भीतर कहीं खटकने लगते हैं
सही समय पर बात न हो
तो सम्बन्ध चटकने कहते हैं
भीतर कहीं खटकने लगते हैं
सही समय पर बात न हो
तो सम्बन्ध चटकने कहते हैं
अंहकार है
या, खुद को सर्वश्रेष्ठ समझना
अंहकार है
सहजता या सरलता का अभाव
अंहकार है
कविता - हिसाब किताब में कच्ची महिलाएँ – अम्बिका झा
हिसाब किताब में
बहुत ही कच्ची होती हैं
महिलाएँ
तभी तो खर्च कर देती हैं
अपने सुकून के पल
खर्च कर देती हैं लड़कियाँ
बचपन
ताकि उसे भी वो स्नेह मिल
सके
जो भाइयों को मिलता आ रहा है
ढिकाने कौ छोरा, फलाने
की छोरी,
छत पै रोज मिलें चुपके-चुपके, चोरी-चोरी
पढ़ाई-लिखाई तौ उनके बस
बहाने एं ,
उन्नैं तौ दुछत्ती पै जाकैं नैना लड़ाने ऐं
डाल से टूट कर
बिछुड़ते हुए पत्तों को देखा
है
टूटती हुई डालियाँ चरमराती
हुईं टूटती हैं
एक इन्सान को टूटते हुए देखना बड़ा भयानक होता है
खिड़की भर दुनिया
अस्पताल की खिड़की से
दुनिया कुछ अलग दिखती है—
यहाँ समय की चाल धीमी,
पर बाहर ज़िंदगी तेज़ भागती है।
प्रेम ...
1)अपनी बेकारी के दिनों में
एक लोहे का कड़ा खरीद
दिया था उसने जन्मदिन पर
आज भी सोने के कंगन
के साथ पहनती हूँ
"मंदिर का चढ़ावा है " पूछने पर
किसी दिन
किसी कविता में
मैं लिखूँगी उन तमाम औरतों की जीवनी
जो नज़रबंद थीं
इन ऊँची ऊँची
किलों की दीवारों के पीछे
दो पाटन के बीच...
वो औरतें जो जबरदस्ती
घर में घुस आयीं घुसपैठियों
की तरह
" मैं तुलसी तेरे आंगन
की तर्ज पर "
उन औरतों को सबसे मिली
उपेक्षा
उनका दावा था इस उपेक्षा की चादर को
रहे रेडियो के हम श्रोता, बड़े प्रेम से सुनते थे
फिल्मी गीतों को सुन-सुन कर, स्वर्णिम सपने बुनते थे
रहे रेडियो के हम श्रोता, बड़े प्रेम से सुनते थे