1 June 2013

बड़ा अजीब सा मंज़र दिखाई देता है - कुमार अनिल

बड़ा अजीब सा मंज़र दिखाई देता है 
 तमाम शह्र ही खंडर दिखाई देता है  

जहाँ, उगाई थी हमने फ़सल मुहब्बत की
वो खेत आज तो बंजर दिखाई देता है


जो मुझको कहता था अक्सर कि आइना हो जा
उसी के हाथ में पत्थर दिखाई देता है 

 
हमें यह डर है किनारे भी बह न जाएँ कहीं
अजब जुनूँ में समन्दर दिखाई देता है


अजीब बात है, जंगल भी आजकल यारो
तुम्हारी बस्ती से बेहतर दिखाई देता है


न जाने कितनी ही नदियों को पी गया फिर भी
युगों का प्यासा समन्दर दिखाई देता है


वो ज़र्द चेहरों पे जो चाँदनी सजाता है
मुझे ख़ुदा से भी बढ़कर दिखाई देता है 

:- कुमार अनिल

बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
मुफ़ाएलुन फ़एलातुन मुफ़ाएलुन फालुन
1212 1122 1212 22

2 comments:

  1. जो मुझको कहता था अक्सर कि आइना हो जा
    उसी के हाथ में पत्थर दिखाई देता है

    हकीकत को बयान कर दिया है ।

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