8 May 2013

भाँग चढ़ाये नाच रहे सब - प्रवीण पाण्डेय

आशा नहीं पिरोना आता, धैर्य नहीं तब खोना आता,
नहीं कहीं कुछ पीड़ा होती, यदि घर जाकर सोना आता, 

मन को कितना ही समझाया, प्रचलित हर सिद्धान्त बताया,
सागर में डूबे उतराते, मूढ़ों का दृष्टान्त दिखाया,

औरों का अपनापन देखा, अपनों का आश्वासन देखा,
घर समाज के चक्कर नित ही, कोल्हू पिरते जीवन देखा,

अधिकारों की होड़ मची थी, जी लेने की दौड़ लगी थी,
भाँग चढ़ाये नाच रहे सब, ढोलक परदे फोड़ बजी थी,

आँखें भूखी, धन का सपना, चमचम सिक्कों की संरचना,
सुख पाने थे कितने, फिर भी, अनुपातों से पहले थकना,

सबके अपने महल बड़े हैं, चौड़ा सीना तान खड़े हैं,
सुनो सभी की, सबकी मानो, मुकुटों में भगवान मढ़े हैं,

जिनको कल तक अंधा देखा, जिनको कल तक नंगा देखा,
आज उन्हीं की स्तुति गा लो, उनके हाथों झण्डा देखा,

सत्य वही जो कोलाहल है, शक्तियुक्त अब संचालक है,
जिसने धन के तोते पाले, वह भविष्य है, वह पालक है,

आँसू बहते, खून बह रहा, समय बड़ा गतिपूर्ण बह रहा,
आज शान्ति के शब्द न बोलो, आज समय का शून्य बह रहा,

आज नहीं यदि कह पायेगा, मन स्थिर न रह पायेगा,
जीवन बहुत झुलस जायेंगे, यदि लावा न बह पायेगा,

मन का कहना कहाँ रुका है, मदमत बहना कहाँ रुका है,
हम हैं मोम, पिघल जायेंगे, जलकर ढहना कहाँ रुका है?

स्वागत है प्रवीण भाई .....

मुझे प्रवीण भाई के गद्य और पद्य दौनों को ही पढ़ने में बहुत मज़ा आता है। इन की भाषा में कोलाहल का अतिरेक न के बराबर और संदेश का असर बहुत ही प्रभावशाली होता है। उपरोक्त पदयांश मैंने उन की अनुमति के बग़ैर उन के ब्लॉग से उठाया है। आशा करता हूँ प्रवीण भाई पर मेरा इतना अधिकार है। बहुत बहुत बधाई प्रवीण भाई।

विशेष : प्रवीण भाई की पद्य प्रस्तुतियाँ अधिकांशत: छन्द-बद्ध होती हैं। छंदज्ञों से अनुरोध है कि इस प्रस्तुति को पढ़ कर बताएँ कि यहाँ किस छन्द का प्रयोग किया गया है। क्या यह माधुरी है? या मधुभार? या फिर कोई और?

12 comments:

  1. बिना छन्द का ध्यान किये कविता बह जाती है।

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  2. भावों में बह कर कविता लिखें तो छंद तो स्वयं ही बन जाता है..

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  3. काव्‍य, स्‍वाभाविक प्रवाहमयी हो तो छंद सूची में नया नाम जुड़ सकता है.

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  4. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए शनिवार 11/05/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की जाएगी.
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  5. राहुल साहब, यह एक प्रोपर छंद ही है। चर्चा होने के लिहाज़ से नाम नहीं लिखा है। 16-16 की यति के साथ तंत्री तथा श्रंगार हार / मराल छंद भी होते हैं। साथ ही सब में थोड़ा-थोड़ा अंतर भी है। मुझे अपने साथियों की राय की प्रतीक्षा है।

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  6. This comment has been removed by the author.

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  7. ---मेरे विचार में यह मराल छंद ही है जिसमें ३२ मात्राएँ होती हैं ...और तीसरा पद अतुकांत ..

    -----यह ३२ मात्राओं का लाक्षणिक जाति का .. दंडकला छंद होगा -जिसमें तीसरी यति में में तुकांत नहीं होता है...यद्यपि यति १० ८ ८ पर होनी चाहिए |


    ----यह मत्त सवैया होगा ...३२ .मात्राएँ ..१६-१६ यति ..... यदि चार पंक्तियों में लिखें तो ..यथा ...

