4 October 2011

है आज की नारी निपुण हर कार्य में वह दक्ष है

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन


आदरणीया साधना वैद जी ने हरिगीतिका छंद पर परिचर्चा शुरू होते ही कलम आजमाइश शुरू कर दी थी। उस का सुपरिणाम आज हमारे सब के सामने है। साधना दीदी इस मंच पर पहली बार प्रस्तुति दे रही हैं, और हम आशा करते हैं कि न सिर्फ वे स्वयं भविष्य में भी मंच से जुडी रहेंगी; बल्कि अपने और साथियों को भी इस साहित्य सेवा में जोड़ने का हर संभव प्रयास करेंगी।


 




'कसौटी'

सोचा अगर उसको ‘कसौटी’ - पर परखने का कभी।
भारी पड़ेगी वह सभी पर, बात सुन लीजे सभी।।

है आज की नारी निपुण, हर - कार्य में वह दक्ष है।
'वह है बनी घर के लिये' - यह - 'सोच का इक पक्ष' है।१।


हो चाँद सूरज की चमक, नित - क्षीण, जिसकी आब से।
यह विश्व आलोकित सदा, उस - की चमक नायाब से।।

वह है सदय, कोमल, करुण, 'जग - हित प्रयासों' के लिये।
पर चण्डिका भी है, 'मनुज के -शत्रु असुरों' के लिये।२।


[यही होती है कवि की कल्पना, आप खुद देखिये, 'कसौटी' शब्द को कहाँ जोड़ा है साधना दीदी ने]


'अनुरोध'

है आज यह ‘अनुरोध’ मेरा, हृदय अपने धारिये।
दुःख-दर्द जीवन अंग हैं, इन - को सहज स्वीकारिये।।

नफरत, जलन, अलगाव, हिंसा, द्वेष क्षण में छोड़िए।
चलिये सदा सन्मार्ग पर मन की दिशा को मोड़िये।१।


जो छांटना ही है, विकारों - का अँधेरा छांटिए।
पर, धर्म-जाती-धनी-निर्धन - हित, न खुद को बाँटिये।।

है ‘साधना’ यह कर रही कर - जोर विनती जानिये।
कर लीजिए निर्मल हृदय, ‘अनुरोध’ मेरा मानिये।२।

[सही कहा दीदी, ह्रदय निर्मल हो जाए तो सारे झंझट ही मिट जायेंगे]


'त्यौहार'

आते सुखद ‘त्यौहार’, जीवन - को सजाने के लिये।
मत चूकिए अवसर ज़रा भी, दिल मिलाने के लिये।।

विस्तीर्ण हो सदभावना, अति - श्रेष्ठ है पथ प्यार का।
अवसाद मुक्त रहें सभी, यह - नियम हो संसार का।१।


हिल मिल सभी के सँग मनायें, ‘पर्व’ ये उत्साह से।
हों प्राण प्रमुदित सहज ही, औ - भर उठें उल्लास से।।

सब देव देवी हों सदय, इस - विश्व का उत्थान हो।
हों कामना पूरी सभी, माँ! बस यही वरदान दो।२।

[त्यौहार का तात्पर्य सार्थक रूप से विवेचित किया आपने]




सच ही तो कहते हैं:- "जब जब भागीरथ चाहे गंगा को आना पड़ता हैनाहासिल-नामुमकिन क्या है? एक बार जो ठान लिया"   वास्तव में इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता? मन में धार ले तो इंसान कुछ भी कर सकता है। अजित दीदी और अब साधना दीदी ने इसे साबित कर दिखाया है। आप इन छंदों का रसास्वादन करें, अपने प्रशंसा रूपी पुष्पों की वर्षा करें और हम एज यूज्यूअल नयी पोस्ट की तैयारी करते हैं।





जय माँ शारदे!

27 comments:

  1. नवीन जी बधाई, आपको, क्योंकि आपके ‘अनुरोध‘ पर साधना जी ‘कसौटी‘ पर खरी सिद्ध हुई हैं और इस मंच पर ‘उत्सव‘ सा माहौल बना गई हैं।
    आदरणीय साधना जी , बहुत-बहुत बधाई आपको और बहुत सारी शुभकामनाएं। श्रेष्ट भावों से सजे आपके छंदों का लालित्य प्रशंसनीय है।

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  2. बहुत ही खूबसूरत तरीके से भावों को छंदों में पिरोया है साधना जी ने, बहुत बहुत बधाई उनको

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  3. सुंदर--- हाँ....

