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कविता - कभी ऐसे भी सोचना - प्रज्ञा मिश्र ‘पद्मजा’

 

कभी-कभी प्रश्न उठाए नहीं जाते

भीतर कहीं खटकने लगते हैं

सही समय पर बात न हो

तो सम्बन्ध चटकने कहते हैं

कविता - अंहकार क्या है - डॉ. शबनम आलम


अपने आप को सबसे अलग मानना

अंहकार है

या, खुद को सर्वश्रेष्ठ समझना

अंहकार है

सहजता या सरलता का अभाव

अंहकार है

कविता – दोराहा - पूनम सुयाल


मेरे जीवन में भी
एक समय ऐसा आया
जब सब कुछ
चलता हुआ
अचानक ठहर गया।
बाहर की दुनिया

कविता - वक्त की अहमियत – शशि दीप

 

 

वक्त किसी का पहले या बाद में नहीं होता,

वह किसी से कोई फरक नहीं बरतता;

कविता - मन की लिपि - अनिता सुरभि

 

 
जैसे कोरी हथेलियों पर
हिना छोड जाती है अपना रंग-
जैसे पीछे छूट गई
पुरानी पगडंडियाँ

कविता - निधी सिंह खींची

 

मुझमें एक कहानी
आहिस्ते–आहिस्ते बसर
कर रही है,
छोटे–छोटे किस्सों,
छोटी खुशियों से
बुनती जा रही है।

कविता – सुकून - हर्षा खेड़ा खन्ना

 


राम ने जब पिनाक उठाकर,

प्रत्यंचा होगी चढ़ाई ,

तब क्या एक सांस सुकून की

सीता ले पायी होगी ?

कविता - हिसाब किताब में कच्ची महिलाएँ - अम्बिका झा

कविता - हिसाब किताब में कच्ची महिलाएँ – अम्बिका झा

 

हिसाब किताब में

बहुत ही कच्ची होती हैं महिलाएँ

तभी तो खर्च कर देती हैं अपने सुकून के पल

खर्च कर देती हैं लड़कियाँ बचपन

ताकि उसे भी वो स्नेह मिल सके

जो भाइयों को मिलता आ रहा है

कविता - मैंने रास्तों से ज्यादा खुद को पढ़ा है इस साल - कल्याणी गुप्ता 'कृति'


मैंने रास्तों से ज्यादा

 खुद को पढ़ा है इस साल

हर मोड़ पर

कोई मंजिल नहीं,

कविता - पहली फूँक - सत्यवती मौर्य

 

 

पहली फूँक किसने मारी होगी 

धुएं से भरे चूल्हे की आग जलाने के लिए कभी

 

या आग से जली त्वचा पर मारी होगी

ब्रजभाषा के तुक्तक - भाड़ में जान्दै, हमै का परी – रेणु शर्मा

 

 

ढिकाने कौ छोरा, फलाने की छोरी,

छत पै रोज मिलें चुपके-चुपके, चोरी-चोरी

पढ़ाई-लिखाई तौ उनके बस बहाने एं ,

उन्नैं तौ दुछत्ती पै जाकैं नैना लड़ाने ऐं

मैथिली कविता - तीलक तार – अम्बिका झा

 


"हे यौ भइया आँहाँ कोना दुबरा गेल छि ?
बहिन हाथक भोजन बिन कुम्हला गेल छि।
 
हे यौ कि कहलौं ?

कविता – मन का टूटना – हृदयेश मयंक

 


डाल से टूट कर

बिछुड़ते हुए पत्तों को देखा है

टूटती हुई डालियाँ चरमराती हुईं टूटती हैं

एक इन्सान को टूटते हुए देखना बड़ा भयानक होता है

कविता – खिड़की भर दुनिया - डॉ कनक लता तिवारी


खिड़की भर दुनिया

अस्पताल की खिड़की से

दुनिया कुछ अलग दिखती है—

यहाँ समय की चाल धीमी,

पर बाहर ज़िंदगी तेज़ भागती है।

कविता - अपनी सीमा तय करते लोग - रीता दास राम

 


हमारे समय के लोग

बातें करते हैं, बातें करते रहते है, तब तक

जब तक बातें की जा सकें

कविता - प्रेम - सन्ध्या यादव


प्रेम ...

1)अपनी बेकारी के दिनों में

एक लोहे का कड़ा खरीद 

दिया था उसने जन्मदिन पर

आज भी सोने के कंगन

के साथ पहनती हूँ

"मंदिर का चढ़ावा है " पूछने पर

कविता - श्रापित खण्डहर - अनामिका प्रवीण शर्मा

 


किसी दिन

किसी कविता में

मैं लिखूँगी उन तमाम औरतों की जीवनी

जो नज़रबंद थीं

इन  ऊँची ऊँची

किलों की दीवारों के पीछे

कविता - चकोर - रेखा बब्बल

 


क्यों माँ

क्या बातें कर रहे थे

पापा,चाचा और दादी ?

क्या जन्म लेने से पहले ही

कविता - दो पाटन के बीच - सन्ध्या यादव

 

दो पाटन के बीच...

वो औरतें जो जबरदस्ती

घर में घुस आयीं घुसपैठियों की तरह

" मैं तुलसी तेरे आंगन की तर्ज पर "

उन औरतों को सबसे मिली उपेक्षा

उनका दावा था इस उपेक्षा की चादर को

कविता - रहे रेडियो के हम श्रोता, बड़े प्रेम से सुनते थे - अटल राम चतुर्वेदी

 


रहे रेडियो के हम श्रोताबड़े प्रेम से सुनते थे 

फिल्मी गीतों को सुन-सुन कर, स्वर्णिम सपने बुनते थे 

रहे रेडियो के हम श्रोता, बड़े प्रेम से सुनते थे