27 April 2013

हवस की आग ने पानी से जगमगा दी ज़मीन - नवीन

न जाने कैसी सियाही से लिखते थे कातिब ।
ग़ज़ल के पन्ने अभी तक दमकते हैं साहिब ।।

हवस की आग ने पानी से जगमगा दी ज़मीन ।
ग़लत नहीं है ज़रा भी ये तर्क है वाजिब ।।

मैं बे-गुनाह ज़मानत नहीं जुटा पाया ।
गुनाहगार नहीं हूँ, शरीफ़ हूँ साहिब ।।

मैं अपनी चाह की जानिब कभी न चल पाया ।
रवाँ है मौत की जानिब हयात का तालिब ।।

"कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है" ।
कि शेर कह के ‘तख़ल्लुस’ में टाँक दूँ ‘ग़ालिब’ ।।

- कातिब - लिखिया, पुराने समय में पैसा ले कर चिट्ठी, अर्ज़ी आदि लिखने वाले लोग
- वाजिब - उचित
- रवाँ है - जा रहा है, गतिमान है
जानिब - तरफ़, ओर, दिशा (में)
हयात का तालिब - जीवन को खोजने वाला

दूसरे शेर में पानी से बिजली बनाने का सन्दर्भ है 

नवीन सी. चतुर्वेदी 

6 comments:

  1. सच है, सब लील लेगा अब यह..

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  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (28-04-2013) के चर्चा मंच 1228 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  3. कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
    मैं शेर कह के ‘तख़ल्लुस’ में टाँक दूँ ‘ग़ालिब’

    बहुत सुंदर!!

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  4. ग़ज़ल तुम कहो, लिखेंगे हम अपनी स्याही से,
    ज़माने का क्या तब भी चलन यही था कातिब |

    लिखी जाती है जब ग़ज़ल औरों की स्याही से,
    वो पन्ने कुछ अधिक ही चमकदार होते हैं|


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  5. बज़ाहिर तो सियाही ही वरक़ पे हर्फ़ लिखती है।
    मशक़्क़त चीज़ क्या है, ये तो जो करता हो वो जाने।।

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