    औरोंका अपनापन देखा,अपनोंका आश्वासन देखा,
    घरसमाज के चक्कर नितही,कोल्हूपिरते जीवनदेखा,
    अधिकारों की होड़ मची थी,जीलेनेकी दौड़लगी थी,
    भाँग चढ़ाये नाचरहे सब,ढोलक परदेफोड़ बजी थी,

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  8. वाह ! एक अच्छा व्यवहार ! यानि, काव्य रस लें तो मात्र वाह-वाह न कर रस-छंद-गति-यति को समझते हुए आनन्द लीजिये का साग्रह प्रयास !!
    प्रवीण जी के इन बंदों को बलात् उठा ले आने के लिए आपके साथ भाई प्रवीण जी भी सादर धन्यवाद के भागी हैं. .. :-))


    प्रस्तुत सभी बंद को देखा जाय तो मुक्तक शैली में प्रथम दो पद तुकांत हैं तो तीसरा स्वतंत्र है. पुनः चौथा पद प्रथम दो पदों का अनुसरण करता हुआ है. ऐसा करना कई मात्रिक छंदों के मूल नियमों की अवहेलना करना है.

    लेकिन यदि मात्रिकता और शब्द-संयोजन की बात की जाय तो सभी बंद अलग-अलग परिभाषित हो सकते हैं.

    मैंने जिन छंदों को इस प्रयास के अंतर्गत लिया है वे हैं, पादाकुलक, पदपादाकुलक, चौपाई, अरिल्ल, उपचित्रा, पज्झटिका, सिंह तथा कामकला छंद.

    शृंगार आदि छंद तो अपने विन्यास के कारण ही अलग हो जाते हैं जिन पर हमने इस प्रस्तुति हेतु ध्यान ही नहीं दिया है.

    दण्डकला छंद पर तो उस छंद में यति (10-8-14) तथा प्रथम दो चरणों के अंत की तुकांतता की अनिवार्यता के कारण विचार ही नहीं किया.


    पादाकुलक छंद
    ===========
    सोलह मात्राएँ चार व्यवस्थित चौकल में. यानि ऽऽ, ।।ऽ, ।ऽ।, ऽ।।, ।।।।.

    (आशा) (नहीं पि) (रोना) (आता), (धैर्य न) (हीं तब) (खोना) (आता),
    (नहीं क) (हीं कुछ) (पीड़ा) (होती), (यदि घर) (जाकर) (सोना) (आता),

    (मन को) (कितना) (ही सम) (झाया), (प्रचलित) (हर सि) (द्धा न्त ब) (ताया),
    (सागर) (में डू) (बे उत) (राते), (मूढ़ों) (का दृष्) (टान्त दि) (खाया),

    किन्तु निम्नलिखित बंद पादाकुलक के लिहाज से ख़ारिज़ हो जाता है--
    (औरों) (का अप) (नापन) (देखा), (अपनों) (का आ) (श्वा सन) (देखा),
    (घर समाज के चक्कर नित ही, कोल्हू पिरते जीवन देखा
    यहाँ ध्यातव्य है कि तीसरे चरण ’घर समाज के चक्कर नित ही’ में ’घर समाज’ के कारण चौकल नहीं बन रहा है.

    इसी क्रम में आगे देखें.

    पदपादाकुलक छंद
    ============
    चरण का प्रारंभ ऽ या ।। से अनिवार्य होता है. प्रथम दो मात्राओं के बाद आखिर के १४ मात्राओं में चौकल मात्र का निर्वहन संभव नहीं होता, अतः बीच के शब्द-संयोजन में त्रिकल् पर त्रिकल आते हैं. अंत अवश्य ही ।। या ऽ पर होता है.
    इस हिसाब से निम्न बंद देखें -
    (औ) (रों (का) (अपना) (पन दे) (खा), (अप) (नों का) (आश्वा) (सन दे) (खा),
    (घ)र (समा) (ज के) (चक्कर) (नित ही), (को) (ल्हू पिर) (ते जी) (वन दे) (खा)
    इसी क्रम में आगे देखा जाय.

    अरिल्ल छंद
    ========
    चरणान्त ऽ।।, ।।ऽ या ऽऽ से होता है. किन्तु, मध्य में जगण (।ऽ।) निषेध है.

    इस हिसाब से निम्न बंद देखें -
    अधिकारों की होड़ म (ची थी), जी लेने की दौड़ ल (गी थी),
    भाँग चढ़ाये नाच र (हे सब), ढोलक परदे फोड़ ब (जी थी),

    सबके अपने महल ब (ड़े हैं), चौड़ा सीना तान ख (ड़े हैं),
    सुनो सभी की, सबकी (मानो), मुकुटों में भगवान म(ढ़े हैं),
    इसी क्रम में आगे देखा जाय.

    जो बंद अरिल्ल छंद से ख़ारिज़ हो रहे हैं, वे हैं-
    औरों का अपनापन देखा, अपनों का आश्वासन देखा,
    घर (समाज) के चक्कर नित ही, कोल्हू पिरते जीवन देखा,
    समाज = ।ऽ। जगण
    सत्य वही जो कोलाहल है, शक्तियुक्त अब संचालक है,
    जिसने धन के तोते पाले, वह (भविष्य) है, वह पालक है,
    भविष्य = ।ऽ। जगण
    इसी क्रम में आगे देखा जाय.