    थी सदा ही नारी निपुण हर कार्य दक्ष सदा रही |
    युग श्रम-विभाजन के समय थी पक्ष में गृह के वही |
    हाँ चाँद सूरज की चमक थी क्षीण उसकी चमक से |
    वह चमक आज विलीन है निज देह दर्शन चमक से ||

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  4. न तो ...कहीं आपका ला ला ल ला .....(२-२-१-२, २-२-१-२, २-२-१-२, २-२-१-२) फिट होता है न ७-७-७-७ ....
    ---वास्तव में यह किसी भी हरिगीतिका में फिट होते नहीं देखा गया ..तुलसी की में भी नहीं ..
    श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन
    २ २१ २१ १२१ ११ ११ = १६ मात्रा और यति

    हरण भव भय दा रुणं (= रु ण म् = लघु लघु लघु )
    १११ ११ ११ २१२ = १२ मात्रा, अंत में लघु गुरु |

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  5. श्री राम चं / द्र कृपालु भज / मन हरण भव / भय दारुणं
    २२१२ / ११२१११ / ११ १११ ११ / ११ २१२
    २२१२ / २२१२ / २२१२ / २२१२
    ला ला ल ला / ला ला ल ला / ला ला ल ला / ला ला ल ला

    नव कंज लो / चन कंज मुख / पद कंज पद / कंजारुणं
    ११ २१ २ / ११ २१ ११ / ११ २१ ११ / २२१२
    २२१२ / २२१२ / २२१२ / २२१२
    ला ला ल ला / ला ला ल ला / ला ला ल ला / ला ला ल ला

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  6. आ. श्याम जी कल आप ko दी गयी लिंक [http://thalebaithe.blogspot.com/2010/12/blog-post_03.html] में भी इस बात को बताया गया है

    यहाँ धुन वाले 'ला' को गुरु वर्ण न समझ कर २ मात्रा भार समझा जाना है
    हाँ हर चरण के अंत में लघु और गुरु वर्ण ही आने हैं

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  7. सार युक्त ये चंद बहुत अच्छे लगे |साधना जी को बहुत बहुत बधाई नए विचार लिए इन रचनाओं को |
    नवीनजी आपकी लगन और महनत बहुत प्रेरित करती है |
    आशा

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  8. नवीन जी आपकी बहुत आभारी हूँ आपने मन की भावनाओं को काव्य शास्त्र सम्मत अनुशासन में बाँध कर प्रस्तुत करने की प्रेरणा दी ! आगे भी सीखने की यही ललक रहेगी ! आशा है आप सिखाने से पीछे नहीं हटेंगे ! धन्यवाद !

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  9. बहुत ही

    खूबसूरत ||

    बहुत बहुत आभार ||

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  10. वाह जी...कमाल कर दिया...आनन्द आ गया.

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  11. यह शिष्‍य का कमाल है या गुरु का आशीर्वाद है? अपने भावों को बेहद खूबसूरती से पिरोया है आपने, बधाई।

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  12. नवीन जी....
    ---जब १+१ को भी २, २ को भी २, तो फिर १+१ तथा २ में कोई अंतर ही नहीं फिर लघु-दीर्घ मात्राओं का क्या! --७ ७ ७ ७ भी कहीं से भी गिन लिए जांय तथा शब्द व शब्दसमूह को भी विभाजित करके गिना जाय तो फिर मात्रा-नियम आदि का क्या अर्थ ? ...बस लयात्मकता -गतिमयता द्वारा आनंदमयता बनी रहनी चाहिए ---बाकी सब व्यर्थ ही है ...
    छान्दीय नियम सौंदर्य प्रतिपादन के लिए बनते हैं परन्तु पहले छंद बनते हैं तत्पश्चात नियम ..
    ----और ---अति सर्वत्र वर्ज्ययेत ....उसी के कारण प्रत्येक संस्था के पतन की राहें बनती हैं...
    ---देखिये हरिगीतिका में रचित एकलव्य खंडकाव्य ( अशोक कुमार पांडे 'अशोक')---की एक पंक्ति है ..
    "अब एकलव्य निराश बैठा, निज कुटी के द्वार पर |
    ११ २१२१ १२१ २२ ११ १२ २ २१ ११ (अंत |||)

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  13. --एक छंद यह भी...
    नर की कसौटी पर रहे नारी स्वयं शुचि औ सफल|
    वह कसौटी है उसी की परिवार हो सुंदर सुफल |
    हो जाय जग सुंदर सकल यदि वह रहे कोमल सजल |
    नर भी उसे दे मान जीवन बने इक सुंदर गज़ल ||

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  14. @अजित दीदी

    मंच पर आने वाली रचनाएँ और उन रचनाओं के भाव, सम्बंधित कवि / कवयित्रियों के ही होते हैं| जहाँ आवश्यक लगता है, मंच सुझाव अवश्य प्रस्तुत करता है| फायनल फॉर्म छंदों को उस कवि या कवयित्री द्वारा ही दिया जाता है| साधना दीदी के छन्द और उन छंदों के भाव उन के अपने ओरिजिनल हैं|

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  15. नवीन जी आपको और साधना जी दोनों को बधाई इस विधा को करीब से जानने को मिल रहा है ... बहुत ही मज़ा आ रहा है ..
    आपको और आपके परिवार और सभी पढ़ने वालों को विजय दशमी की हार्दिक बधाई ...

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  16. हो चाँद सूरज की चमक, नित - क्षीण, जिसकी आब से।
    यह विश्व आलोकित सदा, उस - की चमक नायाब से।।अप्रतिम प्रस्तुति दोनों पात्र बधाई के हकदार हैं .कौन गुरु कौन चेला यहाँ मिठास ही मिठास है .कविता एक भाव है ,छंद शाश्त्रियता है ,गणित है .हम तो भाव के रसिया हैं और भाव भरपूर है .

