10 October 2013

हे माता आद्येश्वरी, नमन करूँ शत बार - अनाम


हे माता आद्येश्वरी, नमन करूँ शत बार।
महाशक्ति ब्रह्माण्ड की, पाया आर न पार।।

कण-कण में माँ व्याप्त होधारे रूप हज़ार।
अपने पट पर सृष्टि रच, करिये स्थिति संहार।। 

त्रिगुण रूप कुल विश्व में, माँ तुम ही तुम व्याप्त।
पञ्चभूत बन सब रचे, .........जड़-चेतन को आप्त।।

व्यक्त तुम्हीं, अव्यक्त तुम, चारों वाणी वास।
प्रथम नाद ओँकार तुम, अक्षर सर्व निवास।।

तुम सौम्या, तुम चण्डिका, त्रिपुरसुंदरी रूप।
अष्टभुजा, त्रिनयन धरे, तुम माँ काली रूप।।

एक छोर से दूसरे, तव वैभव बिखराय।
पर्वत, सागर, वन, नदी, तव क्रीड़ा विलसाय।।

मानव तन में वास तव, धर कुण्डलिनी रूप।
भुक्ति-मुक्ति देतीं उसे,.......हे योगेश्वरि रूप।।

दे दे हे माँ मंगला, विश्वशान्ति उपहार।
ले दुर्गा का रूप, कर, दुष्टवृत्ति संहार।।

पोस्ट होने पर रश्मि दीदी ने बताया कि यह दोहे उन के नहीं हैं। ई मेल तपास की तो फिर उन्हों ने कहा कि वह ई मेल भी उन की नहीं है। इस लिये फिलहाल इन दोहों को अनाम नाम के साथ रहने देते हैं। फ्री होने पर इस बारे में सोचा जायेगा। 

23 comments:

  1. मैंने नहीं भेजा है नवीन जी - कहीं कुछ ग़लतफ़हमी है
    हाँ दोहे माँ दुर्गा के नव रूप से हैं,पर किसने भेज है - आप पता कीजिये

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    1. आप को पूरा थ्रेड फॉरवर्ड किया जा चुका है, और आप के कहने पर आप का नाम हटा दिया है। फ़िलहाल इन दोहों को अनाम के नाम के साथ रहने देते हैं। फ्री होने पर इस के बारे में सोचा जायेगा।

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    2. मैं तो झट से पोस्ट पर आई कि रश्मि दी के दोहे हैं तो निःसंदेह उत्कृष्ट होंगे...खैर...सुंदर दोहे रचने के लिए अनाम जी को बधाई !

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    3. अभी तो यह भी पता नहीं चल रहा कि रश्मि प्रभा नाम का कोई अन्य रचनाधर्मी है या किसी ने मञ्च के साथ मज़ाक किया है........... और यदि मज़ाक किया है तो ऐसा कर के उसे क्या मिला............

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    4. उसे तो कुछ नहीं मिला नवीन भाई,हमें माँ के दोहे मिले :)

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  2. तुम सौम्या, तुम चण्डिका, त्रिपुरसुंदरी रूप।
    अष्टभुजा, त्रिनयन धरे, तुम माँ काली रूप।।
    ...वाह वाह !

    इन दोहों के रचयिता को हम सब की ढेरों बधाइयाँ और अनेकानेक शुभकामनाएँ..

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  3. Is aman rachiyta ki rachna ko koti koti naman ... Navratri ke in sabhi dohon mein maa ki mahima ka anant gungan hai ...

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  4. हे माता आद्येश्वरी, नमन करूँ शत बार।

    महाशक्ति ब्रह्माण्ड की, पाया आर न पार।।

    Navin Dohe jisne bhi likhe hain, padhna hamara saubhagy raha ,,,aur khoob anand lekar padhe. Rashim ji ki baat se main bhi sahmat hoom.

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
    नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें

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  6. मित्रो नमस्कार, इस विषय के लिये एक और पोस्ट वेस्ट करने की बजाय इस मज़ाक का पोस्ट-मार्टम यहीं करना ठीक रहेगा।
    मेरी कोशिश रहती है कि मञ्च पर आने वाली रचनाएँ यथासम्भव त्रुटि-विहीन हों, बल्कि यूँ कहें कि बचकाना ग़लतियों को तो दुरुस्त करने की कोशिश रहती ही है। इस कारण भूतकाल में भी कई साथियों के कोप का भाजन बन चुका हूँ मैं। रचना किसी की भी हो, जहाँ आवश्यक लगता है - पहले रचनाधर्मी को बता दिया जाता है, और यदि कहा जाये तो उसे सुधार भी दिया जाता है। एक उदाहरण इसी पोस्ट का देखिये
    [आरिजिनल दोहा जो मेल पर मिला – ई मेल आय डी ]
    “नमन” तुम्हें आद्येश्वरी, “नमन” करूँ शत बार।
    महाशक्ति ब्रह्माण्ड की, तेरा आर न पार।।

