2 November 2013

थे अपने ही हिसार में - नवीन

थे अपने ही हिसार में
सो लुट गये बहार में

क्या आप भी ज़हीन थे
आ जाइये कतार में

नश्शा उतर गया तमाम
कुछ बात है उतार में

गर तुम नहीं तो ग़म मिला
इतने नहीं हैं मार में

लाखों में आप एक थे
अब भी हैं इक हज़ार में

ये दिन भी देख ही लिया
पानी नहीं कछार में

वादा ही मिल सका फ़क़त
वो भी हुजूर उधार में

सारा शरीर खुल गया
झरने की एक धार में

आवाज़ दीजिये किसे
इस रात के बुखार में

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे रजज मुसद्दस मखबून
मुस्तफ़इलुन मुफ़ाइलुन
2212 1212

2 comments:

  1. क्या आप भी ज़हीन थे
    आ जाइये कतार में

    नश्शा उतर गया तमाम
    कुछ बात है उतार में

    बहुत अच्छे अशआर हैं |

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार १२ /११/१३ को चर्चामंच पर राजेशकुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है

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