ऐसे भी जिनको ज़िन्दा रखना चाहा मैंने
अपनी पलकों पर
मगर ख़ुद को जिन्होंने मेरी नज़रों से गिराकर
ख़ुदकुशी करली
बचा पाया न मैं कितनों को सारी कोशिशों पर भी
रहे बीमार मुद्दत तक मेरे बातिन के बिस्तर पर
बिलाख़िर फ़ौत हो बैठे

घरों में, दफ़्तरों में, मेहफिलों में, रास्तों पर
कितने क़बरिस्तान क़ाइम हैं

मैं जिन से रोज़ ही होकर गुज़रता हूँ
ज़ियारत चलते फिरते मक़बरों की रोज़ करता हूँ
अब्दुल अहद साज़

9833710207

नज़्म / कवितायें - मयङ्क अवस्थी



(एक नज़्म अपनी बहन प्रीति के नाम ..)
  
मेरे हक़ में वो इक शम्म: जलती रही
रोशनी मुझकों रातों में मिलती रही

रच रहे थे अँधेरे नई साजिशें
ज़ख्मे-दिल पर नमक की हुईं बारिशें
इस कदर था शिकंजे में मैं वक्त के
खुदकुशी कर रही थीं मेरी ख्वाहिशें

उन खिज़ाओं में नरगिस महकने लगी
एक लौ जगमगा कर कसकने लगी
मेरे ख्वाबों में फिर रंग भरते हुये
आँधियों के मुकाबिल दहकने लगी

मेरे हक मे वो इक शम्म: जलती रही
रोशनी मुझको रातों में मिलती रही

इक सियाही से लिपटी थी ये रहगुज़र
उसने मुझको उजाला दिया तासहर
कुछ अँधेरे निगल ही गये थे मुझे
मैं न होता कहीं, वो न होती अगर

जिस्म उसका जला जाँ पिघलती रही
कर्ब अपने बदन का निगलती रही
मोम के दिल में इक कच्चा धागा भी था
तंज़ सह कर हवाओं के जलती रही

मेरे हक में वो इक शम्म: जलती रही
रोशनी मुझको रातों में मिलती रही




आस्थाओं से सदा इस भाँति यदि लिपटे रहोगे,
लघु कथाओं के कथानक की तरह सिमटे रहोगे !!

पुष्प बन अर्पित हुये तो
पददलित बन त्यज्य होगे ,
गर बनो पाषाण अविचल
पूज्य बन स्तुत्य होगे !!
संशयों के शहर में , अफवाह बन जाओ नहीं तो,
अर्धसत्यों की तरह न लिखे हुये न मिटे रहोगे !!

लालसा की वेश्या को
स्वार्थ की मदिरा पिलाओ,
और मर्यादा सती को
हो सके तो भूल जाओ !!
मस्तरामो की तरह मदमस्त रहना चाहते हो ?!!
या विरागी हाथ में , आध्यात्म के चिमटे रहोगे !!!

जड़ सदा ही गुम रही
तारीफ फूलों की हुई है ,
फूल कहते हैं , हमारी
जड़ बड़ी ही जड़ रही है,
छन्द के उद्यान का वैभव तुम्हीं में शेष हो यदि,
मुक्त छन्दों की तरह विषबेल बन चिपटे रहोगे !!!




सृष्टि के संताप कितने हम रहे उर में छुपाये
ताप का वर्चस्व था लेकिन नही आँसू बहाये
गल न जाते थे क्षणिक सी ऊष्मा में हम समर की
हम न थे हिमशैल हम पाषाण थे

दृष्टिहीनों ने हमें अविचल कहा था , जड़ कहा था
यह नहीं देखा कि हम निर्लिप्त थे स्थिर अगर थे
दे रहे थे दिशा औ आधार हम ही निम्नगा को
पर नियति के खेल , हम पाषाण थे

वेदना अपनी सघन थी , ऊष्मा उर में बहुत थी
हम मनुज की तुष्टियों के प्रथम पोषक भी बने थे
दिख रहे अनगढ विभव था मूर्तियों का आत्मा में
हम न थे विष बेल हम पाषाण थे


मयंक अवस्थी ( 07897716173 & 08765213905)

तीन कविताएँ - आलम खुरशीद

कविता (१)
बदलता हुआ मञ्ज़र
आलम खुरशीद

मेरे सामने
झील की गहरी खमोशी फैली हुई है
बहुत दूर तक ........
नीले पानी में
कोई भी हलचल नहीं है
हवा जाने किस दश्त में खो गई है
हर शजर सर झुकाए हुए चुप खड़ा है
परिंदा किसी शाखे-गुल पर
न नग़मासरा है
न पत्ते किसी शाख पर झूमते हैं
हर इक सम्त खामोशियों का
अजब सा समाँ है
मेरे शहर में ऐसा मंज़र कहाँ है!!!

