28 February 2014

होली के सवैया - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

मग आज अचानक भेंट भई दोउ दैन चह्यौ एक-एक कों चुक्का
इत प्रीतमप्यारे नें बाँह धरी, उत प्यारी नें मार्यौ अबीर कौ बुक्का
कर छाँड़ि तबै दृग मींजें लगे, यों लगाय कें आपुनो तीर पै तुक्का
अलि गाल मसोस गई मुसकाय जमाय कें पीठ पे ज़ोर सों मुक्का
[सुन्दरी सवैया]


आई हों दीठि [नज़र] बचाय सबै बिनु तेरे हहा मोहि चैन न आबै
बेगि करौ जो करौ सो करौ, कर कें निबरौ तन मैन सताबै
पै इक बात सुनौ कवि प्रीतम प्यार में ख़्वार की दैन न भाबै
होरी खिलाउ तौ ऐसें खिलाउ कि मो सों कोउ कछु कैन न पाबै
[मत्तगयन्द सवैया]

No comments:

Post a Comment

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।

My Bread and Butter