    ऊपर की पंक्ति को देखिये, यहाँ 'नमन तुम्हें' के बाद 'नमन करूँ' का कोई औचित्य नहीं है। इस लिये इसे सुधार कर "हे माता आद्येश्वरी, नमन करूँ शत बार" कर दिया गया।
    इस के बाद देखिएगा, मूल स्वरूप में रचनाधर्मी पहली पंक्ति में 'तुम्हें' कह कर संबोधित कर रहा है और तुरन्त दूसरी पंक्ति में 'तेरा' पर आ गया। एक ही छन्द, बन्द, शेर में ऐसा करना ग़लत है। ये कुछ ऐसा है कि कोई व्यक्ति आते ही आप से कहे 'अरे भाई आप तो बहुत महान हैं' और उस के तुरन्त बाद ही कहने लगे 'तू क्या कर रहा है भाई" , यानि 'आप' के बाद 'तू' - ये महीन बातें भूलते जा रहे हैं हम लोग, और बताने वाले के कपड़े फाड़ने से बाज भी नहीं आते। रचनाधर्मी की ओरिजिनल पहली पंक्ति से 'तुम्हें' हटाने के बाद भी, उस की भावनाओं का सम्मान करते हुये, सुधार के वक़्त मैं ने 'तेरा' शब्द के स्थान पर 'पाया' शब्द का प्रयोग किया। हालाँकि इस दोहे को अभी और भी परिमार्जन की आवश्यकता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह प्रक्रिया कितना समय लेती है।
    यह बात किसी से भी छुपी हुई नहीं है कि ठाले-बैठे से लोग कटते जा रहे हैं, कटे भी तो ऐसे कटे कि तीन साल पूरे होने वाली पोस्ट पर आ कर भी शुभ-कामना जैसी फोर्मेलिटी भी न कर पाये!! साहित्यिक सम्पदा से सम्पन्न लोगों की ऐसी विपन्नता देख कर हतप्रभ रह गया हूँ मैं। मित्रो क्षमा करें, जिन-जिन के साथ मैं ने काम किया है, सभी से कुछ न कुछ पाया है......... और उन की ग़लतियों को कब-कब और कैसे-कैसे सुधारा है यह उन सभी को भी याद होगा। अगर आप दुरुस्त हुये हैं तो लाभ तो आप को हुआ न!!!!!!! इस तरह कन्नी काटने से क्या फ़ायदा??????????
    ॐ फेसबुकाय नम: का जाप आप के छंदों को दुरुस्त नहीं करेगा, बल्कि इस के लिये ‘भाग मिल्खा भाग’ की ‘हवन करेंगे-हवन करेंगे-हवन करेंगे’ टाइप प्रक्रियाएँ अपरिहार्य हैं। सच तो यही है.............
    इन दोहों के भेजने वाले साहित्यप्रेमी [?] की ई मेल आय डी - rashmipp20@gmail.com

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    2. भाईजी, आपने वस्तुतः सटीक, सोद्येश्य और सार्थक बातें साझा की हैं आज. यही कुछ मैं अपने परिवेश में ’अपनों से’ कह-कह कर ’खड़ुस भाई’ या शुद्ध ’विलेन’ ही बन गया हूँ --नयों की ’उड़ान की खुशियों’ और ’उन्मुक्त प्रगति’ पर अनाश्यक क्रुद्ध दृष्टि रखता हुआ शख़्स. .. :-)))
      फिर, ऐसी तथाकथित कृतघ्नता कौन नहीं कर रहा है ? हर दूसरा, यहाँ-वहाँ से टिप-टुप लेकर आदिकवि से होड़ लेने को तत्पर है. भले आप अपने सिर के बचे बालों पर निरंकुश बने रहिये.

      फेसबुक सूचनाओं या बहुत-कुछ संयत हो चुके को साझा करने का टेबुल अवश्य है, लेकिन वह वर्कस्टेशन का रूप तो कत्तई नहीं ले सकता. आज ’वाह-वाही’ या एकदम से ’चकित’ कर देने का अहस इतना हावी है कि स्वाध्याय और सीखना जैसे शब्द दकियानूसों द्वारा की जाने वाली कारगुजारियाँ जैसे हो गये हैं.

      सप्तमी की शुभकामनाएँ.
      शुभ-शुभ

      सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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    3. सब ..स्वाध्याय... ही तो रह गया है सौरभ जी...... स्व-अध्याय ...

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    4. कितना क्षीण किन्तु कितना प्रभावी अंतर है न आदरणीय .. स्व-अध्याय और स्वाध्याय में ?!!
      शुभ-शुभ

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  7. जिसने भी भेजी हो, है अद्भुत

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  8. जिसने भी लिखे और जिसने भी भेजे क्या फ़र्क पडता है पढने वालों को तो आनन्द आया बस वही काफ़ी है

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  9. नमन” तुम्हें आद्येश्वरी, “नमन” करूँ शत बार।....... का अर्थ है ..नमस्कार है मां सौ सौ बार नमस्कार ...यह 'नमन' का पिष्टपेषण ..सर्वथा उचित है ....उच्चतर साहित्यिक कला की कोटि से.....

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  10. तुम्हें व तेरा भी यथास्थान उचित ही है

    नवीन जी.....
    मित्रो क्षमा करें, जिन-जिन के साथ मैं ने काम किया है, सभी से कुछ न कुछ पाया है......... और उन की ग़लतियों को कब-कब और कैसे-कैसे सुधारा है यह उन सभी को भी याद होगा।---
    -------क्या यह कथन अहं नहीं है ....सोचें...विचारें....

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    1. आप के उत्तर की प्रतीक्षा थी मान्यवर, ख़ुश रहिये :)

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  11. दोहे जिसके भी हैं उसे बहुत बहुत धन्यवाद सुंदर दोहे पढ़वाने के लिए

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  12. --लीजिये आलोचना की जाय ...शायद कुछ सुगबुगाहट आये....

    करिये स्थिति संहार।। ----- मात्राएँ अधिक हैं ...
    प्रथम नाद ओँकार तुम------ ओंकार ...माता है या ....स्वयं ब्रह्म ?

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  13. आद्येश्वरी..... क्या आद्येश्वर ..कोई शब्द है .....एक ही परमेश्वर है ..ईश्वर है ..तो वह परमेश्वरी है ....वही ईश्वरी है....आद्येश्वरी एवं बाद में अन्य ईश्वरी तो कोइ हैही नहीं ....अतः आद्येश्वरी ..... अशुद्ध शब्द है....

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