28 अप्रैल 2013

पाँच हाइकु - कैलाश शर्मा

दुर्गा की पूजा
कन्या की भ्रूण हत्या
दोगलापन.

रात का दर्द
समझा है किसने
देखी है ओस?

न जाने कब
फिसली थी उँगली
यादें ही बचीं

विकृत मन
देखे केवल देह
बालिका में भी.

नयन उठे,
बेरुखी थी आँखों में,
बरस गये
 
:- कैलाश शर्मा

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बेहतरीन हाइकू की रचना.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार के "रेवडियाँ ले लो रेवडियाँ" (चर्चा मंच-1230) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत खूब हाइकू |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  4. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति

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