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  17. विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं !

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  18. सभी साथी बंधु बांधवियों की हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने मेरे इस प्रथम प्रयास को सराह कर मेंरा उत्साहवर्धन किया, मेरी सीखने की ललक को और बढ़ाया ! आप सभीका बहुत बहुत धन्यवाद एवं शुभकामनायें !

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  19. यहाँ छिड़ी बहस में मेरा इतना ही कहना है कि यौगिक जाति २८ मात्रिक छंद अवश्य है किन्तु उसके भेद ५१४२२९ हैं.. जिनके अंत में लघु-गुरु (IS) आता है वे कहलाते हैं.. 'हरिगीतिका छंद' और जिनके अंत में गुरु-गुरु (SS) आता है उन्हें कहते हैं 'सार छंद' और इसी तरह जिनके अंत में लघु-लघु (II) आता है उसे क्या कहते हैं उसकी खोज जारी है... :)

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  20. @ आ. नवीन जी,
    साधना वेद जी की इन हरिगीतिकाओं ने छंद के अच्छे उदाहरणों को सृजा है... खासतौर पर उनका नारी पर लिखा गया छंद उसके पक्ष को मजबूती से रख रहा है. वाह ... क्या चेतावनी पूर्ण ओजस्वी शब्दावली है!!!
    भारी पड़ेगी वह सभी पर, बात सुन लीजे सभी।।
    सोचा अगर उसको ‘कसौटी’ - पर परखने का कभी।
    है आज की नारी निपुण, हर - कार्य में वह दक्ष है।
    'वह है बनी घर के लिये' - यह - 'सोच का इक पक्ष' है।१।

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  21. आदरणीय डॉ. श्याम गुप्त जी, छंद-विषयक प्रयासों की अभी से सराहना करेंगे तो नवोदितों को प्रोत्साहन मिलेगा...आपके प्रश्नों से दूसरी बात भी सोच रहा हूँ कि 'महावीर प्रसाद द्विवेदी' भाँति आपकी आलोचना से उदाहरणों को गढ़ने में अब से अधिक सतर्क रहना होगा.

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  22. थी सदा ही नारी निपुण हर कार्य दक्ष सदा रही |
    युग श्रम-विभाजन के समय थी पक्ष में गृह के वही |
    हाँ चाँद सूरज की चमक थी क्षीण उसकी चमक से |
    वह चमक आज विलीन है निज देह दर्शन चमक से ||
    @ सच में.... इस छंद ने भी ध्यान को अपनी ओर खींचा... गज़ब का वाद-प्रतिवाद है...
    श्याम गुप्त जी, ...क्या ये छंद आपका है?... यदि हाँ, तो इस छंद के लिये बधाई... तर्क को तर्क से कटता देख ... काव्य-रसिक सभा में बैठने का वास्तविक आनंद आता है..

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  23. सार : सोलह-बारह बनत सार है अंत द्विगुरु सदा रहें.
    जिस छंद में प्रत्येक चरण में २८ मात्राएँ हों तथा १६ और १२ पर यति हो एवं अंत में दो-गुरु का क्रम हो, उसे 'सार' छंद कहते हैं..
    इलाचंद जोशी जी का एक छंद :
    "नहीं शक्ति जीने की उनमें, नहीं चाह मरने की.
    ज्ञानहीन पशु सम चिंता है, क्षुधा शांत करने की.
    उनके दुर्बल, भीरु हृदय को, कैसे सबल बनाऊँ?
    मस्तक ऊँचा करने का क्या, जीवन मन्त्र सुनाऊँ?

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  24. साधना जी!
    सारगर्भित हरिगीतिकाओं हेतु हार्दिक बधाई.

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  25. नारी की प्रसंगिकता , समर्पण , मश्वरा और त्यौहार की सही और सार्थक परिभाषा -सभी रचनायें सारगर्भित और एक ideology जो कि सुस्पष्ट और मर्यादित है की प्रतिध्वनि हैं --
    सोचा अगर उसको ‘कसौटी’ - पर परखने का कभी।
    भारी पड़ेगी वह सभी पर, बात सुन लीजे सभी।।
    ( नारी तुम केवल श्रद्धा हो .... से कई कदम आगे वर्तमान जीवन मूल्यों में यह सत्य प्रतिपादित भी है और परिलक्ष्यित भी )
    है आज यह ‘अनुरोध’ मेरा, हृदय अपने धारिये।
    दुःख-दर्द जीवन अंग हैं, इन - को सहज स्वीकारिये।।
    गुलशन परस्त हूँ मुझे गुल ही नहीं अजीज़
    काँटो से भी निबाह किये जा रहा हूम मैं --जिगर मुरादाबादी

    आते सुखद ‘त्यौहार’, जीवन - को सजाने के लिये।
    मत चूकिए अवसर ज़रा भी, दिल मिलाने के लिये।।
    होली दीवाली का सही मकसद यही है
    एक सारथक प्रस्तुति केलिये आपको बहुत बहुत बधाई !!!

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