चलूँ !
ऐसे ख़ामोश मंज़र की तस्वीर ही
कैनवस पर उभारूँ
..............
........................
.............................
अभी तो फ़क़त ज़ेह्न में
एक खाका बना था
कि मंज़र अचानक बदल सा गया है
किसी पेड़ की शाख से
कोई फल टूट कर झील में गिर पड़ा है
बहुत दूर तक
पानिओं में
अजब खलबली सी मची है
हर इक मौज बिफरी हुई है .............


कविता (२)
नया खेल
*********
आलम खुरशीद
------------------------------------
पिंकी ! बबलू ! डब्लू ! राजू !
आओ खेलें !
खेल नया .

पिंकी ! तुम मम्मी बन जाओ !
इधर ज़मीं पर चित पड़ जाओ !
अपने कपड़ों,
अपने बालों को बिखरा लो !
आँखें बंद तो कर ले पगली !

डब्लू ! तुम पापा बन जाओ !
रंग लगा लो गर्दन पर !
इस टीले से टिक कर बैठो !
अपना सर पीछे लटका लो !
लेकिन आँखें खोल के रखना !

बब्ली ! तुम गुड़िया बन जाओ !
अपने हाथ में गुड्डा पकड़ो !
इस पत्थर पर आकर बैठो !
अपने पेट में काग़ज़ का
ये खंजर घोंपो !

राजू आओ !
हम तुम मिल कर गड्ढा खोदें !
मम्मी , पापा , गुड़िया तीनों
कई रात के जागे हैं
इस गड्ढे में सो जाएँगे !

भागो ! भागो !
जान बचाओ !
आग उगलने वाली गाड़ी
फिर आती है ...
इस झाड़ी में हम छुप जाएँ !
जान बची तो
कल खेलेंगे
बाक़ी खेल ....................!!

कविता ३
नया ख़्वाब
***********
आलम खुरशीद
***************
मैं यकीं से कह नहीं सकता
ये कोई ख़्वाब है या वाकिआ
जो अक्सर देखता हूँ मैं

मैं अक्सर देखता हूँ
अपने कमरे में हूँ
मैं बिखरा हुआ
इक तरफ़ कोने में
दोनों हाथ हैं फेंके हुए
दुसरे कोने में
टांगें हैं पड़ीं
बीच कमरे में गिरा है धड़ मिरा
इक तिपाई पर
सलीके से सजा है सर मिरा
मेरी आँखें झांकती हैं
मेज़ के शो केस से ...

ये मंज़र देखना
मेरा मुक़द्दर बन चूका है
मगर अब इन् मनाज़िर से
मुझे दहशत ही होती है
न वहशत का कोई आलम
मिरे दिल पर गुज़रता है
बड़े आराम से
यक्जा किया करता हूँ
मैं अपने जिस्म के टुकड़े
सलीके से इन्हें तर्तीब दे कर
केमिकल से जोड़ देता हूँ ....

न जाने क्यूं मगर
तर्तीब में
इक चूक होती है हमेशा
मेरी आँखें
जड़ी होती हैं
मेरी पीठ पर .....

आलम खुर्शीद
9835871919

अजीब मंज़र ए दिलकश है मुल्क के अंदर - अब्बा जान

अजीब मंज़र ए दिलकश है मुल्क के अंदर
उछल रहे हैं हर इक शाख पर कई "बन्दर"

है शहर शहर "चुनावों " की आज सरगर्मी
बलंदियों प है नेताओं की भी "बेशर्मी"

हया का नाम नहीं है "खबीस" चेहरों पर
चिपक रही है गिलाज़त "ग़लीस" चेहरों पर

गली गली में नज़र आ रहे हैं "आवारा"
ये पाँच सालों में हाज़िर हुए हैं दोबारा

भरे हुए हैं ये वादों के फूल झोली में
मिठास घोल के लाये हैं अपनी बोली में

खड़े हुए हैं भिखारी ये हाथ जोड़े हुए
हैं अपना दामन ए गैरत भी ये निचोड़े हुए

किसी के हाथ में "झाड़ू" , कोई "कमल" के साथ
किसी का "हाथी" तो कोई है "साइकल" के साथ

हिला रहा है कोई ज़ोर ज़ोर से "पंखा"
दिखा रहा है कोई नेता "हाथ का पंजा"

है कोई "राजकुंवर" और कोई है "शहजादा"
किसी का चाय का होटल किसी का है ढाबा

कोई है "सुर्ख" , कोई "सब्ज़" और कोई "नीला"
कोई "सफ़ेद" , कोई "केसरी" कोई "पीला"