    (क्रमशः)

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  9. (आगे..)


    उपचित्रा छंद
    ==========
    प्रत्येक चरण का विन्यास 8+ऽ+4+ऽ तथा ।ऽ। यानि जगण अनिवार्य.
    औरों का अप (ना) पन दे (खा), अपनों का आ (श्वा) सन दे (खा),
    घर समाज के (चक्) कर नित (ही), कोल्हू पिरते (जी) वन दे (खा)
    समाज = ।ऽ। जगण
    इसके अलावे और कोई बंद इस उपचित्रा छंद में प्रतीत नहीं हुआ.

    पज्झटिका छंद
    ==========
    प्रत्येक चरण का विन्यास 8+ऽ+4+ऽ तथा ।ऽ। यानि जगण निषिद्ध.

    आशा नहीं पि (रो) ना आ (ता), धैर्य नहीं तब (खो) ना आ (ता),
    नहीं कहीं कुछ (पी) ड़ा हो (ती), यदि घर जाकर (सो) ना आ (ता),

    मन को कितना (ही) समझा (या), प्रचलित हर सिद् (धा) न्त बता (या),
    सागर में डू (बे) उतरा (ते), मूढ़ों का दृष् (टा) न्त दिखा (या),
    इन दोनों बंदों में ।ऽ। यानि जगण का निर्माण नहीं होता. अतः पज्झटिका छंद संतुष्ट होता है. इसी क्रम में आगे देख जायें.

    कामकला छंद
    ======
    चरण का आरंभ ।। से तथा चरणांत ।।ऽ से.

    प्रस्तुति में एक बंद अवश्य इस छंद के अनुकूल रहा है बशर्ते.. बशर्ते आँखें को अँखियाँ कर दिया जाय.. . :-)))
    देखिये-
    (अँखि) याँ भूखी, धन का (सपना), (चम) चम सिक्कों की सं (रचना),
    (सुख) पाने थे कितने, (फिर भी), (अनु) पातों से पहले (थकना),

    इसके अलावे और कोई बंद कामकला छंद के अनुरूप नहीं हुआ.

    सिंह छंद
    =======
    कामकला छंद से संतुष्ट हो रहे बंद को यदि चार पदों में कर दिया जाय तो वह बंद सिंह छंद का उदाहरण हो जायेगा -
    (अँखि) याँ भूखी, धन का (सपना),
    (चम) चम सिक्कों की सं (रचना),
    (सुख) पाने थे कितने, (फिर भी),
    (अनु) पातों से पहले (थकना),

    यह मेरा एक तुच्छ प्रयास है, नवीनजी. छंद विन्यास के क्रम में अपनी नादानी या नासमझी के कारण हुई किसी भूल को अपने सिर लेता हूँ.

    सादर
    सौरभ पाण्डेय
    नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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  10. विद्वतजन

    'कवि ने एक अतिरिक्त अंत्यनुप्रास / क़ाफ़िया / तुक का जादू जोड़ा है' इस बात को समझते हुये क्या एक बार हम विवेच्य काव्य प्रस्तुति को तंत्री छन्द के आलोक में देख सकते हैं?

    प्रति चरण 32 मात्रा तथा 16 मात्रा पर यति के सिवाय तंत्री छन्द के प्रति एक चरणान्त में दो गुरु वर्ण होना बताया गया है। इस प्रस्तुति का अधिकांश भाग तंत्री छन्द के निकट जान पड़ता है। कुछ चरणों के अंत में दो गुरु वर्ण के स्थान पर दो लघु तथा एक गुरु वर्ण का प्रयोग भी देखने में आ रहा है।

    32 मात्राओं वाले और भी छन्द हैं, पर प्रथम दृष्ट्या मैं इसे तंत्री के समीप देख पा रहा हूँ।

    उपस्थित तथा अन्य साथियों की राय की भी प्रतीक्षा रहेगी।

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  11. पांडे जी निज कविता लिख कर मस्त हैं|
    विद्वतजन छंद ढूंढ ढूंढ कर त्रस्त हैं|

    --किसी भी छंद में फिट बैठता नहीं है ,
    बस ख़ास छंद की खासियत यही है |
    ---- इसीलिये ...

    न बहर से न वज्न से ग़ज़ल गुलज़ार होती है |
    न छंद-गणों के गणन से कविता ए बहार होतीहै|
    काव्य तो इक दिले -अंदाज़ है दोस्त ...
    भावों में बहकर गाया जाए वही कविता होती है|
    ---तो इसे प्रवीण-छंद क्यों न माना लिया जाए...

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  12. बहुत सुन्दर रचना

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