9 October 2011

कृष्ण के छंद


गिरिवरधारी कृष्ण

उँगली पे उठाय लिया तुमने गिरिराज - प्रबुद्ध प्रशासक हो|
तुम कालिय नाग के नाथनहार  - सचेतक, तत्व-विचारक हो|
कुबजा अरु द्रौपदि लाज रखी - तुम सत्य समाज सुधारक हो|
सो 'नवीन' की दृष्टि में द्वारिकानाथ ब्रजेश तुम्हीं अधिनायक हो|१|
    [दुर्मिल सवैया]

प्रेम का पाठ पढ़ाया हमें अरु भक्ति का भाव सिखाते रहे हो|
जीवन की महिमा हमको मुरली की धुनों में सुनाते रहे हो|
सभ्य 'नवीन' समाज बने इस कारण चीर चुराते रहे हो|  
सत्य की राह दिखा के हमें खुद माखन चोर कहाते रहे हो||
[मत्तगयन्द सवैया]

सखियों के सखा गउओं के गुपाल गुवालों के मीत कहाते रहे।
ललिता के मनोहर जाम्बुवती सँग भी तुम रास रचाते रहे|
सब से सब की सब भाँति सुचारू सदैव 'नवीन' निभाते रहे|
समता के लिए तुम जन्म लिया समभाव की ज्योति जगाते रहे||
[दुर्मिल सवैया]

माखन से धन को भी कमाएँ कमाल का मन्त्र सिखाया हमें।
कंस से लोहा लिया तुमने जनतंत्र का मन्त्र सुझाया हमें|
वक़्त का साथ निभा के 'नवीन' जू वक़्त का मोल बताया हमें|
मातु पिता से है राष्ट्र बड़ा यह पाठ तुम्हीं ने पढ़ाया हमें||
 [मालिनी सवैया]

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