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थी नार नखरीली बहुत, पर, प्रीत से प्रेरित हुई - ऋता शेखर 'मधु'

ऋता शेखर 'मधु'
इंसान अगर मन में ठान ले तो क्या नहीं कर सकता.....!!! ऋता शेखर 'मधु' जी ने इस का उदाहरण हमारे सामने पेश किया है। समस्या-पूर्ति मंच द्वारा छंद साहित्य सेवा स्वरूप आयोजनों की शुरुआत के वक़्त से ही बहुतेरे कह रहे थे "भाई ये तो बड़ा ही मुश्किल है, हम से न होगा" - बट - ऋता जी ने समस्या पूर्ति मंच पर की कवियों / कवयित्रियों द्वारा दी गई प्रस्तुतियों को पढ़-पढ़ कर और करीब एक महीने तक अथक परिश्रम कर के हरिगीतिका छंद लिखना सीखा है। हिन्दी हाइगा और मधुर गुंजन नामक दो ब्लोग चलाने वाली ऋता जी से परिचय अंतर्जाल पर ही हुआ है। आइये पढ़ते हैं उन के हरिगीतिका छंद:-

हरिगीतिका - समापन पोस्ट - रसधार छंदों की बहा दें, बस यही अनुरोध है

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन 


2 अक्तूबर २०११ को शुरू हुआ यह हरिगीतिका वाला आयोजन आज पूर्णता को प्राप्त हो रहा है। इस आयोजन में अब तक हम १४ रचनाधर्मियों के ७५ हरिगीतिका छंद पढ़ चुके हैं, जो कि इस पोस्ट के साथ हो जाएँगे १५ - ७८। आइये पहले पढ़ते हैं अम्बरीष भाई के छंद :-

सम्पूर्ण भारत-भक्ति में ही, सत्य-सार्थक मुक्ति है

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इस आयोजन की सेकंड लास्ट ये आज की पोस्ट एक विशेष पोस्ट है। मंच के वरिष्ठ मार्गदर्शक आचार्य सलिल जी के परामर्श बल्कि उन की आज्ञा के अनुसार ही उन के छंद और उन छंदों पर सुधार वाले सुझाव दोनों एक साथ प्रस्तुत किए जा रहे हैं। सलिल जी का मानना है कि इस से छंदों से प्रेम करने वाले लोगों को बहुत सहायता मिलेगी। पाठकों से भी निवेदन है कि वे अपनी स्पष्ट राय इन छंदों पर रखने की कृपा करें।

निज लक्ष्य जब तक सिद्ध ना हों, बेधड़क बढ़ते रहें

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हरिगीतिका छंद आधारित आयोजन के अगले चक्र में आज हम पढ़ते हैं आ. बृजेश त्रिपाठी जी को। बृजेश जी मंच से पहले से जुड़े हुए हैं और हम पिछले आयोजनों में इन की कुण्डलिया और घनाक्षरियाँ पढ़ भी चुके हैं।

इक शाम सरयू में स्वयं को, होम करना है तुझे

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आयोजन जैसे जैसे आगे बढ़ रहा है एक से एक उत्कृष्ट रचनाएँ भी सामने आ रही हैं। 2 अक्तूबर को शुरू हुआ यह आयोजन अब अपने उत्तरार्ध में प्रवेश कर चुका है।

आज की पोस्ट में हम पढ़ेंगे मयंक अवस्थी जी के हरिगीतिका छंद। लय का निर्वाह, छंद विधान का पूर्णरूपेण अनुपालन और सहज सम्प्रेषणीयता तो है ही, पर इन सब के अलावा जो ताज़गी उभारी है मयंक भाई ने, वो विशिष्ट है। आइये पढ़ते हैं इन छंदों को, धारा प्रवाह के साथ................