तरह तरह के हैं झंडे सभी उठाये हुए
सफ़ेदपोश दरिंदे... हैं भनभनाये हुए

डरा रहे हैं ये इक दूसरे से वोटर को
लुभा रहे हैं ये पैसे रुपए से वोटर को

किसी के हाथ में "हिंदुत्व" का है एजेंडा
किसी ने थाम लिया फिर से "धार्मिक झंडा"

किसी ने काली "खदानों" का कोयला खाया
मवेशियों का किसी ने चबा लिया "चारा"

नहीं है इनको ग़रज़ हिंद के "मसायल" से
ये ख़ाक धोयेंगे हालात को "फिनायल" से
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हमारे हल्के में आये बड़े बड़े नेता
उन्हीं के बीच खड़े थे ये कानपुर के हुमा

लहक लहक के ये खड़का रहे थे भाषन को
बला का कोस रहे थे पुराने शासन को

फ़लाना ऐसा ... फ़लाँ वेसा .. और फ़लाँ वेसा
नहीं है कोई भी नेता कहीं मिरे जैसा

अब आप लोग मुझे चुन के देख लो इक बार
तमाम उम्र न भूलूँगा आपका उपकार

बस एक बार जिता दो मुझे इलेक्शन में
न आने दूँगा मुसीबत में कोई जीवन में

पलक झपकते ही बस्ती संवार दूँगा मैं
खराब नालियाँ, सड़कें सुधार दूँगा मैं

खुला रहेगा सभी के लिए मिरा दरबार
जहाँ पे होगा खुले मन से आपका सत्कार

फक़त अवाम की खातिर जियूं मरूंगा मैं
जो आप लोगों ने चाहा वही करूँगा मैं
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अभी उरूज प भाषन ज़रा सा आया था
सभा के बीच से इक बुड्ढा बडबडाया था

सवाल करता हूँ नेताजी ... कुछ जवाब तो दो
गुज़िश्ता पाँच बरस का ज़रा हिसाब तो दो

घिसट रहे हैं सभी सुबह ओ शाम गड्ढों में
सड़क को ढूढ रहे हैं अवाम गड्ढों में

झलक दिखाती है हफ्ते में एक दिन बिजली
कभी गुज़ारा है इक दिन भी तुमने बिन बिजली

नलों के खुश्क गले कैसे तर करोगे तुम
बगैर पानी के कैसे गुज़र करोगे तुम

ये औरतों की हिफाज़त भी कर सकोगे क्या
गरीब भूखों का तुम पेट भर सकोगे क्या

हमारे बच्चों को क्या रोज़गार दे दोगे
तुम अपने हिस्से की हमको पगार दे दोगे

नज़ारा देख के कुछ सटपटा गए थे "हुमा "
इस एहतिजाज से सकते में आ गए थे "हुमा "

पकड़ के हाथ वो इक सम्त ले गए इसको
दिए हज़ार रुपए और कहा .कि .. अब खिसको

क़सम है तुमको ज़रा मुझ को जीत जाने दो
मज़े तुम्हें भी कराउंगा ... वक्त आने दो

परी .. को बगल में लेकर चमन में लेटेंगे
चुनाव जीत कर संसद भवन में लेटेंगे

बहुत मज़े से कटेंगे ये पाँच साल मियाँ
करूँगा तुमको भी इक रोज मालामाल मियाँ

कहा बुज़ुर्ग ने मुझको ये घास मत डालो
मिरे बदन पे ये मैला लिबास मत डालो

ज़मीर अपना किसी हाल में न बेचूंगा
तुम्हें जिताएगा कौन आज मैं भी देखूंगा

रखे उम्मीद क्या चूहा किसी भी बिल्ली से
ये पंजे मारा करेगी सभी को दिल्ली से

चुनाव जीत कर तुम काम कुछ न आओगे
हमें ये शक्ल तुम अपनी न फिर दिखाओगे

करोगे देखना पहचानने से भी इंकार
मिलेगी वोट के बदले में लात और दुत्कार

ज़लील ओ ख्वार समझ कर भगाए जायेंगे
तुम्हारे हाथों ये मुफलिस सताए जायेंगे

इज़ाला कर न सकोगे कभी मुसीबत का
तुम अपने पांव से कुचलोगे सर अखुव्वत का

करोगे मुल्क की अस्मत का बार हा सौदा
पचास बरसों से देते रहे हो तुम धोखा

किसी गिरोह किसी पार्टी के पट्ठे हो
कि तुम भी इक ही थैली के चट्टे बट्टे हो

तुम अपनी तान पर हमको नचाना चाहते हो
हर एक हाल में इज्ज़त बचाना चाहते हो

बुरे बुरों में भले को चुना नहीं जाता
ये ख्वाब हम से तो "अब्बा " बुना नहीं जाता

नज़र में जितने हैं नेता सभी तो हैं बेकार
बताओ कौन चलाएगा मुल्क की सरकार

अब्बा जान
420 840 1680

शुरू में [?] मार्क लगाना न भूलें