27 April 2013

हवस की आग ने पानी से जगमगा दी ज़मीन - नवीन

अगर थाली में सिर्फ़ हलवा रख दिया जाये या सिर्फ़ नमकीन, तो आप को कैसा लगेगा? मैं समझता हूँ यही बात साहित्य [चाहे वह ग़ज़ल ही क्यूँ न हो] पर भी लागू होती है। कुछ लोगों को लगता है कि ग़ज़ल सिर्फ़ विशेष विषयों पर ही केन्द्रित रहनी चाहिये। चचा दुष्यंत के समझाने पर भी नहीं समझे हैं ऐसे महानुभाव.... क्या करें? भाई जहाँ तक तकनीक का प्रश्न है वह तो ठीक, पर विषय तो हर शायर के अपनी पसंद के होते हैं। लिहाज़ा तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को उन के हाल पर छोड़ते हुये मैं तो अपने मूड की ही शायरी करता हूँ। मैं अपनी ग़ज़लों को सिर्फ़ एक ही टोन की बजाय विविध रंग देना चाहता हूँ और इस राह पर चलना ही मुझे अच्छा भी लगता है। मेरे कुछ छोटे-बड़े भाई मेरी इस इच्छा को मेरी ख़ुराफ़ात भी कहते हैं तो उन के विचारों का बुरा न मानते हुये आप को एक ग़ज़ल पढ़वाता हूँ :- 

न जाने कैसी सियाही से लिखते थे क़ातिब
ग़ज़ल के पन्ने अभी तक दमकते हैं साहिब

हवस की आग ने पानी से जगमगा दी ज़मीन
ग़लत नहीं है ज़रा भी ये तर्क है वाज़िब ***

मैं बे-गुनाह जमानत नहीं जुटा पाया
गुनाहगार नहीं हूँ, शरीफ़ हूँ साहिब

मैं अपनी चाह की जानिब कभी न चल पाया
रवाँ है मौत की जानिब हयात का तालिब

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है ++++
मैं शेर कह के ‘तख़ल्लुस’ में टाँक दूँ ‘ग़ालिब’


1.क़ातिब - पैसे ले कर किसी के लिये चिट्ठी-पत्री, अर्ज़ियाँ या कुछ और भी लिखने वाला 
2.**** आदमी की हवस की आग बढ़ी, उसे कृत्रिम उजाले की ज़रूरत पड़ी, उसने पानी से बिजली बनाई जिस से आज तमाम दुनिया जगमगा रही है। ख़याल नया है इस लिये स्पष्टीकरण देना पड़ा है। प्रतीक कोई भी हो, जब भी पहली बार नज़्म हुआ होगा, बंदे को खुलासा करना पड़ा ही होगा।
3. चाह की जानिब - इच्छा की तरफ़ / ओर / दिशा में
4. रवाँ है - चल रहा है 
5. मौत की जानिब - मृत्यु की तरफ़
6. हयात का तालिब -ज़िन्दगी को ढूँढने वाला  
7. ++++ कुछ दिन पहले मैंने अपने एक शायर! दोस्त को अपना शेर [काश मैं भी किसी रहमत का ज़रीया होता] सुनाया और पूछा यार ये किस का शेर है? जनाब ने बड़ी ही शिद्दत के साथ फ़रमाया शायद फ़िराक़ या ग़ालिब का है। और जैसे ही मैंने उन से कहा कि मेरा है तो हजरत बोले "ठीक-ठाक है"। तभी साहिर लुधियानवी साहब का एक मिसरा "कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है" ज़हन में आया और यह शेर हो गया।


बहरे मुजतस मुसमन मखबून
मुफ़ाएलुन फ़एलातुन मुफ़ाएलुन फ़ालुन

1212 11222 1212 22

नवीन सी. चतुर्वेदी 

6 comments:

  1. सच है, सब लील लेगा अब यह..

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  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (28-04-2013) के चर्चा मंच 1228 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  3. कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
    मैं शेर कह के ‘तख़ल्लुस’ में टाँक दूँ ‘ग़ालिब’

    बहुत सुंदर!!

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  4. ग़ज़ल तुम कहो, लिखेंगे हम अपनी स्याही से,
    ज़माने का क्या तब भी चलन यही था कातिब |

    लिखी जाती है जब ग़ज़ल औरों की स्याही से,
    वो पन्ने कुछ अधिक ही चमकदार होते हैं|


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  5. बज़ाहिर तो सियाही ही वरक़ पे हर्फ़ लिखती है।
    मशक़्क़त चीज़ क्या है, ये तो जो करता हो वो जाने।।

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काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

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