संतोष का सुख तो हमेशा, झोंपड़ों को ही मिला

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देखते ही  देखते १० कवियों के ५३ हरिगीतिका छंद पढ़ चुके हम अब तक। इस में सिद्धहस्त रचनाकार भी हैं और नौसिखिये भी। जीवन में पहली बार जिन्होंने हरिगीतिका छंद लिखे हैं, मंच उन का विशेष आभार व्यक्त करता है। इस आयोजन में हमने आध्यात्म - हास्य और शृंगार विषयक स्पेशल पोस्ट पढ़ीं, अब उसी क्रम में आज तिवारी जी भी एक स्पेशल पोस्ट ले कर आए हैं। घर कुटुम्ब की बातें हम सब जानते हैं, बतियाते भी हैं, परन्तु - अरे ये तो होता ही है इस में खास क्या - कह कर उन बातों को दरकिनार कर के साहित्य से दूर रखते हैं। जिन बातों की वज़ह से माहौल सतत प्रभावित होता रहता हो वो हल्की फुलकी बातें न हो कर बेहद गम्भीर बातें होती हैं और उन्हें निरंतर साहित्य में आते रहना चाहिए। शेषधर तिवारी जी ने इन बातों को केंद्र में रख कर अपने छंद भेजे हैं| विशेष बात ये कि 'अनुरोध', 'कसौटी' या 'त्यौहार' शब्द या कि उन के पर्यायवाची लिए बिना भी, छंद, इन शब्दों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।पहले हमने सोचा कि यह घोषणा के अनुरूप है या नहीं, फिर सोचा इस को पाठक माई-बाप की अदालत में पेश कर के देखते हैं। मंच के अनुसार यह एक सुन्दर प्रयोग है।

प्रिय छंद सुनिए प्रेम से , हम ने कहे हैं प्रेम से

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राजेन्द्र भाई स्वर्णकार जी के ब्लॉग पर घुमक्कड़ी करने वाले साथियों को पता है कि वो दिल लगा कर न सिर्फ लिखते हैं बल्कि उसे सजाने में भी जी-जान से मेहनत भी करते हैं। मेरी प्रबल इच्छा थी कि दिवाली के पहले या कि फिर बाद की पोस्ट में उन के छंद आयें, परंतु राजेन्द्र भाई यही कहते रहे कि पहले मैं स्वयं तो संतुष्ट हो जाऊँ। और देखिये जब कवि स्वयं संतुष्ट होता है तब कैसा काम आता है :-

हर पल कसौटी तुल्य था, पर, पर्व से कमतर न था

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धर्मेन्द्र भाई के अद्भुत छन्द पढे हमने पिछली पोस्ट में। परंतु इतने सुंदर छंदों पर इतने कम कमेंट्स!!!!!!!!!! खैर, हमें तो अपना काम ज़ारी रखना है। आइये आज पढ़ते आ. आशा दीदी के अनोखे छन्द। कल्पना और शब्दकारी का एक और अनोखा संगम।

विज्ञान के आगे चले ये हो कसौटी काव्य की

साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

पिछला हफ़्ता तो पूरा का पूरा दिवाली के मूड वाला हफ़्ता रहा| रियल लाइफ हो या वर्च्युअल, जहाँ देखो बस दिवाली ही दिवाली| शुभकामनाओं का आदान प्रदान, पटाखे और मिठाइयाँ| उस के बाद भाई दूज, बहनों का स्पेशल त्यौहार| इस सब के चलते हम ने पोस्ट्स को एक बारगी होल्ड पर रखा और इसी दरम्यान अष्ट विनायक दर्शन को निकल लिए|

नज़रें लड़ीं जिससे, वही, भैया बता के चल पडी

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मंच के सभी कुटुम्बियों को एक दूसरे की तरफ़ से 
दीप अवलि 
की हार्दिक शुभकामनाएँ



हरिगीतिका छंद पर आधारित इस आयोजन में आज हम हास्य आधारित छंद पढेंगे| क्यूँ भाई, हास्य रस सिर्फ होली पर ही होता है क्या? दिवाली पर भी तो हँस सकते हैं हम.....................

