9 अक्तूबर 2010

मुझको तुझसे रञ्ज़ नहीं है, तुझको मुझसे द्वेष नहीं



मुझको तुझसे रञ्ज़ नहीं है, तुझको मुझसे द्वेष नहीं
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किञ्चित भी क्लेश नहीं


मेरी पीड़ा- तेरे आँसू, तेरा सुख - मेरी मुस्कान
तेरी राहें - मेरी मञ्ज़िल, मेरा दिल - तेरे अरमान
मेरा घर - तेरा चौबारा, तेरा कूचा - मेरी शान
दौनों ही कहते रहते हैं, मानव - मानव एक समान
फिर हम कैसे प्रुथक् हुए? मत में जब अन्तर लेश नहीं
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किञ्चित भी क्लेश नहीं

कौन सनातन है? प्यारे - इस मुद्दे में कुछ जान नहीं
पारस्परिक समन्वय से, हम दौनों ही अनजान नहीं
क्या तुझको - क्या मुझको, वो सब पहली बातें ध्यान नहीं
दौनों जानें, कुछ इक बातें, होती कभी समान नहीं
कया फ़ुजूल बातों से, तेरे दिल को पहुँचे ठेस नहीं
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किञ्चित भी क्लेश नहीं

आ, पल भर मिल बैठ जरा, सुन ले मन की बातें मेरी
 ख़ुदगर्ज़ों का बहिष्कार कर, बात सुनूँगा मैं तेरी
सुलझा लें गुत्थी, सदियों से, अनसुलझी हैं बहुतेरी
आज नहीं, तो कभी नहीं, कल फिर हो जायेगी देरी
क्या तेरे आराध्य देव का, एक नाम, 'अखिलेश' नहीं
फिर हम क्यों लड़ते रहते हैं? जब किञ्चित भी क्लेश नहीं

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