30 April 2014

तेरा जलना और है, मेरा जलना और - अन्सर क़म्बरी

मन से जो भी भेंट दे, उसको करो कबूल |
काँटा मिले बबूल का, या गूलर का फूल ||

सागर से रखती नहीं, सीपी कोई आस |
एक स्वाति की बूँद से, बुझ जाती है प्यास ||

गिरा हुआ आकाश से, सम्भव है उठ जाय |
नजरों से गिर जाये जो, उसको कौन उठाय ||

सूरज बोला चाँद से, कभी किया है ग़ौर |
तेरा जलना और है, मेरा जलना और ||

प्यासे के जब आ गयी, अधरों पर मुस्कान |
पानी-पानी हो गया, सारा रेगिस्तान ||

रातों को दिन कह रहा, दिन को कहता रात |
जितना ऊँचा आदमी, उतनी नीची बात ||

जब तक अच्छा भाग्य है, ढके हुये हैं पाप |
भेद खुला - हो जायेंगे, पल में नङ्गे आप ||

बहुदा छोटी वस्तु भी, सण्कट का हल होय |
डूबन हारे के लिये, तिनका सम्बल होय ||

ढाई आखर छोड़ जब, पढ़ते रहे किताब |
मन में उठे सवाल का, कैसे मिले जवाब ||

तुम्हें मुबारक हो महल, तुम्हें मुबारक ताज |
हम फ़क़ीर हैं ‘क़म्बरी’, करें दिलों पर राज ||

:- अन्सर क़म्बरी
9450938629

2 comments:

  1. बहुत अच्छे दोहे हैं। बधाई क़म्बरी जी को

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  2. क्या कहने एक से बढकर एक दोहा । मजा आ गया इतने अच्छे दोहे बहुत दिन बाद पढे । बहुत अच्छा लगा कम्बरी साहब कुछ दोहे तो बस गजब जैसे
    सूरज बोला चाँद से,कभी किया है ग़ौर|
    तेरा जलना और है,मेरा जलना और||
    प्यासे के जब आ गयी,अधरों पर मुस्कान|
    पानी-पानी हो गया,सारा रेगिस्तान||

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