कर दे कृपा मैया हमारी, हम बहुत बेहाल हैं

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन


माहौल दिवाली मय होने लगा है सारे हिन्दुस्तान में| दीपावली पर्व की तैयारियाँ सब जगह जोरों पर हैं| होली और दीवाली इन दो पर्वों की धूम तो सारे हिन्दुस्तान में रहती है| हरिगीतिका छंद आधारित समस्या पूर्ति आयोजन के अगले चक्र में आज हम पढ़ते हें सुरेन्द्र भाई के मनोहारी छंद




 त्यौहार 

मातेश्वरी   तेरी  कृपा  की, दृष्टि  यदि हो जाएगी |
त्यौहार जैसी जिन्दगी की, हर घड़ी हो जाएगी || 
तू है जगत की जानकी माँ, हम तिहारे लाल हैं |
कर  दे  कृपा  मैया  हमारी, हम बहुत बेहाल हैं |१|
कसौटी 
अपनी भला औकात क्या? जो, तव कसौटी पर चढ़ें |
नादान, अवगुण-खान हम किस, राह पर जननी बढ़ें ||
हे ज्योति ! जीवन को हमारे, ज्योतिमय कर दीजिये |
अपने पदाम्बुज में जननि हे ! शरण हमको  दीजिये |२|


प्रार्थना
 
सन्मार्ग पर चलते रहें माँ, जिन्दगी  हो व्यर्थ ना |
नित राष्ट्र सेवा रत रहें, अम्बे  यही  है  प्रार्थना ||
हर   आदमी  इक दूसरे के, सुख व दुख में साथ हो |
जग में हिमालय की तरह निज, हिंद उन्नत-माथ हो |३| 
सुरेन्द्र जी इस समय स्वास्थ्य को ले कर परेशान हैं, फिर भी छंद साहित्य की सेवा के लिए न सिर्फ उन्होंने अपने छंद भेजे हैं बल्कि टिप्पणियों के माध्यम से भी लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं| सब से पहले हमने इन के कुण्डलिया छंद पढ़े थे, फिर घनाक्षरी छंद और अब हरिगीतिका छंद| इन के ब्लॉग के नियमित पाठक जानते हें, काव्य की विविध विधाओं में सिद्धहस्त सुरेन्द्र भाई भावों को बड़े ही सुन्दर ढंग से अभिव्यक्त करते हैं| 'हम बहुत बेहाल हैं' - जगत्जननी माँ का स्वयं को लाल बताने वाले की प्रार्थना ऐसी ही होनी चाहिए| इस में कोइ लाग लपेट नहीं है, कोइ फोर्मलिटी  नहीं है न करुणा का अतिवाद ही| एक बच्चा जैसे अपनी माँ से बात कर रहा हो, ठीक वैसे ही व्यक्त किया गया है इन छंदों में मनोभावों को, और यही विशिष्टता भी है|
सुरेन्द्र भाई के छंदों का आप लोग आनंद लें,अपनी टिप्पणियों की बरसात करें, और हम तैयारी करते हें अगली पोस्ट की|


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दो खुशियाँ आप सभी के साथ साझा करनी थीं| एक तो ये कि हमारे-आपके सम्यक छान्दसिक प्रयासों से प्रेरणा पा कर एक और कवयित्री ऋता शेखर 'मधु' ने छंदों में रुझान व्यक्त किया है, जो कि आज के शेरोशायरी प्रधान दौर में बहुत बड़ी बात है| दूसरी ये कि हमारे एक और साथी आ. सौरभ पाण्डेय जी ने समस्या पूर्ति से जुड़ने के बाद, समस्या पूर्ति के आयोजन के अतिरिक्त भी छंद लिख कर भेजे हें, वो भी ऐसा  वैसा  नहीं, सांगोपांग सिंहावलोकन छंद| एक दो दिन में ये छंद ठाले बैठे पर वातायन के अंतर्गत प्रकाशित होंगे| आप पढने आइयेगा अवश्य, ठाले बैठे की पोस्ट की मेल नहीं भेज रहा मैं आज कल| स्नेही स्वयँ आते हैं, पढ़ते हैं और अपनी यथेष्ट राय भी व्यक्त करते हैं|

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जय माँ शारदे!

