10 October 2010

हे अज्ञात विधाता तुझे प्रणाम

हे अज्ञात विधाता तुझे प्रणाम|
ना रूप तेरा, ना रंग तेरा, ना जानू तेरा नाम||
हे अज्ञात विधाता तुझे प्रणाम...
 
कठिन वक्त में आता है तू, सच्ची राह दिखाता है तू|
हम से जो हो पाए न सम्भव, चुटकी में कर जाता है तू|
अहंकार हो ख़त्म जहाँ पर, वहीं है तेरा धाम||
हे अज्ञात विधाता तुझे प्रणाम...
 
हार्डवेयर जो मढ़ा है तूने, उसकी कोई होड़ नहीं है|
सॉफ़्टवेयर जो गढ़ा है तूने, उसकी कोई तोड़ नहीं है|
कितने फीचर, कितने फंक्शन, करता सारे काम||
हे अज्ञात विधाता तुझे प्रणाम...
 
सुना है धरती, अम्बर, पानी, अग्नि, हवा सब तुझसे हैं|
सुख-दुख, अच्छा-बुरा, गतागत, हानि-लाभ सब तुझसे हैं|
सृष्टि के सारे करतब, तुझसे पाते अंजाम||
हे अज्ञात विधाता तुझे प्रणाम...
 
ढाई आखर का तेरा मोबाइल नम्बर है जाहिर|
कइयों फोन अटेंड करे - इक साथ, कौन - तुझ सा माहिर|
तेरा ओफिस चले हमेशा, निशि-दिन , सुबहोशाम||
हे अज्ञात विधाता तुझे प्रणाम...
 
 
हार्डवेयर - मानव शरीर
सॉफ़्टवेयर - मानव मस्तिष्क
ढाई आखर = प्रेम

No comments:

Post a Comment