त्यौहार बिन जीवन-जगत बस व्यर्थ का व्यापार है

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन




आ. श्याम गुप्त जी के नाम से शायद ही कोई काव्य रसिक ब्लॉगर हो, जो अपरिचित हो। छंद और साहित्य से इन का जुड़ाव जगजाहिर है। अगीत विधा पर आप ने काम किया है। स्वभाव से ही प्रयोगधर्मी और शूर्पणखा जैसे विषय पर अपनी लेखनी चला चुके श्याम जी के हरिगीतिका छंद शोभायमान कर रहे हैं आज की पोस्ट को 





अनुरोध है हरिगीतिका में छंद एक रचाइए।
सुंदर सरस शब्दावली में उचित भाव सजाइए।। 

सोलह तथा बारह कला फिर  अंत में लधु-दीर्घ हो।
मिल जाय शुभ शुचि छंद कोई पूर्ण यह अनुरोध हो ।१।

['कला' यानि 'मात्रा', हरिगीतिका छंद के बारे लिखने का अनुरोध कर रहे हैं श्याम जी]



त्यौहार प्रिय मानव जगत में सौख्य का आधार है।
उत्सव जहां होते न वह भी  क्या भला  संसार है ?

त्यौहार बिन जीवन-जगत बस व्यर्थ का व्यापार है।
हिल मिल उठें बैठें चलें यह भाव ही त्यौहार है।२।

[वाक़ई उत्सव विहीन संसार का मज़ा ही क्या है, और त्यौहार की व्याख्या तो भई वाह, 
क्या कहने हैं इस परिभाषा के]
हर इक कसौटी पर सफल तिय, कार्य दक्ष सदा रही ।
युग-श्रम विभाजन के समय थी पक्ष में गृह के वही।।

हाँ, चाँद -सूरज की चमक थी क्षीण उसकी चमक से । 
वह चमक आज विलीन है निज देह- दर्शन दमक से।३।|
 तिय = स्त्री

जाहिर सी बात है हर सिक्के के दो पहलू होते हैं| रचनाधर्मियों का यह कर्तव्य बनता है कि उन दोनों पहलुओं पर ईमानदारी से अपनी राय व्यक्त करें| उस परिपाटी का ही अनुपालन करते हुए छंद से छंद निकालने के क्रम में श्याम जी ने गढ़ा यह तीसरा छंद। साधना दीदी की पोस्ट के छंद 'है आज की नारी निपुण हर कार्य में वह दक्ष है" से प्रस्फुटित हुई थी इस छंद की प्रेरणा। आ. प्रतुल जी ने भी इस छंद की काफी तारीफ की थी तभी। पुराने समय में जब मंचों पर समस्या पूर्ति का बोलबाला हुआ करता था,उस ज़माने में कवि एक दूसरे के छंदों के ऊपर न केवल ऐसे ही प्रस्तुतियाँ देते थे, वरन  तार्किक  अभिव्यक्तियों  पर  खुल  कर  दाद  भी  देते  थे| प्रात:स्मरणीय परमादरणीय  गुरूजी  स्व. कविरत्न श्री 'प्रीतम' जी के साथ अटेंड किये गए कुछ कार्यक्रमों में ऐसे कुछ अनुभवों से साक्षात्कार हुआ था|  उस पुरातन काल को पुन: जीवंत करने के लिए श्याम भाई जी का बहुत बहुत आभार। सकारात्मक सृजन का यह क्रम आगे भी जारी रहे।

श्याम जी के छंदों पर आप अपनी बहुमूल्य राय प्रस्तुत करें और हम तैयारी करते हैं अगली पोस्ट की।


जय माँ शारदे!
[सभी चित्र गूगल से साभार]